Ticker

6/recent/ticker-posts

Democratic Tragedy : जनसेवक... जिन पर गंभीर आपराधिक मुकदमे दर्ज हुए या फिर दर्ज हैं



हमने लेख की शुरुआत में “Democratic Tragedy” लफ्ज़ का इस्तेमाल किया है। जिसका हिन्दी अर्थ कर सकते हैं – लोकतांत्रिक त्रासदी। हमारा स्पष्ट रूप से यही कहना है कि यह लोकतांत्रिक त्रासदी है, राजनीतिक नहीं। बड़ी सीधी सी बात है कि आप जैसा नेता चाहते हैं... पहले वैसा स्वयं को होना चाहिए। यह लोकतंत्र है, यहां जैसे आप हैं, वैसे ही तो नेता होंगे। क्रिमिनल रिकॉर्ड वाले नेताओं की सूची हर चुनावों के बाद बढ़ती जा रही है - टाइप घिसी पीटी शिकायतें करने से पहले यह नोट ज़रूर करे कि नेता हम ही चुनते हैं। इसीलिए ऐसी खोखली शिकायतें करके स्वयं के दोगलेपन को सेफ पेसेज देने की भक्त-टाइप कोशिश ना करें। इस त्रासदी को हमींने जन्म दिया, हमीं इसे बढ़ावा दे रहे हैं। आज-कल पुलिस की भर्तीप्रक्रिया में मेहनत कर रहे उम्मीदवारों से अकेले में पूछ लीजिएगा कि वो क्यों भर्ती होना चाहते हैं? उनके अरमान देखकर पता चल जाएगा कि जेसे पिल्ले वैसे बागड़बिल्लें।

उच्चतम मूल्य और नैतिकता के दावे करने वाली राजनीतिक शख्सियतें दुनिया के हर कोने में पायी जाती हैं। उनके गुनाह, उनके विरुद्ध की गई संवैधानिक या कानूनी प्रक्रियाएँ उन्हें किसी दोषी या अपराधी की श्रेणी तक खींच के ले जाती हैं, किंतु उनसे जनता हर वक्त परहेज नहीं करती। भारत भी इस प्रक्रिया से अनछुआ नहीं है। आज का दौर वो दौर है, जहां स्वयं जनता ही राजनीति में मूल्य, नैतिकता आदि को ज्यादा तवज्जो नहीं देती। गज़ब यह है कि कई राज्यों में कॉलेज खत्म करने वाले स्टूडेंट कौन सी नौकरी के लिए कितने दाम चल रहे हैं वाली बात बड़ी आसानी और सहजता के साथ किया करते हैं। आज के लोकतंत्र में लोगों के लिए यह सब अभिन्न संस्कृति टाइप सी प्रक्रियाएँ हैं। भला, जहां शुरुआत ही ऐसी हो वहां क्रिमिनल रिकॉर्ड वाले नेताओं की बातें करके मत्था पीटने का फायदा भी क्या? हो सकता है कि ऐसे ही गुरू देश को विश्वगुरू बना रहे हो!

तीखे व्यंगकार और कवि संपत सरलजी की रचना में एक पंक्ति है, उस पंक्ति के अनुसार संसद पर हमला हुआ तब आतंकवादियों को हमारे जवान संसद के भीतर जाने से रोकते हैं, अपनी जान पर खेलकर रोकते हैं और कहते हैं कि तू कितना भी बड़ा डाकू क्यों न हो, जब तक चुनकर नहीं आता, अंदर नहीं जाने देंगे। यह कवि का व्यंग नहीं है, लोकतांत्रिक त्रासदी का सीधा परिचय ही तो है।

देखिए न, भारत में संसदीय चुनावों में जीतकर आने वाले ऐसे उम्मीदवारों की सूची हर साल लंबी होती चली गई। ये बात स्पष्ट दर्शाती है कि चुनाव मूल्यों और नैतिकता के दम पर लड़े जाते होंगे, लेकिन जीते नहीं जाते। नीचे दिये गये तथ्य किसी कल्पना या कही गई बातों पर आधारित नहीं है, किंतु भारत के द एसोसिएशन फोर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स एंड नेशनल इलेक्शन वॉच (एडीआर) द्वारा दी गई आधिकारीक जानकारी है। आइए देखते हैं उन महानुभावों को, जिन्हें इस देश की समझदार जनता ने एक बार नहीं कई बार मुहब्बत और वोट देकर लोकतंत्र के मंदिरों तक पहुंचाने में अपना असिमित योगदान दिया!!!

अतिक अहेमद
कुछ वक्त पहले वह ललितपुर जेल में बंद था। फिलहाल मुझे नहीं पता। उस पर 136 मामले दर्ज हैं, जिसमें हत्या, अपहरण या फिरौती जैसे आरोप शामिल हैं। 1995 में मायावती पर हमले के प्रयास का आरोप भी दर्ज है। एक एमएलए की हत्या का आरोप भी है। फिलहाल उसकी पार्टी अपना दल है। कल कोई दूसरी पार्टी में चले जाए तो पार्टी खुद ही निश्चित करे, क्योंकि यहां सुबह नेता किसी दूसरे दल में होता है, शाम को किसी दूसरे घर भी चला जाता है। अतीत में समाजवादी पार्टी से जुड़ा अतीक अहमद 2004 से 2009 तक फूलपुर (इलाहाबाद) से लोकसभा सदस्य रहा। कुछ समय पहले तक वो जेल में बंद था और उस पर हत्या से लेकर फिरौती और मारपीट के लगभग 35 मुकदमे चल रहे हैं। समाजवादी पार्टी ने इसे 2008 में निकाल दिया। इसके बाद इस महानुभाव ने 2009 का चुनाव अपना दलके टिकट से लड़ा, पर हार गया। इलाहाबाद में इस महानुभाव को माफ़िया सरगना के तौर पर जाना जाता है। वि‍धानसभा चुनाव में दि‍ए शपथ पत्र के मुताबिक, हाईस्कूल फेल अतीक अहमद के खिलाफ 44 मामले विभिन्न थानों में दर्ज हैं। इसमें हत्या, हत्या की कोशिश समेत कई धाराओं में रिपोर्ट दर्ज है। गुंडा एक्ट, गैंगस्टर, 7 क्रिमिनल लॉ अमेंडमेंट एक्ट और आयुध अधिनियम के तहत भी कार्रवाई की गई है। अधिकांश संपत्तियों व वाहनों को सीज करने का जिक्र भी किया गया है। हालांकि, किसी मामले में उसे सज़ा नहीं हुई हैं। चल संपत्ति की बात करें तो अतीक अहमद के कई बैंक खाते कुर्क हैं। अचल संपत्ति की बात करें तो इसमें भी अधिकांश सीज हैं। हालांकि, वह करोड़पति है, जो नेता बनने के लिए प्रथम योग्यता है।

धनंजय सिंह
इन पर दर्ज मामलों की संख्या 25 है। पुलिस रेकर्ड में वो गैंगस्टर है। उत्तरप्रदेश के टारी संसदीय इलाके से 2 बार जीत भी दर्ज कर चुका है। उसके बाद इसने बहुजन समाज पार्टी के साथ हाथ मिला लिया था। उस पर इंडियन जस्टीस पार्टी के एक उम्मीदवार की हत्या का आरोप दर्ज है।

मुख्तार अंसारी
इस महाशय के ऊपर 12 से ज्यादा हत्या के मामले और अपहरण के मामले चल रहे हैं। इसके ऊपर गैंगस्टर एक्ट तथा नेशनल सिक्योरीटी एक्ट तक की धाराएँ लगी हुई है। गाजीपुर, चंदौली, सोनभेद, आग्रा और दिल्ली में उन पर गैरकानूनी धंधे का नेटवर्क चलाने का इल्जाम है। उत्तरप्रदेश के माफ़िया राजनेताओं में मुख़्तार अंसारी सिरमौर माना जाता हैं। इसके ख़िलाफ़ हत्या, अपहरण, फिरौती समेत कई आपराधिक मामले दर्ज हैं। भाजपा विधायक कृष्णानंद राय की हत्या के सिलसिले में दिसंबर 2005 में इसे जेल में डाला गया था। जेल में रहते हुए ही इस जनसेवक ने पूर्वी उत्तरप्रदेश के मऊनाथ भंजन से विधानसभा चुनाव लड़ा और जीता भी। ये इसकी लगातार चौथी जीत थी। मुख़्तार अंसारी पर आरोप है कि वो ग़ाज़ीपुर और पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई ज़िलों में सैकड़ों करोड़ रुपये के सरकारी ठेके नियंत्रित करता रहा। एक दौर में वो बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती के बहुत क़रीब रहा और बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर चुनाव भी जीता, पर 2010 में मायावती ने इसे पार्टी से निकाल दिया। इसके बाद मुख्तार ने कौमी एकता पार्टी बनाई और 2012 का चुनाव जेल में रहते हुए जीत लिया। बाद में उस पार्टी का विलय मुलायम सिंह की पार्टी के साथ भी कर दिया गया था।

डीपी यादव
इनके हिस्से में 40 मामले दर्ज हैं। 9 मामले हत्या के चल रहे हैं। ये महाशय भी गैंगस्टर एक्ट तथा नेशनल सिक्योरीटी एक्ट का सामना कर रहे है। इसका बेटा विकास यादव नितीश कटारा हत्या मामला तथा जेसिका मर्डर केस में संदिग्ध आरोपी है। पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक़ डीपी यादव ने शराब बेचने के धंधे से अपराध की दुनिया में क़दम रखा। इसने समाजवादी पार्टी नेता मुलायम सिंह यादव के साथ नज़दीकियाँ बढ़ाईं और 1989 में विधानसभा के लिए चुन लिया गया। सन 2004 में वो पाला बदल कर भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गया। अटल बिहारी वाजपेयी उस दौर में प्रधानमंत्री थे और उन्होंने डीपी यादव को राज्यसभा में मनोनीत कर लिया, पर विवाद पैदा हो जाने के बाद पार्टी ने उन्हें निकाल बाहर किया। डीपी यादव ने 2007 में राष्ट्रीय परिवर्तन पार्टी बनाई, जिसकी ओर से वो और उनकी पत्नी विधायक चुन लिए गए। बाद में वो बहुजन समाज पार्टी में शामिल हो गया, परंतु विधानसभा चुनाव हार गया। उत्तरप्रदेश में 2012 के चुनाव से पहले डीपी यादव ने बहुजन समाज पार्टी से संबंध तोड़ लिये और उसकी अपनी पार्टी का कोई उम्मीदवार चुनाव नहीं जीत पाया। इस पर हत्या, हत्या की कोशिश, ग़ैरक़ानूनी हथियार रखने आदि के कई आपराधिक मामले चल रहे हैं।

हाजी अलीम और हाजी युनुस
5 मामले हत्या के, 9 मामले हत्या के प्रयास के और 2 मामले डकैती के दर्ज हैं। 1993 में गुजरात की अहमदाबाद पुलिस ने टाडा के तहत केस दर्ज किया था और हाजी युनस तथा उसके भाई हाजी अलिम के विरुद्ध गैर जमानती वारंट निकाला था। बहुजन समाजवादी पार्टी के साथ जुड़ा हुआ यह सांसद हत्या, लूट, फिरौती जैसे 33 गंभीर मामलों में फंसा हुआ है। अहमदाबाद की एक नाइट क्लब में गोलीबारी करके 8 लोगों को जान से मारने का मामला इस पर चल रहा है। इसके अलावा कई राज्यों में हत्या, लुंट, फिरौती तथा गुंडागर्दी के 33 गंभीर आपराधिक मामले युनुस पर दर्ज हैं। बावजूद इसके उत्तरप्रदेश की तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने इसे लोकसभा के चुनाव में बहुजन समाज पार्टी की तरफ से नामांकित किया था। पुलिस दफ्तरों में हाजी युनुस गैंगस्टर है। इसके सामने पहला मामला 1989 में बुलंदशहर में दर्ज हुआ था। उसके बाद इसके खिलाफ हत्या, मारपीट करना, फिरौती, गुंडागर्दी, जातीय शोषण करना तथा टाडा जैसे 33 गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हुए। इसके खिलाफ टाडा के तहत अपराध दर्ज हुआ है, जो गुजरात पुलिस ने किया था। युनुस और उसका विधायक भाई हाजी अलीम कुछ साल पहले अपोलो सर्कस चलाते थे। सर्कस में काम करने वाली नेपाली लड़कियों ने साल 2003 में दोनों भाईओं के विरुद्ध जातीय शोषण का इल्ज़ाम लगाया था। उसके बाद पुलिस ने उस सर्कस कंपनी से 23 और नेपाली लड़कियों को छुड़ाया था। इस मामले की जांच सीआईडी को दी गई थी। न्यायालय में हाजिर नहीं होने पर 4 अप्रैल, 2009 के दिन उत्तरप्रदेश की मुज्जफरनगर कोर्ट ने युनुस के विरुद्ध गैरजमानती वारंट भी जारी किया था। सन 2018 में हाजी अलीम की हत्या हो गई थी।

रघुराज प्रताप सिंह
इसे राजा भैया के नाम से ज्यादा जाना जाता है। इसके ऊपर 35 मुकदमे चल रहे हैं, जिसमें अपहरण, हत्या, हत्या के प्रयास और एके56 जैसी राइफलें रखने के मामले दर्ज हैं। वोह आतंकवाद के संगीन जुर्म में जेल भी काट चुका है। बीजेपी सांसद पुरनसिंघ बुंदेला ने उसके विरुद्ध अपहरण तथा हत्या के प्रयास का मामला दर्ज करवाया था। पुलिस को उसके घर से एके 56 राइफल, भारी मात्रा में गहने तथा पैसे तथा गड़ा हुआ कंकाल भी मिला था। मायावती सरकार ने उसे आतंकवादी घोषित किया था। मुलायम सिंह की सरकार के वक्त उसे इन आरोपों से बरी किया गया और उस पर लगा पोटा कानून हटाया गया। उत्तरप्रदेश के 2007 के चुनावों में राजगुरु ने बहुजन समाज पार्टी के शिव प्रकाश मिश्रा के विरुद्ध कुंडा से भारी बहुमती से चुनाव जीता। मायावती सरकार बनने के बाद उसके सामने लंबित मामले फिर खोले गये और उस पर क्रिमिनल गैंग चलाने का मामला चला।

रमाकान्त यादव
इसके खिलाफ गैंगवोर कानून के तहत 38 अपराध दर्ज हैं। लखनौ में एक गेस्टहाउस में मायावती पर जिन लोगों ने हमला किया था, उसमें ये कथित रूप से शामिल था। उसका भाई उमाकान्त मायावती की ऑफिस के बाहर दुकानों को आग लगाने के अपराध में जेल भी भेजा जा चुका है। रमाकान्त 2009 में आजमगढ से चुनाव जीता था।

अरुणशंकर शुक्ल
उसे एके अन्ना के नाम से जाना जाता है और हिस्ट्रीशीटर के तौर पर पहचाना जाता है। इसके ऊपर 50 आपराधिक मामले दर्ज हैं, जिसमें हत्याओं के मामले भी हैं। मायावती के ऊपर लखनौ गेस्टहाउस में हुए हमले का एक अभियुक्त ये भी था। ताज्जुब है कि इसीको मायावती ने अपनी पार्टी से उनाओ से टिकट दी थी, किंतु वो चुनाव हार गया था।

ब्रिज भूषण शरण सिंह
उसके ऊपर हत्या सहित 31 मामले दर्ज हैं। 1996 में उसे टाडा के तहत गिरफ्तार भी किया जा चुका है। मुंबई पुलिस के अनुसार वो दाउद का आदमी रह चुका है। पंडितसिंग नाम के विधायक के हत्या के प्रयास का इल्ज़ाम उसीके ऊपर है। गैंगस्टर एक्ट का ये अपराधी 2009 में मुलायम सिंह की मेहरबानी से चुनाव लड़ा और जीता भी था।

मित्रासेन यादव
1996 में दो भाईओं के कत्ल के इल्ज़ाम में इसे आजीवन कारावास की सज़ा हुई थी, लेकिन बाद में सज़ा माफी मिल चुकी हैं। उसके ऊपर 31 मामले दर्ज हैं। 1985 में उसने एक पुलिस कॉन्स्टेबल की हत्या कर दी थी। 1996 में बहुजन समाज पार्टी के एक कार्यकर्ता की हत्या का इल्ज़ाम उस पर लग चुका है। इसे बसपा की तरफ से ही टिकट मिला था। 2009 में वो मुलायम सिंह की पार्टी से चुनाव लड़ा और एक लाख वोटों से हार गया।

रिजवान जहीर
इसके ऊपर 12 आपराधिक मामले हैं। गैंगस्टर एक्ट तथा राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत ये गिरफ्तार भी हो चुका है। 1990 में बलरामपुर में 5 लोगों की कत्ल का इल्ज़ाम लगा था। 1993 में उसने न्यायालय की शरण ली और जेल भेजा गया। जेल से ही उसने चुनाव लड़ा और चुनाव जीत गया। मुलायम सिंह की मेहरबानी के बाद 2009 में उसने मायावती की पार्टी से उम्मीदवारी की, किंतु कांग्रेसी उम्मीदवार के सामने वो हार गया।

ओमप्रकाश गुप्ता
सीतापुर विधानसभा से 6 बार गुप्ता जीत चुका है। उसके विरुद्ध हत्या, हत्या के प्रयास और डकैती के 69 मामले दर्ज हैं। 2002 में भाजपा के मुरली मनोहर जोशी की सभा में बम रखने का मामला भी उस पर है। मुलायम सिंह ने 2009 में उसे टिकट दिया, लेकिन वो हार गया था।

मोहम्मद शहाबुद्दीन
बिहार के सिवान ज़िले में मोहम्मद शहाबुद्दीन का भारी दबदबा रहा है। सिवान लोकसभा क्षेत्र से चार बार राष्ट्रीय जनता दल के सांसद रह चुके शहाबुद्दीन को भाकपा-माले कार्यकर्ता छोटेलाल गुप्ता की हत्या के इरादे से अपहरण करने के एक मामले में सज़ा हुई है और जेल में अपना आवास बनाया। नब्बे के दशक में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माले-लिबरेशन) के कार्यकर्ता और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र चंद्रशेखर की हत्या की साज़िश रचने का आरोप शहाबुद्दीन पर लगा था। राजनीति शास्त्र में एमए और डॉक्टरेट कर चुके शहाबुद्दीन पर कई बार अपने राजनीतिक विरोधियों को डराने-धमकाने के आरोप लगे हैं। सन 2004 का चुनाव वो जेल के अंदर से ही लड़ा और जीता। चुनाव नतीजे आने के बाद ही उसके विरोधी उम्मीदवार ओम प्रकाश यादव के कई समर्थकों की हत्या हो गई। वो बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के करीबी लोगों में गिना जाता हैं। शहाबुद्दीन सबसे पहले 1986 में निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर विधायक बना था। राजद की टिकट से वो चार बार लोकसभा चुनाव जीत चुका है। उसके विरुद्ध तकरीबन 40 आपराधिक मामले चल रहे हैं। नवम्बर 2005 में उसे गिरफ्तार किया गया था। दिसम्बर 2015 में गिरीश व सतीष हत्या मामले में उसे आजीवन कैद की सज़ा दी गई। आरोप तो यह भी लगाया गया कि इस हत्या मामले के साक्षी रहे राजीव रोशन की हत्या भी उसीने करवाई थी। मई 2007 में उसे लेफ्ट नेता छोटेलाल गुप्ता की हत्या का दोषी माना गया। राजीव रोशन हत्या मामले में उसे सितम्बर 2016 में जमानत मिली और वो जेल से बाहर आया। उस वक्त बिहार में नितीश कुमार मुख्यमंत्री थे। उनकी सरकार जेडीयु और कांग्रेस की गठबंधन सरकार थी। उसका स्वागत करने के लिये कई विधायक तथा चार मंत्री भी काफ़िले के साथ दिखे थे। हालांकि बाद में प्रशांत भूषण की याचिका के चलते पटना हाईकोर्ट द्वारा दी गई जमानत को सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया और शहाबुद्दीन को एक बार फिर जेल भेज दिया गया।

अगस्त 2004 में सिवान में दो भाइयों सतीश राज और गिरीश राज की शहाबुद्दीन के गांव प्रतापपुर में ही तेजाब से नहला कर हत्या कर दी गई थी। बाद मेंं इस हत्याकांड के इकलौते चश्मदीद और उनके तीसरे भाई राजीव रोशन को 16 जून 2014 को बीच चौराहे पर गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया गया था। इस मामले में 9 दिसंबर 2015 को निचली अदालत ने फैसला सुनाते हुए शहाबुद्दीन और अन्य आरोपियों को उम्र कैद की सज़ा सुनाई थी। इसके बाद शहाबुद्दीन ने साल 2017 में फैसले के खिलाफ पटना उच्च न्यायालय ने अपील की थी, लेकिन वहां भी उसकी अपील खारिज हो गई थी।

हिना सहाब
हिना सहाब आरजेडी की टिकट से चुने गये विधायक मोहंमद शहाबुद्दीन की पत्नी है। अपराधिक मामलों के चलते शाहबुद्दीन को चुनाव लड़ने का मौका नहीं मिला था। उसके बाद शहाबुद्दीन ने उसकी पत्नी हिना सहाब को उम्मीदवार के तौर पर पेश किया था। उसके पति शहाबुद्दीन के ऊपर हत्या, अपहरण और फिरौती के 40 मामले चल रहे हैं। 6 मामलों में उसे अदालत ने दोषी पाया था और सज़ा दी हुई है। जब उसकी पत्नी चुनाव लड़ रही थी, तब सिवान की स्पेशल कोर्ट में उसके ऊपर एक मामला चल रहा था। हालांकि हिना सहाब चुनाव हार गई थी।

वीणा देवी
वीणा देवी बदनाम गैंगस्टर सूरजभान सिंह की पत्नी है। सूरजभान बलियां का पूर्व विधायक है और 1992 में रामीसींग की हत्या का आरोपी है। सूरजभान के विरुद्ध भी कई मामले लंबित हैं। इसे भी चुनाव लड़ने की इजाज़त नहीं मिली थी। और उसके बाद रामविलास पासवान ने एलजेवी का टिकट उसकी पत्नी वीणा देवी को दिया था। चुनाव में वीणा देवी हार गई थी।

रंजीत रंजन
रंजीत रंजन राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव की पत्नी है। पप्पू यादव के विरुद्ध कई हत्याओं के मामले चल रहे हैं। कुछ मामलों में उसे दोषी भी पाया जा चुका है। 1998 में सीपीआई के नेता अजित सरकार की हत्या के आरोप में वो दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद रहा। अपने अपराधों के चलते इसे भी चुनाव लड़ने की इजाज़त नहीं मिली और उसके बाद उसकी पत्नी ने उम्मीदवारी की थी। हालांकि रंजीत रंजन डेढ़ लाख वोटों से हार गई थी।

शांति प्रिया
शांति प्रिया पप्पू यादव की माता है। पूर्णिया से कांग्रेस की मदद से चुनाव लड़ी थी। कहा जाता है कि जब पप्पू यादव ने अजित सरकार की हत्या की तब शांति प्रिया वहीं मौजूद थी। कांग्रेस ने शांति प्रिया को टिकट तो नहीं दिया, किंतु चुनाव में मदद ज़रूर की थी। शांति प्रिया भी उसकी पुत्रवधू रंजीत रंजन जैसे ही बुरी तरह से हारी थी।

आनंद मोहन  
आनंद मोहन नामक इस शख्स का राजनीति में पदार्पण 1990 में हुआ। ये पहली बार सहरसा से विधायक बना और उसके बाद का इसका सफर खूंरेजी रहा। पप्पू यादव से हिंसक टकराव की घटनाएँ देशभर में सुर्खियां बनीं। 1994 में उसकी पत्नी लवली आनंद ने वैशाली लोकसभा का उप चुनाव जीत कर राजनीति में अपनी धमाकेदार एंट्री की थी। आनंद मोहन की पहचान एक बाहुबली और दबंग राजनीतिज्ञ की रही है। 1994 में हुए गोपालगंज के डीएम जी कृष्णैया हत्याकांड में आनंद मोहन को निचली अदालत ने फांसी की सज़ा दी। पटना हाईकोर्ट ने फांसी की सज़ा को आजीवन कारावास में बदल दिया। कुछ सालों पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने उसकी इस सज़ा को बरकरार रखा। इससे पूर्व वह राष्ट्रीय समाजवादी पार्टी और समता पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ चुका है। स्वतंत्रता सेनानी के परिवार से आनेवाला आनंद मोहन सहरसा जेल में बंद हैं। जेल में उसने कविताओं की किताब लिखी। इस किताब का लोकार्पण भाजपा नेता जसवंत सिंह और राजीव प्रताप सिंह रूडी ने किया था। उसकी पत्नी लवली आनंद इन दिनों कांग्रेस में हैं।
 
लवली आनंद
लवली आनंद जनतादल के पूर्व विधायक आनंद मोहन की पत्नी है। आनंद मोहन पर नौकरशाह जी क्रिष्नैया के कत्ल का इल्ज़ाम है। दूसरी हत्याओं के मामले भी आनंद मोहन पर लंबित है। लवली आनंद कांग्रेस के टिकट से शिऔहर से चुनाव लड़ी थी, लेकिन वो अपनी डिपॉजिट बचा नहीं पाई।

मुन्ना शुक्ल
नौकरशाह जी क्रिष्नैया हत्या मामले में इसका नाम भी शामिल है। न्यायालय ने उसे आजीवन कैद की सज़ा सुनाई थी, लेकिन उच्च न्यायालय ने उसे निर्दोष पाया था। 2008 में उसने निर्दलीय चुनाव जीता था। 2009 में वो जनतादल (यु) के टिकट से चुनाव लड़ा और आरजेडी विधायक रघुवंश प्रसाद के सामने हार गया।

अधीर रंजन चौधरी
आरएसपी से अपना सियासी सफर शुरू करने वाले अधीर रंजन चौधरी का क्षेत्र पश्चिम बंगाल का मुर्शिदाबाद जिला है। 1996 में जब कांग्रेस ने उसे टिकट दिया, तब ममता बनर्जी उसके खिलाफ खुलेआम सड़क पर उतर गई थी। उन्होंने दागी अधीर को टिकट देने के खिलाफ आत्मदाह का एलान किया था। तब ममता कांग्रेस में थी। अधीर पर हत्या जैसे संगीन मामलों के आरोप लगे और जेल भी गया। उसे केंद्र में मंत्री बनाये जाने को लेकर झिझक थी। बाद में पश्चिम बंगाल की स्थानीय राजनीति में उसके आभामंडल देखते हुए मंत्री बनाया गया। नोट करे कि हाल में चौधरी लोकसभा में कांग्रेस के नेता है।  

प्रभुनाथ सिंह
उसके खिलाफ डबल मर्डर का मामला चल रहा है। 1995 में राजेन्द्र राय तथा दरोगा राय की हत्या के आरोप उस पर लगे थे। ये हत्याएँ मतदान केंद्र के पास ही की गई थी। कथित रूप से उसके उम्मीदवार को वोट ना देने पर उसने इन दो भाईओं की गोली मार कर हत्या कर दी थी। उसके विरुद्ध इसके अलावा अन्य 5 मामले भी चल रहे हैं। 2009 में जनतादल (यु) की टिकट से चुनाव लड़ा और हार गया। 2017 में इन्हें एमएलए अशोक सिंह मर्डर मामले में उम्र कैद की सज़ा मिली थी।

राम विलास पासवान
इनके बारे में लोकतांत्रिक त्रासदी के नजरिये से कहा जाता है कि सरकार कोई भी हो, यह उसमें मंत्री ज़रूर बनेंगे। इन पर 2 आपराधिक मामले दर्ज हैं। उन पर आईपीसी सेक्शन 504 के तहत एक मामला और सेक्शन 171 (सी) के तहत एक दूसरा मामला चल रहा है। पहला मामला प्रयोजित ढंग से शांति भंग करने का है और दूसरा चुनाव में धांधली संबंधित है। दोनों मामले हाजीपुर कोर्ट में चल रहे हैं।

उमा भारती
ये 13 आपराधिक मामलो का सामना कर रही हैं। उन पर आईपीसी की 145, 147, 148, 149, 153ए, 153बी, 505, 500, 506, 188, 171एच, 307, 341, 323, 294 और 427 की धाराएँ लगी हुई हैं। उपरांत उन पर प्रेस एंड रजिस्ट्रेशन बुक एक्ट सेक्शन 3 और 12 के तहत भी मामले चल रहे हैं। रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपुल्स एक्ट की धारा 127ए के तहत भी मामला चल रहा है। गैरकानूनी हथियार कानून की धारा 25 वं 27 के तहत गंभीर अपराध के मामले चल रहे हैं। उन पर दंगे फैलाना, हत्या की कोशिश, अनलॉफुल असेंबली, धर्म के आधार पर दो समुदायों के बीच वैमनस्य पैदा करना, जनअधिकारी वं सरकारी अधिकारियों पर गैरकानूनी दबाव डालना, राष्ट्रीय एकता पर विभावना पैदा करना, गैरसंवैधानिक बयान देना इत्यादी मामले लंबित हैं। ये सारे मामले देश के अलग अलग पुलिस स्टेशनों में चल रहे हैं और उन पर न्यायालय की प्रक्रियाएँ चल रही हैं। इन जगहों में अयोध्या, तालिया भोपाल, रायबरेली, चरखी माहौबा, छत्रपुर जैसे इलाके जुड़े हैं।

रावसाहेब दादाराव दान्वे
उन पर आईपीसी की धाराएँ 143, 146, 147, 149, 341, 353 और 504 के तहत मामले चल रहे हैं। इसके अलावा बॉम्बे पुलिस एक्ट की धारा 135 तथा पीडीपीपीए की धारा 3 के तहत भी केस दर्ज है। उस पर दंगे फैलाना, अनलॉफुल असेंबली, सरकारी कर्मचारी पर गैरकानूनी दबाव दालना, प्रयोजित तरीके से शांति भंग करना और सरकारी संपत्ति को नुकशान पहुंचाना जैसे मामले दर्ज हैं।

संजीव कुमार बालियान
इन पर आईपीसी की धारा 188, 353 वं 341 तथा क्रिमिनल लॉ अमेंडमेंट की धारा 7 के तहत मामला चल रहा है। जिसमें सरकारी सेवक के फर्ज में रुकावट डालना, सरकारी कर्मचारी पर गैरकानूनी तरीके से दबाव डालना, अवैध तरीके से कर्मचारी को सज़ा सुनाना और यौन उत्पीड़न का मामला बना हुआ है। इसके अलावा 2013 में उत्तरप्रदेश के मुज्जफर नगर के दंगों का वो मुख्य अभियुक्त है। बावजूद इसके यह बीजेपी शासित सरकार में कई अहम मंत्रालयों और पदों पर आसीन रहा।

धर्मेन्द्र प्रधान
इन पर आईपीसी की धाराएँ 341, 186, 294 और 24 तथा पीडीपीपी एक्ट की धारा 3 के तहत आरोप लगे हैं। दूसरे मामले में धारा 143, 283, 341, 504, 149, 147 और 174 के तहत आरोप लगे हुए हैं। इन पर गलत तरीके से नियंत्रण करके अधिकारी को दंडित करना, जनसमारोह में सरकारी कर्मचारी को अबस्ट्रॅक्ट करना, सरकारी संपत्ति को नुकशान पहुंचाना, अनलॉफुल असेंबली, लोगों को प्रताड़ित करना, प्रयोजित तरीके से शांति भंग करना, दंगा फैलाना और सरकारी कर्मचारी के साथ गैरकानूनी ढंग से निपटना के मामले हैं। यह महाशय भी बीजेपी शासित मोदी सरकार में अहम मंत्रालय पर डटे हुए थे।

उपेन्द्र कुशवाहा
उन पर आईपीसी की धारा 188 तथा 171 (ई) के तहत 4 मामले चल रहे हैं। सरकारी कर्मचारी के फर्ज में रुकावट पैदा करना वं रिश्वत का मामला बनता है। ये मामला नुर सारानी तथा दीप नगर पुलिस स्टेशन में दर्ज है।

निहालचंद चौहान
वे राजस्थान के गंगानगर से भाजपा के सांसद है। उन्होंने अपने एफिडेविट केन्द्रीय चुनाव आयोग के सामने रखी, जिसमें उनके ऊपर कोई भी आपराधिक मुकदमा होने से लिखित इनकार किया था। लेकिन, चुनाव जीतने के बाद और मंत्री बनने के बाद एक शादीशुदा महिला ने उन पर दुष्कर्म का आरोप लगाया। गौरतलब यह है कि ये मामला सन 2011 में रजिस्टर्ड हुआ था और जून 2014 में जयपुर कोर्ट ने निहालचंद को नोटीस जारी किया। बीजेपी शासित सरकार में होने की वजह से यह लंबे समय तक बचते रहे, लेकिन विवाद बढ़ने के बाद लंबित मामला आगे बढ़ा। बाद में इन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ा। वैसे यह मामला अब भी लंबित है।

केशव प्रसाद मौर्य
नेता के तौर पर मशहूर फूलपुर से सांसद केशव प्रसाद मौर्य उत्तरप्रदेश में भाजपा के नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष बने और बाद में 2017 में यूपी के डिप्टी सीएम भी बन गए। केशव मौर्य ने 2002 में इलाहाबाद की शहर पश्चिमी विधानसभा सीट से भाजपा प्रत्याशी के रूप में राजनीतिक सफर शुरू किया। उन्हें बसपा प्रत्याशी राजू पाल ने हराया था। इसके बाद वर्ष 2007 के चुनाव में भी वे इसी विधानसभा क्षेत्र से चुनाव हार गए थे। 2012 के चुनाव में उन्हें सिराथू विधानसभा सीट से भारी जीत मिली। दो वर्ष तक विधायक रहने वाले केशव ने फूलपुर सीट पर भी पहली बार भाजपा का झंडा फहराया। मोदी लहर में इस सीट पर 5,00,3564 वोट हासिल कर उन्होंने एक इतिहास बना दिया।

18 सालों तक विहिप से जुड़े और प्रचारक रह चुके केशव मौर्य के खिलाफ तक़रीबन एक दर्जन आपराधिक मामले दर्ज हैं। इनमें हत्या, धोखाधड़ी और दंगे फैलाने के अलावा सरकारी कर्मचारी को धमकी देने जैसे गंभीर मामले शामिल हैं। केशव ने निर्वाचन आयोग में अपने हलफनामे में खुद के खिलाफ चल रहे मामलों की एक लंबी फेहरिस्त दी। कौशाम्बी जिले के पश्चिम शरीरा, पडंसा, कोखराज, मंझनपुर के अलावा इलाहाबाद जनपद के कर्नलगंज और जार्जटाउन में केशव मौर्य के खिलाफ कुल 11 मामले लंबित हैं। यह सभी मामले अलग-अलग अदालतों में चल रहे हैं। मौर्य के खिलाफ हत्या का मुकदमा 2014 में दर्ज किया गया था, जिसकी सुनवाई कौशाम्बी सेशन कोर्ट में नियमित तौर पर हो रही हैं। कौशाम्बी में ही मौर्य धोखाधड़ी के एक मामले में मुकदमा झेल रहे हैं।

योगी आदित्यनाथ
कभी भाजपा के सांसद रहे योगी 2017 में यूपी के सीएम भी बन गए। जितने विवाद योगी से जुड़े रहे, उतने ही आपराधिक मामले भी उनके खिलाफ दर्ज हुए, जिनमें हत्या के प्रयास जैसे संगीन मामले भी शामिल थे। उनके खिलाफ गोरखपुर और महाराजगंज में लगभग एक दर्जन मामले दर्ज हुए थे। इसका ज़िक्र उन्होंने लोकसभा चुनाव 2014 के दौरान अपने हलफनामे में किया था। योगी के खिलाफ धर्म, जाति, जन्म स्थान, निवास, भाषा आदि के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देने और सद्भाव बिगाड़ने के मामले में आईपीसी की धारा 153ए के तहत दो मामले दर्ज हैं। इसके अलावा उनके खिलाफ वर्ग और धर्म विशेष के धार्मिक स्थान को अपमानित करने के आरोप में आईपीसी की धारा 295 के दो मामले दर्ज हैं।

उनके खिलाफ कृषि योग्य भूमि को विस्फोटक पदार्थ का इस्तेमाल करके नुकसान पहुंचाने के इरादे से कार्य करने आदि का एक मामला भी दर्ज है। यही नहीं उनके खिलाफ आपराधिक धमकी का एक मामला आईपीसी की धारा 506 के तहत दर्ज है। उनके खिलाफ आईपीसी की धारा 307 के तहत हत्या के प्रयास का एक संगीन मामला भी चल रहा है। आईपीसी की धारा 147 के तहत दंगे के मामले में सज़ा से संबंधित 3 आरोप भी उन पर हैं। आईपीसी के खंड 148 के तहत उन पर घातक हथियारों से लैस दंगों से संबंधित होने के दो आरोप दर्ज हैं। उनके खिलाफ आईपीसी की धारा 297 के तहत कब्रिस्तान में जबरन घुसने के दो मामले हैं।

आईपीसी की धारा 336 के तहत उन पर दूसरों की व्यक्तिगत सुरक्षा और जीवन को खतरे में डालने से संबंधित 1 मामला है। जबकि आईपीसी की धारा 149 का एक मामला उनके खिलाफ चल रहा है। आईपीसी की धारा 504 के तहत उन पर जानबूझकर शांति का उल्लंघन करने का एक आरोप दर्ज है। इसके अलावा आईपीसी के खंड 427 का एक मामला भी उनके खिलाफ दर्ज है।

ये सभी मामले लोकसभा चुनाव 2014 में दिए गए उनके हलफनामें में दर्ज हैं। हालांकि कितने मामले इनमें से खत्म हुए या बंद हुए यह जानकारी अभी उपलब्ध नहीं है। इनके सीएम बनते ही इनके कई साथियों पर लगे ढेर सारे मामले बंद करने की आधिकारिक घोषणाएँ हुई थी, ऐसे में संभावना यह भी है कि जब साथियों पर कृपा की तो खुद पर पहले ही कर दी होगी।

गायत्री प्रजापति
ईमानदारी से कहूं तो जब इनका नाम पहले सुना तो लगा कि महिला मंत्री होगी, लेकिन बाद में पता चला कि ये पुरुष मंत्री है! खैर, इनका नाम मुलायम-अखिलेश और सपा के 2016 के विवादों में खूब छाया रहा था। ये उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी सरकार में राज्य परिवहन मंत्री रह चुके है। इनके विरुद्ध दुष्कर्म और यौन उत्पीड़न के आरोप लगे। बुंदेलखंड की एक महिला ने गायत्री प्रसाद प्रजापति और उनके सहयोगियों पर 2014 में कथित रूप से गैंग रेप का आरोप लगाया था। आरोपों के मुताबिक पीड़ित को खनन का ठेका देने की बात हुई थी, लेकिन पीड़ित की चाय में नशीला पदार्थ मिलाकर गैंग रेप किया गया। ब्‍लैकमेल करने के लिए पीड़ित की तस्वीरें ली गईं और महीनों दुष्‍कर्म किया जाता रहा। पीड़िता के मुताबिक उसकी नाबालिग बेटी पर भी उनकी बुरी नजर थी। बाद में जब पीड़िता ने मामला दर्ज कराया तो मंत्री समेत उनके सहयोगियों की तरफ से जान से मारने की धमकियां मिलने लगीं।

कहा गया कि सरकार का हाथ सर पर होने की वजह से इन पर मामला दर्ज नहीं हुआ। लेकिन यूपी विधानसभा चुनाव 2017 के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इनके खिलाफ मामला दर्ज करने का आदेश दिया। उसके बाद लखनौ के गौतम पल्ली पुलिस थाने में गायत्री के खिलाफ अलग अलग धाराओं के तहत मामला दर्ज हुआ। यूपी विधानसभा चुनाव 2017 उन्होंने सपा की तरफ से लड़ा। चुनाव जारी ही था कि सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया। उसके बाद वो तो जैसे भगोड़े ही हो गए। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद गायत्री प्रजापति समेत 5 लोगों के खिलाफ 18 फरवरी 2017 को लखनऊ के गौतम पल्ली थाने में एफआईआर दर्ज की गई। गायत्री समेत अन्य लोगों के खिलाफ आईपीसी की धारा 511, 376 डी पॉक्सो एक्ट 3/4 में मामला दर्ज हुआ था। एक दौर तो वोह भी आया जब देश के तमाम एयरपोर्ट पर अलर्ट जारी किया गया, क्योंकि एजेंसियों को डर था कि वो यह जनसेवक विदेशगमन कर जाएंगे। उनके पासपोर्ट के निरस्‍तीकरण की रिपोर्ट भेजते ही सुरक्षा एजेंसियां हरकत में आ गई। यूपी में उनकी तलाश में छापें भी होते रहे और पुलिस उनकी खोज में जुटी रही। इसी माथापच्ची के बीच सुप्रीम कोर्ट ने भी गायत्री प्रजापति को राहत देने से इनकार कर दिया और उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगाने से मना किया। बाद में उन्हें लखनौ से ही गिरफ्तार किया गया।

मुलायम सिंह यादव के करीबी माने जाने वाले गायत्री प्रसाद प्रजापति जब पहली बार चुनाव लड़े थे तो उनको महज 1,500 वोट मिले थे। उस दौर में उनके पास बीपीएल कार्ड था। 2012 में पहली बार सपा के टिकट पर अमेठी से कांग्रेस की अमिता सिंह को हरा कर जीते। उसके बाद उनका सितारा बुलंद होता चला गया। कांग्रेस के गढ़ में जीतने की वजह से वह सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव की नजर में आए। उनको फरवरी 2013 में सिंचाई राज्‍य मंत्री बनाया गया और उसी जुलाई में खनन विभाग का स्‍वतंत्र प्रभार दे दिया गया। उसके चंद महीनों के बाद जनवरी 2014 में वह कैबिनेट मंत्री बन गए। फरवरी में उनके खिलाफ आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक संपत्ति एकत्र करने और राज्‍य में अवैध खनन को प्रश्रय देने के आरोप लगे। सितंबर 2016 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सीबीआई से अवैध खनन मामले में रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश दिया। नतीजतन कुछ समय बाद उनको अखिलेश ने कैबिनेट से हटा दिया। हालांकि उसके बाद मुलायम के हस्‍तक्षेप के चलते उनकी वापसी हुई। वो 2017 का विधानसभा चुनाव अमेठी से लड़े और हार गये।

सत्येंद्र जैन
आम आदमी पार्टी के सत्येंद्र जैन नाम के इस नेता पर आय से अधिक संपत्ति का मामला तैयार होता बताया गया। ये मामला जब उन पर बन रहा था तब वे दिल्ली राज्य के मंत्री थे। मार्च 2017 में आयकर विभाग के अधिकारियों ने राजधानी में 100 बीघा से भी अधिक जमीन और कई कंपनियों के शेयरों को जब्त किया था, जिन्हें कथित तौर पर दिल्ली के मंत्री सत्येंद्र जैन से संबंधित बताया गया। आईटी विभाग के अधिकारियों ने यह कार्रवाई बेनामी संपत्ति के खिलाफ बनाए गये कानून के मुताबिक की थी। जब्त की गई जमीन की कीमत 17 करोड़ बताई गई, जबकि शेयरों की कीमत 16 करोड़ रुपये। हालांकि इनकी मार्केट वैल्यू कहीं अधिक थी। इस संबंध में 27 फरवरी 2017 को 4 संबंधित कंपनियों को नोटिस भी जारी किया गया। इंडो मेटलिमपेक्स, अकिंचन डिवेलपर, प्रयास इंफोसॉल्यूशन और मंगलायतन प्रॉजेक्ट को जारी किए गए नोटिसों में अधिकारियों ने बेनामी संपत्ति ट्रांजैक्शन ऐक्ट के तहत सत्येंद्र जैन पर कंपनियों से कैश पेमेंट के लिए गलत एंट्रियों के जरिए शेयर हासिल करने का दोषी ठहराया था। इन दिनों जैन को दिल्ली सरकार में काफी ताकतवर मंत्री माना जाता था। वह पीडब्ल्यूडी, ट्रांसपोर्ट और हेल्थ समेत कई अहम मंत्रालय संभाल रहे थे। आय छिपाने के लिए भी दिल्ली सरकार के इस मंत्री पर अलग से इनकम टैक्स ऐक्ट के तहत जांच की बातें सामने आई थी। इनकम टैक्स विभाग का कहना था कि सारी जमीन बेनामी लेन-देन के जरिए ली गई थी।

नरोत्तम मिश्रा
इन पर पेड न्यूज़ के आरोप सिद्ध हुए थे। जून 2017 के दौरान चुनाव आयोग ने इनकी विधायकी खत्म कर दी तथा 3 साल तक चुनाव लड़ने पर पाबंदी लगा दी। विधानसभा चुनाव के दौरान मिश्रा पर पेड न्यूज़ के आरोप लगे थे। जब इन पर आरोप सिद्ध हुए तब वे मध्यप्रदेश की शिवराज सिंह सरकार में जल संसाधन, जनसंपर्क एवं संसदीय कार्य मंत्री थे। 2008 के विधानसभा चुनाव के दौरान उन पर पेड न्यूज़ और करप्ट प्रैक्टिस की शिकायत आयोग से की गई थी। कांग्रेस के पूर्व विधायक राजेंद्र भारती ने अप्रैल 2009 में आयोग से इस संबंध में शिकायत की थी। उन पर 42 बार पेड न्यूज़ छपवाने के आरोप लगे। इसके बाद चुनाव आयोग ने जनवरी 2013 में मिश्रा से जवाब तलब किया था। उन्होंने इस मामले को हाइकोर्ट में चुनौती भी दी थी, जिस पर शुरू में उन्हें स्टे मिल गया था। बाद में आयोग की दलील पर स्टे ऑर्डर वापस ले लिया गया था। इसके बाद मिश्रा ने सुप्रीम कोर्ट की शरण ली थी। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका दिल्ली हाईकोर्ट को ट्रांसफर कर दी, जहां से उन्हें कोई राहत नहीं मिली। दिल्ली हाईकोर्ट ने भी चुनाव आयोग के फैसले पर मुहर लगा दी।

आयोग ने मिश्रा से चुनाव के दौरान पेड न्यूज़ पर खर्च की गई रकम का ब्योरा मांगा था, जिसे उन्होंने उपलब्‍ध नहीं कराया। गौरतलब है कि यदि कोई निर्वाचित जनप्रतिनिधि चुनाव के दौरान किए गए खर्च का ब्योरा तय समय में देने में असफल रहता है तब उस पर पेड न्यूज़ का आरोप साबित होता है। ऐसे में चुनाव आयोग अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए संबंधित चुनाव को शून्य घोषित कर सकता है और आरोपी पर चुनाव न लड़ने का प्रतिबंध लगा सकता है।

फग्गन सिंह कुलस्ते
मंडला लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करनेवाले फग्गन सिंह कुलस्ते मोदी सरकार में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री रहे। मंत्री बनने से पहले इन्होंने चुनाव लड़ा, जिसमें अपने चुनावी शपथ-पत्र में इन्होंने जो जानकारी दी उसके मुताबिक उनके खिलाफ थाना निवास और डिंडोरी में 7 मामले दर्ज थे। इनमें 2 मामले गंभीर आपराधिक श्रेणी में आते थे। इनके खिलाफ धारा 148, 341 और 323 के तहत भी मामले दर्ज हुए हैं। ओब्स एक्ट एंड सोंग्स (धारा 294) का भी मामला यह नेताजी धारण किए हुए है, जो सार्वजनिक जगह पर अश्लीलता से संबंधित है।

नरेन्द्र सिंह तोमर, एमजे अकबर और जयभान सिंह पवैया
नरेन्द्र सिंह तोमर क्रिमिनल हिस्ट्री के बाद भी मोदी सरकार में केंद्रीय पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री रहे। शिवराज सिंह सरकार में एमपी के उच्च शिक्षा मंत्री रहे जयभान सिंह पवैया के खिलाफ भी डकैती तक के मामले दर्ज हुए हैं। साथ में राष्ट्रीय एकता को नुकशान पहुंचाने का मामला भी पवैया पर लंबित है। एमजे अकबर को तो कौन नहीं जानता। पत्रकार से बीजेपी नेता बने एमजे अकबर विवादास्पद नेता के रूप में ज्यादा जाने गए। इनके खिलाफ भी कुछ मामले दर्ज हैं, जिसमें अदालतों की अवमानना तक के मामले है। मी टू से प्रसिद्ध इस मंत्री का ताज़ा इतिहास सबको पता ही होगा।

इन महानुभावों को किसी एक लेख में शामिल नहीं किया जा सकता, क्योंकि इन्हें किसीसे दूसरी दफा महाभारत जैसा बड़ा ग्रंथ लिखवाना है
आप ऐसे महानुभावों के बारे में किसी एक लेख में लिख ही नहीं सकते। इनकी परम इच्छा तो अपने बारे में किसी और से दूसरी दफा महाभारत जितना बड़ा ग्रंथ लिखवाने की है। लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, जगन्नाथ मिश्रा, वीरभद्र सिंह, शिबू सोरेन, येदियुरप्पा, सुरेश कलमाड़ी, ए राजा, कनिमोझी, बंगारु लक्ष्मण, अमर सिंह, मधु कोड़ा, शशिकला, ओमप्रकाश चौटाला, जयललिता, रूपा गांगूली, राम शंकर कठेरिया, साध्वी निरंजन ज्योति, गिरिराज सिंह, मुकुल रोय, हेमंत बिस्वा शर्मा, हिमाचल के सुखराम और उनके पुत्र, नितेश राणे, नारायण राणे, बुक्कल नवाब, महिपाल मदरेणा, विजय जोली, जयंती भानुशाली, रुस्तम सिंह, कुलदीप सिंह सेंगर, चिन्मयानंद, प्रज्ञा ठाकूर.. आप नाम लिखते लिखते-पढ़ते पढ़ते-गिनते गिनते जिंदगी गुजार देंगे, लेकिन इनकी गाथा खत्म नहीं होगी।

गज़ब तो यह है कि आप ऐसे महानुभावों की सूची बनाएंगे तो अंत में आपको इसमें भी अपराधों के अनुसार वर्गीकरण वाली प्रक्रिया आजमानी होगी! मसलन, दुष्कर्म के आरोपी, डकैती के आरोपी, दंगाई, हत्या के आरोपी, फिरौतीबाज... वगैरह वगैरह!!!

सोचिए, सोनिया गांधी-राहुल गांधी जैसे दिग्गज नेता जमानत पर बाहर है। बीजेपी के पास अपने भक्त हैं तो उधर कांग्रेस के पास भी है। तभी तो पी चिदंबरम, उनके पुत्र, ए राजा, कनिमोझी, सुखराम या नरसिंह राव जैसे दिग्गजों पर कांग्रेसी मौनमोहन है। उधर अमित शाह, नरेन्द्र मोदी जैसे बड़े बड़े नेता भी क्लीन चिट की लाइन में खड़े है, जो कभी न कभी तो प्राप्त होगी ही। एलके आडवाणी से लेकर येदियुरप्पा... बीजेपी के पास भी दिग्गजों की बड़ी लंबी सूची है, जैसे कांग्रेस के पास है। प्रादेशिक दलों की कुंडली तो समूचे भारत को पता है। लेकिन भारत को यह भी देखना चाहिए था कि इन्हीं प्रादेशिक दलों के सहारे कांग्रेस या बीजेपी जैसे राष्ट्रीय दल सत्ता तक पहुंचने में या संत्ता बरकरार रखने में यकीन रखते हैं।

क्रिमिनल सांसदों का आंकड़ा बढ़ता गया
भाजपा को वाजपेयी और फिर मोदी काल में दिल्ली का तख्त मिला तब तक वे कांग्रेस से अलग दिखते थे। लेकिन अपने छोटे से सत्ताकाल में भाजपा जैसे दल ने भी दिखा दिया कि कांग्रेस कभी नहीं जाती, जिसे सत्ता मिलती है वही कांग्रेस बन जाता है। भाजपा के अध्यक्ष, कथित चाणक्य और देश के गृहमंत्री सरीखे शख्स अमित शाह पर भी कई मामले दर्ज हुए थे, जिनसे वे छुटकारा पा चुके हैं और अब आधिकारिक रूप से स्वच्छ हैं। किंतु मोदी-शाह की जोड़ी के दौरान देश के लगभग तमाम राजनीतिक दलों से कई क्रिमिनल रिकॉर्ड वाले नेता बीजेपी में आए, मंत्री बने और भारत को विश्वगुरू बनाने में योगदान देते रहे यह बात नजरअंदाज नहीं की जा सकती। स्वयं मोदी महाराष्ट्र में गैंगस्टर के लिए चुनाव प्रचार करते हुए दिख चुके हैं। मंच पर शराब माफ़िया के साथ गुजरात में मोदी द्वारा प्रचार करना, यह तस्वीर भी कुछ सालों पहले की ही है।

2014 की नयी लोकसभा में 34 प्रतिशत सांसद ऐसे थे, जिन पर आपराधिक मुकदमे दर्ज थे। पिछली बार ये आंकड़ा 29 प्रतिशत का था। 2019 की लोकसभा में ऐसे सांसदों का आंकड़ा बढ़कर 34 के पार हो गया था। संसद को एक वर्ष के भीतर गुनाहखोर सांसदों से मुक्त करने का सार्वजनिक और संसदीय वचन देनेवाले मोदी ने 2019 में यह आंकड़ा आगे ले जाने में यकीन क्यों रखा ये अमित शाह से पूछिए, मुझसे नहीं। अनगिनत मामलों में तथाकथित जनसेवकों पर मामलें दर्ज हो चुके हैं। झूठे प्रमाणपत्रों से लेकर अतिगंभीर मामलों वाले राजनेताओं की संख्या कम नहीं है। न्यायालयों द्वारा जुर्माने पाने वाले, फटकार पाने वाले तथा सज़ा पाने वाले राजनेताओं की सूची लंबी है। गौरतलब है कि क्रिमिनल लीडरशिप की सूची बहुत ही लंबी है तथा इसमें लगभग तमाम राजनीतिक दलों के नेताओं के नाम शुमार है।

21वीं सदी के महान लोकतंत्र की समझदार जनता होने के नाते आपको यह ज्ञात होना चाहिए कि यह महान जनसेवकों की छोटी सी सूची है। ऐसे महानुभावों की सूची को किसी लेख में नहीं, किसी बड़ी किताब में ही ढाला जा सकता है। नोट यह भी करे कि ऐसे जनसेवक चाहे किसी भी दल से हो, लेकिन इन्हें हमारे देश का हर दल बड़ी आसानी से अपने यहां जगह देता है और लोग सहजता से स्वीकार कर लेते हैं।

(इंडिया इनसाइड, एम वाला)