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Hypocrite Media: युद्ध की कवरेज पर सारी हदें पार करता भारतीय मीडिया, टीआरपी पर रोक और अदालत की फटकार से भी फ़र्क़ नहीं

 
भारत सरकार ने 6 मार्च 2026 से 4 हफ़्ते के लिए टीआरपी पर रोक लगा दी है। क्योंकि सरकार को भी लगने लगा है कि चैनल बहुत ज़्यादा सनसनी फैला रहे हैं। पिछले कुछ समय में नेशनल न्यूज़ चैनलों पर फ़र्ज़ी, भ्रामक और सांप्रदायिक रिपोर्टींग के लिए मीडिया संस्थान और अदालतों द्वारा जुर्माना भी लगाया जा चुका है।
 
यूँ तो सब जानते हैं कि आज कल हमारे यहाँ मीडिया को गोदी मीडिया के नाम से जाना जाता है। हालात यह हो चले हैं कि अब तो नेशनल न्यूज़ चैनल पर आनी वाले ख़बरें सच्ची हैं या झूठी यह चैक करने के लिए फ़ैक्ट फाइंडर साइट पर पहुँचने वालों की तादाद बढ़ी है!
 
भारत पाकिस्तान के बीच मामला गर्म हो या न हो, न्यूज़ चैनल वाले अपने किचन में इसे तवे पर तलते ही रहते हैं। टैंक मीडिया चैनल तक पहुँच जाते हैं और एंकर अग्नि मिसाइल से भी तेज़ उड़ने लगते हैं। सब शांत हो तब भी मीडिया के लिए सरहदों पर तनाव पसरा हुआ होता है! दुनिया को कई बार ख़त्म करने वाले हमारे मीडिया ने कितनी बार विश्वयुद्ध करा दिया होगा इसकी गिनती करना भी मुश्किल है।
 
जीएसटी की दरें बढ़ने के फ़ायदे गिनवाने वाला मीडिया जीएसटी की दरें कम होने के लाभ पेश करने लगता है! ईरान अमेरिका जंग के चलते ईंधन मामले में सरकार फँसेगी तो ये मीडिया चूल्हे के धुएँ से मिलने वाले लाभ बताने लगेगा। जिस मीडिया को भारतीय जनता की दिक्कत के बारे में नहीं पता उन्हें ट्रंप और नेतन्याहू के बेडरूम में रात को कितने बजे क्या शब्द बोले गए थे वह पता होता है!
 
अमेरिका-इज़राइल ईरान युद्ध पर भारत के टीवी न्यूज़ चैनलों ने टीआरपी बढ़ाने के लिए ऐसी सनसनी फैलाई है कि सरकार ने 4 हफ़्ते के लिए टीआरपी पर रोक लगा दी है। टीवी न्यूज़ चैनलों ने न्यूज़ को चटपटा बनाकर पेश करने के चक्कर में समाचार प्रसारण की नैतिकता को ज़मीन के बहुत भीतर धकेल दिया है। सूचना और प्रसारण मंत्रालय के द्वारा दिया गया यह आदेश इसी तरफ़ इशारा करता है।
 
न्यूज़ चैनलों के टीआरपी के धंधे पर सरकारी ब्रेक
सरकार ने ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल यानी बीएआरसी को आदेश दिया है कि वो टीवी न्यूज़ चैनलों की टीआरपी यानी टेलीविजन रेटिंग पॉइंट्स की रिपोर्टिंग तुरंत रोक दे। ये रोक 4 हफ़्ते के लिए है या जब तक आगे कोई नया आदेश न आए, तब तक।
 
बताया जाता है कि सरकार ने ये फ़ैसला इसलिए लिया क्योंकि सरकार को लगता है कि इज़राइल-अमेरिका ईरान के बीच चल रहे युद्ध की कवरेज में कुछ न्यूज़ चैनल बहुत ज़्यादा सनसनी फैला रहे हैं और अटकलें लगाने वाली ख़बरें चला रहे हैं। इससे आम लोगों में डर और घबराहट फैल सकती है, ख़ासकर उन लोगों में जिनके रिश्तेदार या दोस्त प्रभावित इलाक़ों में हैं।
 
मंत्रालय ने शुक्रवार यानी 6 मार्च को जारी अपने आदेश में लिखा है -
·        2014 के 'पॉलिसी गाइडलाइंस फॉर टेलीविजन रेटिंग एजेंसियाँ' के तहत बीएआरसी (BARC) रजिस्टर्ड है
·         इज़राइल-ईरान संघर्ष के बीच कुछ न्यूज़ चैनल अनावश्यक सनसनीखेज़ ख़बरें और अटकलें दिखा रहे हैं
·         इससे जनता में घबराहट फैलने का ख़तरा है, ख़ासकर उन इलाक़ों में रहने वालों या वहाँ के लोगों के परिवार वालों में
·         2014 की गाइडलाइंस की क्लॉज़ 24.2 कहती है कि BARC को मंत्रालय के हर आदेश का पालन करना होगा
·         इसलिए सार्वजनिक हित में BARC को न्यूज़ चैनलों की TRP रिपोर्टिंग रोकने का निर्देश दिया जाता है

 
इज़राइल-अमेरिका ईरान की जंग ने एशिया ही नहीं, पूरी दुनिया में तनाव को बढ़ा दिया है। ड्रोन और मिसाइल हमलों की लड़ी चल रही है। इस बीच भारतीय मीडिया में जंग के दौरान अनेक न्यूज़ ऐसी हैं, जिन्हें कथित रूप से बिना जाँचे चला दिया गया, जो आख़िरकार या तो फ़र्ज़ी निकली, या भ्रामक या अटकलों वालीं। कई रिपोर्टों में कहा गया -
 
·         भारतीय टीवी न्यूज़ चैनलों पर पुरानी फुटेज दोबारा दिखाई जा रही है
·         ग़लत लेबल वाली वीडियो चलाई जा रही हैं
·         ड्रामेटिक सायरन और बैकग्राउंड म्यूज़िक के साथ ख़बरें दिखाई जा रही हैं
·         फ़ेक न्यूज़ और ज़्यादा डरावनी अटकलें फैलाई जा रही हैं
·         बुर्ज ख़लीफ़ा पर हमला दिखाने वाले शुरूआती फ़र्ज़ी क्लिप, ये असल में पुराने या AI-मॉडिफाइड थे
·         तेहरान में बड़े प्रदर्शन या इज़राइली F-35 विमान गिराए जाने के AI वीडियो
·         ईरानी मिसाइलों से अमेरिकी जहाज़ USS अब्राहम लिंकन को तबाह करने के दावे, जो बिना सबूत के थे
·         ये फुटेज रिसाइकल्ड पुराने ग़ज़ा या यूक्रेन युद्ध या कंप्यूटर गेम से लिए गए थे
·         युद्ध को 'ईरान बनाम अमेरिका-इसराइल' के बजाय धार्मिक, सांप्रदायिक रंग दिया गया, जैसे शिया-सुन्नी, मुस्लिम दुनिया बनाम पश्चिम
·         कुछ न्यूज़ चैनल खुलकर पक्षपाती अंदाज़ में रिपोर्टींग कर रहे हैं, किसी एक को अच्छा या जीता हुआ बताने के प्रयास हुए
 
सरकार का मानना है कि इससे लोग डर सकते हैं, भले ही भारत सीधे प्रभावित न हो। ख़ासकर उन परिवारों में जहाँ कोई विदेश में है।
 
टीआरपी क्या होती है?
टीआरपी मतलब टीवी पर चैनल कितना देखा जा रहा है, इसका स्कोर। BARC हर हफ़्ते ये रैंकिंग जारी करता है। ज़्यादा टीआरपी मतलब ज़्यादा विज्ञापन, ज़्यादा कमाई। अब 4 हफ़्ते तक न्यूज़ चैनलों की टीआरपी नहीं आएगी तो चैनलों को पता नहीं चलेगा कि कौन सा चैनल आगे है। विज्ञापनदाता फ़ैसला नहीं ले पाएँगे।
 
2020 में टीआरपी घोटाले के आरोपों के बाद BARC ने न्यूज़ चैनलों की रेटिंग कुछ हफ़्तों के लिए रोकी थी। लेकिन वो अलग वजह से था। अब ये युद्ध कवरेज की वजह से है।
 
बहरहाल, कई मीडिया एक्सपर्ट और सोशल मीडिया पर लोग कह रहे हैं कि ये अच्छा कदम है क्योंकि न्यूज़ चैनल ज़्यादा ड्रामा कर रहे हैं। वहीं कुछ लोग कह रहे हैं कि सरकार प्रेस की आज़ादी पर रोक लगा रही है।
 
जिन न्यूज़ चैनलों को भारतीय जनता की दिक्कत के बारे में नहीं पता वे ट्रंप नेतन्याहू के बेडरूम में रात को कितने बजे क्या शब्द बोले गए थे वह ढूँढ लेता है!
पिछले कुछ सालों से इस देश के मेनस्ट्रीम मीडिया को देश के नागरिकों की दिक्कतों के बारे में नहीं पता है, लेकिन उन्हें यह पता चल जाता है कि ट्रंप, नेतन्याहू या पुतिन के कमरे में आधी रात को कितने बजे क्या मीटिंग हुई और उसमें किसने क्या शब्द बोला!
 
भारतीय मीडिया में विशेषत: टीवी न्यूज़ चैनल दो देशों के बीच युद्ध या संघर्षों की कवरेज के दौरान टीआरपी  की अंधी दौड़ में अक्सर बुनियादी सिद्धांतों, सुरक्षा और संवेदनशीलता की सीमाएँ लाँघ रहे हैं। लाइव रिपोर्टींग, सनसनीखेज़ हेडलाइंस, नाटकीय और अत्यधिक आक्रमक प्रस्तुतितकरण की सनक मीडिया के भीतर दौड़ रही है।

 
और इस सनक में मीडिया झूठी, भ्रामक, अपुष्ट, संवेदनशील, भड़काऊ सामग्री को न्यूज़ के नाम पर परोस रहा है! प्रोपेगंडा, एजेंडा, ग़लत सूचना, आदि इनकी रिपोर्टींग में छलक रहा है। ज़िम्मेदार रिपोर्टींग की कमी तो है ही, साथ ही घटिया और हास्यास्पद कंटेट के साथ यह मीडिया स्टूडियो में बैठे बैठे दर्शकों को मनोरोगी बना रहा है।
 
पुरानी तस्वीरें और वीडियो को ब्रेकिंग न्यूज़ के तौर पर दिखा रहा नेशनल मीडिया! ख़बरों के नाम पर बकवास और तमाशा!
आज तक की एंकर अंजना ओम कश्यप ने व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लीविट का हवाला देते हुए दर्शकों को बताया कि ईरान ने तेहरान स्थित अमेरिकी दूतावास में 66 अमेरिकी राजदूतों को बंधक बना लिया है। यही ख़बर टिकर पर भी दिखाई दी। एक अन्य रिपोर्टर ने हस्तक्षेप करते हुए बताया कि 1979 से तेहरान में अमेरिका का कोई दूतावास नहीं है। कश्यप ने अपनी ग़लती स्वीकार की और ऑन एयर माफ़ी माँगी!
 
आज तक, इंडिया टुडे और एनडीटीवी ने बहरीन के मनामा का एक पुराना वीडियो प्रसारित किया, जिसमें एक ईरानी ड्रोन एक गगनचुंबी इमारत से टकराता हुआ दिखाई दे रहा था। उन्होंने दावा किया कि यह दुबई का फुटेज है! हालाँकि क्लिप में साफ़ तौर पर मनामा स्थित ज़ाया टावर दिखाई दे रहा था।
 
इसी मेनस्ट्रीम मीडिया ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी ऐसी ही हरकतें की थीं। जैसे कि उन दिनों व्हाट्सएप पर वायरल हुए एक फॉरवर्ड मैसेज में झूठा दावा किया गया कि भारतीय नौसेना का जहाज (आईएनएस) विक्रांत लाहौर पहुँच गया है। बाद में यह दावा कराची पर विमानवाहक पोत के हमले की ओर मुड़ गया! कुछ ही मिनटों में कई टेलीविज़न चैनलों ने इस दावे को 'ब्रेकिंग न्यूज़' के रूप में दिखाना शुरू कर दिया, और कुछ ने कराची पर नौसैनिक हमले के फुटेज के रूप में असंबंधित दृश्य भी प्रसारित किए! जबकि ऐसा कुछ हुआ ही नहीं था।

 
एक मामले में एक ऊंची इमारत में भीषण आग का वीडियो यूएई में ईरानी ड्रोन हमले के फुटेज के रूप में व्यापक रूप से साझा किया गया। बूम द्वारा किए गए तथ्य-जाँच में पता चला कि यह क्लिप वास्तव में 2015 में शारजाह में एक आवासीय इमारत में लगी आग का था। इस भ्रामक दावे को ज़ी न्यूज़ ने भी साझा किया था!
 
एक अन्य मामले में, यात्रियों के विमान से बाहर निकलने का एक वीडियो ऑनलाइन प्रसारित हुआ, जिसमें इसे ईरान के मिसाइल हमले के बाद इज़राइली लोगों द्वारा हवाई अड्डे से भागने का दृश्य बताया गया। बूम ने फुटेज का पता लगाया और पाया कि यह डेनवर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर अमेरिकन एयरलाइंस द्वारा की गई निकासी का था, जिसका संघर्ष से कोई संबंध नहीं था। इस क्लिप को रिपब्लिक भारत ने भी ब्रेकिंग वॉर न्यूज़ बताकर साझा किया था!
 
ऐसे अनगिनत मामले मिले हैं, जिससे पता चलता है कि आज के समय में मीडिया पुरानी तस्वीरों और भ्रामक क्लिपों के मिश्रण से ख़बरें पेश कर रहा है!
 
मीडिया ने स्थिति को निरंतर तमाशे में बदला
पता नहीं चल पा रहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप, भारतीय मीडिया और व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी, इनमें से ज़्यादा झूठा कौन है। ऐसा लगता है कि जंग लड़ रहे देशों ने भारतीय मीडिया को आधिकारिक ढंग से अपना प्रवक्ता चुन लिया हो! जंग लड़ने वाले देश जो नहीं कहते, हमारा मीडिया कह देता है! वे देश जो नहीं करते, हमारी मीडिया उसे करा हुआ बता देते हैं!
 
अमेरिका, इज़राइल, ईरान, रूस, कोई भी हो, किसी का इंतज़ार किए बिना ही हमारे मीडिया ने उसका अपना 'अभियान' शुरू कर दिया! विश्वयुद्ध तो हमारा मीडिया न जाने कितनी बार करा चुका होगा। अब तो उसकी गिनती करना भी नामुमक़िन है। ऐसा लगा कि हमारा मीडिया युद्ध की माँग कर रहा हो, और बता भी रहा हो कि युद्ध को अंजाम तक कैसे पहुँचाना चाहिए!
 
मीडिया को मसाला मिल गया है और वे पागलपन की चरमसीमा को पार कर चुका है। कान फाड़ देने वाला ऐसा शोर हर जगह सुनाई देता है, लगता है कि एंकर के पास ही क्लस्टर बम गिरा होगा। आधिकारिक पुष्टि का इंतज़ार कौन करेगा भला, जब टीआरपी की दौड़ में लगना है।

 
कितने लोग मारे गए इसकी गिनती जंग में शामिल देश करेगा उससे पहले हमारा मीडिया कर लेता है! किस देश का कितना नुक़सान हुआ, किस हथियार से हुआ, हथियार किस दिशा से आया था, किस एंगल से आया था, सब भारतीय मीडिया को पता है, जंग लड़ रहे देश को पता हो या न हो!
 
रूस, यूक्रेन, ईरान, इज़राइल, अमेरिका के नागरिकों या उनके पत्रकारों को जो पता नहीं होता, वह भारत के इन एंकरों को पता होता है! इन देशों के नागरिकों को भारत के न्यूज़ चैनल देखने चाहिए, ताकि इन्हें ताज़ा अपडेट और ब्रेकिंग न्यूज़ ज़ल्दी से मिल पाए।
 
अमेरिका, रूस, यूक्रेन, इज़राइल, ईरान, चीन, ब्रिटेन, आदि देशों की सरकारों और सेना ने क्या तय किया है यह भले उन देशों के लोगों को पता न हो, लेकिन हमारे मीडिया को पता होता है! किस राष्ट्राध्यक्ष ने आधी रात को किस सेनाध्यक्ष के साथ क्या बात की और कब कहाँ कौन सा मिसाइल गिरेगा, यह सब इन्हें पता होता है!
 
भारत-पाकिस्तान, पाकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान, रूस-यूक्रेन, इज़राइल-हमास, अमेरिका-ईरान, सभी जंगों के समय यह मीडिया इतना बेलगाम हुआ कि थोड़ा सा दिमाग़ इस्तेमाल कर लेने भर से ही इनकी शरारतें, जो अपराध के दायरे तक जा पहुँची, और अब उस हद से भी आगे जा चुकी है, का पता चल जाता है।
 
सनसनी, नाटकीयता, चीखना चिल्लाना, झूठी भ्रामक और भड़काऊ ख़बरों का बकवास
मिसाइलों के चमकते ग्राफ़िक्स, विस्फोटों के बार-बार दिखाए जाने वाले द्दश्य, अगले हमले की भविष्यवाणी करने वाले उलटी गिनती के टिकर, ब्रेकिंग और शॉट्स का शोर। लगा कि भारत के मीडिया को दूसरा कोई काम है ही नहीं।
 
कुछ ही घंटों में ईरान का आसमान अमेरिका के नियंत्रण में होगा... आज रात ट्रंप करेंगे अंतिम हमला... आज की रात भारी... इज़राइल बना देगा ईरान को श्मशान... ब्रेकिंग और शॉट... ईरान लेगा बदला... आज होगा सबसे भयानक हमला...। जैसे कि मीडिया की मंज़ूरी के बाद ये देश हमले करते हो!
 
जो इस युद्ध से किसी न किसी रूप से प्रभावित हो उनके लिए तथा दूसरे लोगों के लिए भी जानकारी का एकमात्र माध्यम मीडिया होता है। और यह मीडिया ख़ूनी ड्रैकुला सा बना हुआ है, जहाँ ख़बरों के नाम पर ज़्यादातर बकवास ही मिला।
 
इनके प्रस्तुतिकरण में ही इतनी ज़्यादा सनसनी होती है कि लगता है कि एकाध मिसाइल इनके स्टूडियो में गिरा होगा और इसलिए वे इतने चीखते चिल्लाते होंगे! वैसे एक बात तो हमेशा से दिखी है कि हमारे मीडिया में पाकिस्तान को लेकर जिस तरह का उन्माद होता है या एंकरिंग होती है, चीन के मामले में समूचा सिलेबस बदल जाता है!
 
मशहूर कवि और व्यंग्यकार संपत सरल ने एक बार कहा था - मीडिया वाले डिबेट ऐसे कराते है, जैसे अवध का नवाब मुर्गे लड़ा रहा हो! जंग के दौरान इनके स्टुडियो में पैनलिस्ट और कथित रक्षा विशेषज्ञों की तो बरसात हो जाती है! यह पैनलिस्ट और कथित विशेषज्ञ भी अलग अलग मॉडल या अलग अलग टाइप के ये लोग ले आते हैं। सनसनी, नाटकीयता, जैसी चीज़ें इनके पैनलिस्ट में भी दिख जाती हैं।

 
मीडिया ऐसे पेश आता है जैसे कि किसी देश की सेना के सेनाध्यक्षों को युद्ध करना ही न आता हो, उनसे अच्छा युद्ध इनके पैनलिस्ट या विशेषज्ञ और उनसे भी अच्छा युद्ध इनके एंकर कर लेते हैं! भारतीय सेना पाकिस्तान के भीतर दो या तीन किलोमीटर तक अंदर गई होगी, ये लोग तो लाहौर और कराची तक सेना को लेकर चल देते हैं!
 
किसी जंग के दौरान ये लोग जो मन में आया वह बोलते नहीं बल्कि बकवास करने लगते हैं। ख़बर को जाँचना, परखना, सोर्स कंफ़र्म करना, समाचार की तरह संयमित अंदाज़ में उस ख़बर को पेश करना, यह सब ख़त्म हुए बहुत समय बीत चुका है। सनसनी, ड्रामेटिक प्रेजेंटेशन, भयानक बैकग्राउंड म्यूज़िक, चीखना चिल्लाना, बकवास करना, ख़बर की हत्या करना, एजेंडा चलाना, सरकारी जुतों के तले रेंगना, यही आज मीडिया की तासीर दिखती है।
 
भारत-पाकिस्तान के बीच संघर्ष, जिसे ऑपरेशन सिंदूर के नाम से जाना गया, उसके बाद पाकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान का हिंसक संधर्ष, अमेरिका-इज़राइल और इरान का पूर्ण युद्ध, सब मौक़ों पर मीडिया के भीतर एक सीन दिखा, जिसमें लगा कि कई बार तो एंकर अपने रिपोर्टरों की रिपोर्ट सुनता ही नहीं और ख़ुद को जो बोलना है वो उस रिपोर्टर के हवाले से बोल देता!
 
मीडिया अपनी अपुष्ट और अप्रामणिक ख़बरों को ऐसे पेश करता है जैसे कि सारी सरकारी व ख़ुफ़िया बैठकें मीडिया को साथ लेकर की जाती होगी! ऊपर से इस मीडिया ने एक नया नियम बना दिया है कि युद्ध के समय सरकारें नहीं बोलेगी, एंकर ही बोला करेंगे! ऊपर से एंकर ये भी नहीं बताएँगे कि सरकार ने क्या बताया है!
 
4 हफ़्ते की रोक का क्या परिणाम आएगा? जिस मीडिया की दुम अदालती जुर्मानों और फटकार के बाद भी सीधी नहीं हुई वह इससे क्यों सीधी हो?
वैसे 4 हफ़्ते की रोक का विशेष अर्थ नहीं रह जाता। सबसे पहली वजह यह कि मीडिया पिछले कई सालों से कथित रूप से सत्ता की मुठ्ठी में भींचा हुआ है। उसे सत्ता झुकने के लिए कहे तो वह झुकने की जगह रेंगने लगता है! लगभग तमाम मेनस्ट्रीम मीडिया बड़े बड़े उद्योगपति घरानों की ज़द में हैं। और उद्योगपति सत्ता से कभी दुश्मनी नहीं करते।
 
चंद कॉर्पोरेट घरानों या राजनेताओं के स्वामित्व के तले दबे हुए मीडिया में पक्षपातपूर्ण और एजेंडा-आधारित रिपोर्टिंग, सनसनीखेज़ और झूठी ख़बरें, विज्ञापन राजस्व पर निर्भरता, जनता के मुद्दों की अनदेखी, जैसे तत्व मिल जाते हैं।
 

हमारे इस गोदी मीडिया को पिछले कुछ सालों में अनेक बार अदालती फटकार, जुर्माना, अदालती चेतावनी, आदि गलियों से गुज़रना पड़ा है। बड़े बड़े और ख़ुद को देश का नंबर 1 चैनल बताने वाले मीडिया हाउस अदालतों से जुर्माना या फटकार खा चुके हैं! मीडिया से संबंधित संस्थान भी अनेक बार इन न्यूज़ चैनलों पर जुर्माना लगा चुके हैं, चेतावनी दे चुके हैं।
 
जो मीडिया अपने संस्थान और देश की अदालतों के जुर्मानों या फटकार से नहीं सुधरा वह सरकार के इस फ़ैसले से क्यों सुधरेगा? कथित रूप से मीडिया सरकारी जूतों के नीचे दबा पड़ा है वह क्यों ज़िम्मेदार बनेगा? उसे सत्ता के कुत्ते के रूप में लोग देखने-समझने लगे हैं, तो फिर इसकी दुम क्यों सीधी होगी?
 
कुछ ताज़ा मामले देखे तो,
'जिहाद' से नफ़रत परोसने पर एनबीडीएसए ने न्यूज़ चैनलों को कंटेट को हटाने का आदेश दिया, चेतावनी दी
अभी कुछ दिनों पहले ही, फ़रवरी 2026 के आख़िरी सप्ताह में, न्यूज़ ब्रॉडकास्टिंग एंड डिजिटल स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी यानी एनबीडीएसए ने ज़ी न्यूज़, टाइम्स नाउ नवभारत, न्यूज़18 और एनडीटीवी न्यूज़ चैनलों को चेतावनी दी थी। कारण था कि इन चैनलों ने कुछ ख़बरों में 'जिहाद' शब्द का ग़लत इस्तेमाल किया, जैसे 'फूड जिहाद', 'थूक जिहाद' और 'क्यूआर कोड जिहाद'। इन मामलों में इन चैनलों को चेतावनी दी गई, साथ ही कंटेंट को हटाने को भी कहा गया।
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार कुछ वक़ीलों ने इस मामले में शिकायत की थी कि इन चैनलों ने अलग-अलग अपराध की घटनाओं को 'जिहाद' कहकर धार्मिक रंग दे दिया, जबकि कोई सबूत नहीं था कि ये किसी संगठित साज़िश का हिस्सा हैं।
 
शिकायत की गई थी कि कई चैनलों पर कुल 465 ऐसी ख़बरें मिलीं थीं, जहाँ 'जिहाद' जैसे शब्दों का इस्तेमाल हुआ था। ये ख़बरें अलग-अलग घटनाओं से जुड़ी थीं। इनमें शामिल थीं - खाने में मिलावट या ग़लत खाना परोसने की अफ़वाहें, खाने में थूकने की शिकायतें, किसी रेस्तरां मालिक द्वारा अपनी पहचान छिपाने का आरोप, संभल में हुई हिंसा के बाद क्यूआर कोड से दान माँगने की घटना।
 
एनबीडीएसए ने अपने आदेश में कहा कि इन घटनाओं की रिपोर्टिंग ठीक है, लेकिन बिना सबूत के इसे 'जिहाद' कहना ग़लत था। चैनलों को चेतावनी दी गई और विवादित कंटेट को हटाने के लिए कहा गया।
 
एनबीडीएसए एक स्व-नियामक संस्था है, जो न्यूज़ ब्रॉडकास्टर्स एंड डिजिटल एसोसिएशन यानी एनबीडीए द्वारा स्थापित की गई है। यह निजी टीवी न्यूज़ चैनलों और डिजिटल न्यूज़ पब्लिशर्स पर लागू होती है, जो इसके सदस्य हैं। एनबीडीएसए का मुख्य काम आचार संहिता और प्रसारण मानक का पालन सुनिश्चित करना है। यह चैनलों के ख़िलाफ़ शिकायतों पर या या स्वतः संज्ञान लेकर जाँच करती है और उल्लंघन पाए जाने पर कार्रवाई कर सकता है।
 
झूठी रिपोर्टिंग के लिए एनबीडीएसए ने ज़ी न्यूज़ पर 1 लाख का जुर्माना लगाया
जिहाद वाली घटना से कुछ सप्ताह भर पहले, यानी फ़रवरी 2026 में ही, एनबीडीएसए ने ज़ी न्यूज़ पर 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाया था। यह कार्रवाई एक फ़र्ज़ी और भ्रामक रिपोर्ट के बदले में की गई थी, जिसमें चैनल ने दावा किया था कि जम्मू-कश्मीर के रामबन इलाक़े में एक मुस्लिम ट्रक ड्राइवर ने ट्रक की छत पर नमाज़ पढ़ी, जिससे श्रीनगर-जम्मू हाईवे पर भारी जम लग गया।
चैनल का यह रिपोर्ट जाँच के बाद झूठा साबित हुआ, जिसके बाद एनबीडीएसए ने कहा कि चैनल ने नैतिकता, संहिता और प्रसारण मानकों का उल्लंघन किया है, ख़ासकर सटीकता के सिद्धांत का। बता दें कि इस नेशनल चैनल ने अपनी न्यूज़ को सोशल मीडिया के एक दावे के आधार पर बिना जाँचे चला दिया था!
 
ज़ी न्यूज़ पर झूठी, भ्रामक और सांप्रदायिक ख़बरों को चलाने के आरोपों की वर्तमान और इतिहास की सूची काफी लंबी है। इस चैनल पर पहले भी कुछ ऐसे ही मामलों में जुर्माना लग चुका है, चेतावनी दी जा चुकी है।
 
नेशनल न्यूज़ चैनलों पर तथा अन्य न्यूज़ चैनलों पर झूठी, भ्रामक और सांप्रदायिक ख़बरों को प्रसारित करने की सूची लंबी है
ख़ुद को देश का नंबर वन न्यूज़ चैनल बताने वाले इस मेनस्ट्रीम मीडिया का दामन झूठी, भ्रामक और सांप्रदायिक ख़बरों को परोसने को लेकर अनेक बार दाग़दार हो चुका है।
 
फ़ेक न्यूज़ ऑन मीडिया के आठ-दस से ज़्यादा लंबे लेख हम प्रकाशित कर चुके हैं, जिसमें बड़े बड़े न्यूज़ चैनल राष्ट्रीय स्तर के मामलों में बेलगाम होकर झूठी ख़बरें परोसते नज़र आते हैं। ऑल्ट न्यूज़, बूम लाइव, फ़ैक्टचेकर, क्विंट वेबकूफ, आदि फ़ैक्ट फाइंड प्लेटफॉर्म पर हर दिन अनेक ऐसी ख़बरों का पर्दाफ़ाश होता है।

 
2020 में रिपब्लिक टीवी, इंडिया टुडे और अन्य एक टीवी चैनल का नाम टीवी रेटिंग स्कैम में आया था, जिसकी जाँच उन दिनों मुंबई पुलिस कर रही थी। उन दिनों मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, मुंबई पुलिस के तत्कालीन कमिश्नर परमबीर सिंह ने कहा था कि पुलिस ने उन लोगों से बात की तो पता चला कि उनको टीआरपी बढ़ाने के लिए टीवी चैनल देखने के पैसे मिले थे।
 
अनेक फ़िल्मी, सामाजिक, राजनीतिक, सांप्रदायिक, आर्थिक, सरकारी, नागरिक आंदोलन, लगभग तमाम मामलों में देखा गया है कि कईं न्यूज़ चैनल फ़र्ज़ी और पूर्वाग्रही मुहिम चलाते रहे। इस मीडिया ने भारत देश के कुछ पड़ोसी देशों के साथ रिश्ते भी दाँव पर लगाए!
चमत्कार और अंधविश्वास को हमारा मीडिया या न्यूज़ चैनल ही पसारते दिख जाते हैं! ज्योतिष और तथाकथित साधु-संतों के प्रवचनों की भी बाढ़ यही से निकलती है। भूत-प्रेत, सूनी हवेलियाँ, चमत्कार, दुनिया ख़त्म होने की घोषणाएँ, दूसरे ग्रहों से आने वाले जीव-जंतु, अवैज्ञानिक जानकारियों से भरी कहानियों वाला मीडिया, जिसने सास-बहू और साज़िश का विचार भी दिया!
 
न्यूज़ चैनल आये दिन लगभग तमाम मामलों में स्टूडियो के अंदर अदालतें लगा देते हैं! मामला कोई भी हो, न्यूज़ चैनल ख़बर के नाम पर अंतिम फ़ैसला देने लगे हैं! चीखना चिल्लाना, नाटकीय ढंग से पेश आना, कुतर्क चलाना, मार पीट, गाली गलौच, भारतीय मीडिया ख़ुद को सबसे कमतर स्तर पर ले जा चुका है।
 
भारत के लगभग तमाम न्यूज़ चैनल हर दिन और हर मिनट, ख़बरों की हत्या करते हैं। एजेंडा, प्रोपेगेंडा, टीआरपी का खेल, यही भारतीय मीडिया की पहचान हो चली है। जिस मीडिया को ग़रीबी, बेरोजगारी से जंग करनी चाहिए, वह आम दिनों में सास बहू के बीच जंग कराता है और थोड़े ख़ास दिनों में दो देशों के बीच कराता रहता है।
 
नोट करना होगा कि हदें पार करते हुए मीडिया के सामने सत्ता कब की इन हदों को तोड़ चुकी है। सत्ता राष्ट्रीय सुरक्षा, नियम, गोपनीयता, आदि के नाम पर कईं यूट्यूब न्यूज़ चैनल को बैन कर देती है, उधर जो मेनस्ट्रीम मीडिया संस्थान और अदालत की फटकार और जुर्माना झेल चुके हैं, वे बेरोकटोक चलते हैं!
 
हालात यह हो चले है कि अब न्यूज़ चैनलों के एंकरों को, माँ कसम झूठ नहीं बोल रहा इस बार यक़ीन कर लो, कहकर न्यूज़ देनी चाहिए। जिन एंकरों को घोषित संपत्ति और रिकवर संपत्ति का फ़र्क़ पता नहीं होता वे मिनटमैन, टॉमहॉक, शाहीन, फतह, हेरॉन, एटन, जेरिको, आयरन डोम, थाड, बावर, के पुर्ज़े पुर्ज़े के एक्सपर्ट हो चुके हैं! दुनिया के कुछ देश सुपरपावर बनने के लिए लड़ रहे हैं, और मीडिया सुपरलायर बनने के लिए!
(इनसाइड इंडिया, एम वाला)