देश के एनएसए, यानी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, जैसे संवेदनशील ओहदे को
धारण करने वाले अजीत डोभाल ने देश के युवाओं, यूँ कहे कि जेन ज़ी को, सार्वजनिक रूप से सलाह दी कि भारत के 'दर्दनाक इतिहास का बदला' लीजिए।
यूँ तो देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार का दायित्व देश के
प्रधानमंत्री को देश की सुरक्षा से संबंधित मामलों में सलाह देना है। राष्ट्रीय
सुरक्षा के मामलों में इन दिनों जो भद्द पिट रही है वह सार्वजनिक है। अपने मामले
में विफलता की स्थिति में दूसरे मामलों में नाक डालना नेताओं की आदत होती है, नौकरशाहों की नहीं।
अगर 'बदला' लेने का सार्वजनिक आह्वान किसी दूसरे ने किया होता तो उस पर एनएसए
क़ानून के तहत मामला दर्ज कर दिया जाता। लेकिन ये महाशय देश के एनएसए हैं, और इससे इतर वे किसी की
गुड बुक में शामिल हैं, फिर इन पर वो वाला एनएसए कहाँ से लग पाता?
जैसे कि ऊपर देखा, एनएसए का कर्तव्य है देश की सुरक्षा के विषय से संबंधित मामलों में
प्रधानमंत्री को सलाह देना। ताज़ा समय में सरकार कमज़ोर है, ट्रंप और अमेरिका के आगे
बेबस है, पड़ोसी देशों से उलझी हुई
है, सलाह की ज़रूरत पीएम को
है, नागरिकों को नहीं।
वैसे इतिहास को तो आलू मटर की तरह छीला
तो जा ही रहा है। ऊपर से उस इतिहास में क्या दर्दनाक था और क्या सुखद, इसे तय करने की विधि भी सहूलियतवाली या
लचीली है। उपरांत इतिहास और उस इतिहास का दर्द,
इसकी धारणा या अवधारणा व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी तय करने लगी है।
देश के एनएसए अजीत डोभाल राष्ट्रीय
सुरक्षा मामलों में क्या सलाह देते होंगे और उसके क्या परिणाम आते हैं, इसका
वर्तमान सार्वजनिक है। और ये महाशय उस शर्मनाक वर्तमान को छोड़ इतिहास की ख़ाक
छानने लगते हैं। बार बार प्रधानमंत्री की प्रशंसा के नाम पर लगभग ठकुरसोहाती की
दहलीज़ पर पहुँचने का इनका अंदाज़ निराला भी है।
देश के एनएसए अजीत डोभाल
की युवाओं को विवादित सलाह - भारत के दर्दनाक इतिहास का बदला लीजिए
देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत
डोभाल ने 10
जनवरी 2026
के दिन नई दिल्ली में विकसित भारत यंग लीडर्स डायलॉग-VBYLD के
कार्यक्रम में युवाओं को एक विवादित सलाह दे डाली। इन्होंने देश के युवाओं को 'भारत
के दर्दनाक इतिहास का बदला' लेने का आह्वान किया।
अजीत डोभाल ने कहा, "भारत
को अपनी पुरानी गुलामी, हमलों और अधीनता के इतिहास का बदला लेना चाहिए। लेकिन यह बदला
सशक्त और महान भारत के पुनर्निर्माण के रूप में होना चाहिए।"
यूँ तो दुनिया में पिछले कुछ सालों से
ऐसे ही राजनीतिक जुमले चल रहे हैं। लगभग हर देश के नामी लोग कहते हैं कि उनका देश
महान था, और
अब फिर से महान बनाना है। अमेरिका, पाकिस्तान, भारत, इज़राइल, ईरान, रूस, इंग्लैंड, सब के यहाँ मेक ग्रेट अगेन के जुमले चल रहे हैं।
अपना भाषण देते हुए अजीत डोभाल ने
युवाओं के सामने भगत सिंह की फांसी, सुभाष चंद्र बोस का संघर्ष और महात्मा गाँधी के सत्याग्रह का
ज़िक्र किया। स्वतंत्र भारत और गुलाम भारत की भी बात कही। साथ ही दुनिया में चल
रहे सभी युद्धों को थोपे हुए युद्ध बताते हुए कहा कि शक्तिशाली ही स्वतंत्र रह
सकता है। अपुन हटके थे और बाकी सब का पानी कम था, टाइप सड़क भी छानी।
डोभाल ने अपने भाषण में कहा, "भारत
की सभ्यता बड़ी विकसित सभ्यता थी... जबकि सारी दुनिया बहुत पिछड़ी हुई थी।"
उन्होंने कहा, "हमने
किसी अन्य सभ्यता पर हमला नहीं किया, उनके मंदिर नहीं तोड़े, लेकिन सुरक्षा के प्रति जागरूकता की कमी
के कारण इतिहास ने हमें सबक सिखाया। अनगिनत लोग मारे गए, मंदिर
नष्ट हुए, गाँव
लूटे गए और हमारी सभ्यता कुचली गई, जबकि हम लाचार दर्शक बने रहे।"
उन्होंने आगे कहा, "इतिहास
हमें चुनौती देता है। आज के युवाओं में वह आग है। 'बदला' शब्द
अच्छा नहीं है, लेकिन
यह बहुत शक्तिशाली है। हमें अपने मूल्यों पर आधारित महान भारत का पुनर्निर्माण
करके देश का बदला लेना चाहिए।"
ऐसे कार्यक्रमों में भाषण देते हुए
वर्तमान नेतृत्व की प्रशंसा करने की आदत रखने वाले एनएसए ने यहाँ भी वर्तमान
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ़ करते हुए कहा, "मनोबल बनाए रखने के
लिए लीडरशिप ज़रूरी होती है। हमारे देश में आज ऐसा नेतृत्व है जो प्रेरणा स्रोत
है। एक ऐसा लीडर है, जिसने 10 वर्षों में देश को कहाँ से कहाँ पहुँचा
दिया। उनकी प्रतिबद्धता, समर्पण और कड़ी मेहनत हम सबके लिए आदर्श है।"
मुश्किल वर्तमान को भूल
कर युवा अनगिनत दिक्कतों के बीच महान भारत के जुमले पर चलते हुए पुनर्निमाण कैसे
करें?
यूँ तो एनएसए के भाषण में बहुत सारे
शब्द स्पष्ट रूप से ऐसे थे, जिन्हें सालों या दशकों से 'राजनीतिक जुमलों' के
रूप में परिभाषित किया जाता रहा है।
अजीत डोभाल को लगे हाथ यह भी स्पष्ट
करना चाहिए कि वोट चोरी, एसआईआर, ऑपरेशन लोटस, अमेरिका के सामने रेंगने वाली नीति, हर
दिन ट्रंप का पीएम मोदी का तेल निकालते रहना, ऑपरेशन सिंदूर के बाद सरेंडर मोदी वाला
तमगा, विवादास्पद
ढंग से लागू किए गए सीज़फायर का विवाद, अभूतपूर्व बेरोजगारी, महंगाई, कमज़ोर
आर्थिक हालात, इन
सबके बीच महान भारत के पुनर्निर्माण का नया टास्क युवा कैसे करें?
उन्हें बताना चाहिए था कि नोटबंदी या
नोटबदली के बाद कमज़ोर हो चुका सामाजिक और आर्थिक तंत्र, उसके
बाद जीएसटी का कमरतोड़ आक्रमण, आसमान छूती महंगाई, रूपये का सबसे निचला स्तर, ऐतिहासिक
बेरोजगारी, कोविड
के बाद के मुश्किल हालात, इन सबके बीच युवा देश का पुनर्निर्माण करें या इन अनगिनत
दिक्कतों से लड़े?
डोभाल ने अपने बयान में यह साफ़ नहीं
किया कि उस कथित दर्दनाक इतिहास का बदला भारत के युवा किस तरह लें? उन्होंने
बदला लेने का स्वरूप, उसके तरीक़े, पर चर्चा नहीं की। अलबत्ता यह ज़रूर कहा कि भारत का फिर से
निर्माण किया जाना चाहिए।
वरिष्ठ पत्रकार और लेखक तवलीन सिंह ने
लिखा, "हमारे
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के भाषण ने मुझे असमंजस में डाल दिया। उन्होंने हमारी
सभ्यता को नष्ट करने वालों से बदला लेने की बात कही। तो फिर हम सबसे पहले किस पर
हमला करें - अफ़ग़ानिस्तान पर, उज़्बेकिस्तान पर या तुर्की पर?"
द हिंदू की डिप्लोमैटिक अफ़ेयर्स की
एडिटर सुहासिनी हैदर ने लिखा, "क्या
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार यह संकेत दे रहे हैं कि भारत अपने उपनिवेशवाद का
प्रतिशोध लेगा? ब्रिटेन
से या उज़्बेकिस्तान से या जहाँ से भी उपनिवेशवादी आए थे?"
प्रोफ़ेसर आदित्य मुखर्जी कहते हैं, "आज
दो बीमारियाँ फैली हुई हैं। एक, जिनका इतिहास से कोई लेना-देना नहीं है, वही
इतिहास बदलने में लगे हैं; और दूसरी, इतिहास को इस तरह पेश किया जा रहा है कि लोगों के भीतर आपस में
लड़ाई पैदा हो।"
दिव्य और भव्य की राजनीति देश के
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के सिर पर चढ़कर बोलने लगी हो, वे
अपने दायरे और दायित्व से बाहर जाकर भारत का इतिहास, दर्दनाक इतिहास, महान
भारत, जैसे
राजनीतिक जुमले के अंदाज़ में भाषणबाजी करने लगे, तब क्या कहा जाए?
निरीक्षक की कृपा द्दष्टि
से जैसे तैसे उर्तीण होने वाला मैट्रिक छात्र यूपीएससी में टॉप कैसे किया जाए उसका
ज्ञान बाँट रहा है!
देश के एनएसए का काम क्या है सबको पता
है। ऐसे में देखा जाए तो ऑपरेशन सिंदूर से पहले और उसके बाद जितनी भी फज़ीहत मोदी
सरकार की हुई, दुनिया
के सामने ट्रंप ने जितना भी तेल पीएम मोदी का निकाला, उसके
लिए अजीत डोभाल भी कम ज़िम्मेदार माने नहीं जा सकते।
इतना ही नहीं, अफ़ग़ानिस्तान, नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश, म्यांमार, पाकिस्तान, चीन, मालदीव, भूटान, सभी
के साथ एक से अधिक मामलों में मोदी सरकार और भारत देश ने जितना भी नुक़सान सहा, जो
भी विवाद हुए, उसके
लिए भी अजीत डोभाल कम ज़िम्मेदार माने नहीं जा सकते।
मणिपुर पिछले दो से अधिक सालों से जल
रहा है, दूसरे
राज्य भी अनेकों बार हिंसा में झुलस चुके हैं, एनएसजी का कश्मीर में विफल इस्तेमाल, भारतीय
सेना के साथ एनएसजी का वो विवाद, कश्मीर की स्थिति, लद्दाख विवाद, सभी विवादों और विफलताओं का बड़ा श्रेय अजीत डोभाल को ही जाता
है।
यूँ तो वे किसी की गुड बुक में हैं और
वे जिनकी गुड बुक में हैं उनकी मुठ्ठी में देश का मीडिया भींचा हुआ है। वर्ना आज
भी स्वतंत्र विश्लेषक यह चर्चा करते हैं कि अजीत डोभाल का नाम एक नाकाम एनएसए के
रूप में क्यों नहीं लिया जाना चाहिए?
इन्हीं के दौर में सीबीआई वर्सेज़
सीबीआई का वो अभूतपूर्व और चौंकाने वाला घटनाक्रम हुआ, जिसकी
किसी ने कल्पना तक नहीं की थी। आधी रात को सीबीआई का तख़्तापलट, यह
ऐतिहासिक रूप से विवादित घटनाक्रम था। कौन भूल सकता है कि सीबीआई के डीआईजी स्तर
के अधिकारी ने लिखित रूप से अजीत डोभाल पर सर्वोच्च अदालत में आरोप लगाए थे।
इन्हीं के दौर में देश की सेना और उसके
संसाधनों के ऊपर सीधे आतंकी हमले शुरू हुए। इन्हीं के दौर में भारतीय सेना और उसके
सैनिकों ने इतिहास के सबसे बड़े आतंकी हमले झेले। इन्हीं के समय में देश के राज्य
अस्थिर हुए और हिंसा में झुलसते रहे।
अरब वर्ल्ड और दुनिया में नाकाम आउटरीच, तमाम
पड़ोसी देशों के साथ ग़लत नीतियों के चलते ख़राब रिश्तों का ऐतिहासिक दौर, यह
सब इन्हीं के कार्यकाल के दौरान हुआ। न पठानकोट के आतंकी पकड़े गए, ना
ही पहलगाम के। पुलवामा हमले में आरडीएक्स कैसे आया था, यह तक पता नहीं चल पाया है
अब तक!
लगता है कि स्वयं उन्हें ही किसी
विशेषज्ञ से सलाह मशविरा की ज़रूरत है, ताकि वे देश के प्रधानमंत्री को सही
सलाह देकर उनकी मदद कर सकें। लेकिन अनारकली डिस्को चली!
वे तो देश के युवाओं को सलाह देने में जुटे हुए हैं!
यूँ कहे कि 10वी
या 12वी
में निरीक्षक की कृपा द्दष्टि से जैसे तैसे उर्तीण होने वाला छात्र यूपीएससी में
टॉप कैसे किया जाए उसका ज्ञान बाँट रहा है!
काला धन मामले में भारत
की नयी डी कंपनी का तमगा वाली रपटें, आधी
रात को सीबीआई में तख्तापलट, अमेरिकी
कोर्ट का समन, जैसे सार्वजनिक विवादों का साया
हमने यहाँ तीन बड़े सार्वजनिक विवाद का
ज़िक्र किया है। यानी कि दूसरे विवाद, जो अजीत डोभाल के बारे में हुए, और जिन्हें कम जगह मिल पाईं, उन्हें
हम फ़िलहाल छोड़ देते हैं। जब वे एनएसए नहीं थे तब कंघार हाईजैक मामला, पाकिस्तानी
आतंकी मसूद अज़हर को लौटाना, अजीत डोभाल की उपस्थिति, उन घटनाक्रम को भी छोड़ देते हैं।
अभी कुछ समय पहले ही, यानी
2019
के शुरुआती दिनों में देश के तत्कालीन एनएसए अजीत डोभाल को लेकर बेहद सनसनीखेज़
ख़बरें छपी थीं। भारत की कैरवां पत्रिका ने उन पर लंबी स्टोरी की थी और उस स्टोरी
में इन्हें 'भारत
की नयी डी कंपनी' कहा
गया था।
कौशल श्रॉफ नाम के एक खोजी पत्रकार ने
अमेरिका,
इंग्लैंड, सिंगापुर
और केमैन आइलैंड से दस्तावेज़ जुटाकर एनएसए अजीत डोभाल के बेटों के काले धन को
सफ़ेद करने और भारत के पैसे को बाहर भेजने के कथित कारोबार का खुलासा किया था।
कैरवां और कुछ एकाध-दो मीडिया हाउस ने इसे छापा था।
एनएसए अजीत डोभाल और उनके बेटों विवेक
और शौर्य के कथित कारनामों को उजागर करने वाली कैरवां पत्रिका ने अपनी रिपोर्ट में
'भारत
में एक और डी कंपनी' शीर्षक दिया था। सीबीआई के विशेष जज लोया की मौत पर 27
रिपोर्ट छापने वाली कैरवां पत्रिका ने लिखा था कि नोटबंदी जैसे फ़ैसले के महज़ कुछ
दिनों के बाद का ही यह समय था।
कैरवां की उस रिपोर्ट के अनुसार नोटबंदी
के ठीक 13
दिन बाद 21
नवंबर 2016
को टैक्स चोरी के गिरोहों के अड्डे केमैन आइलैंड में विवेक डोभाल ने अपनी कंपनी का
पंजीकरण कराया था। कैरवां के एडिटर विनोद होज़े के ट्वीट के अनुसार नोटबंदी के बाद
विदेशी निवेश के तौर पर सबसे अधिक पैसा भारत में केमैन आइलैंड से आया था। 2017
में केमैन आइलैंड से आने वाले निवेश में 2226 प्रतिशत की बढ़ोतरी
हुई थी। जी हाँ, 2226
प्रतिशत। एफडीआई का 17 सालों का रिकॉर्ड महज़ कुछ दिनों में
ही टूट गया था।
एनएसए अजीत डोभाल के बेटे, जो
कैरवां रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत के नहीं लेकिन इंग्लैंड के नागरिक हैं और
सिंगापुर में रहते हैं, उन दिनों GNY ASIA Fund के निदेशक थे। केमैन
आइलैंड टैक्स चोरों के गिरोह का अड्डा माना जाता है। कौशल श्रॉफ ने लिखा था कि
विवेक डोभाल यहीं 'हेज फंड' का धंधा करते हैं।
इस रिपोर्ट के अनुसार एक बड़े भाजपाई
नेता और अजीत डोभाल के दोनों बेटों, विवेक और शौर्य, का बिज़नेस एक दूसरे से जुड़ा हुआ था। उन दिनों शौर्य थिंक
टैंक इंडिया फाउंडेशन के प्रमुख थे, साथ ही बीजेपी के नेता भी। कारवां ने कथित दस्तावेज़ के आधार
पर आरएसएस के नेता राम माधव और शौर्य डोभाल की एक कंपनी के रिश्ते का भी ज़िक्र
किया था।
कैरवां ने छापा था कि विवेक डोभाल की
कंपनी के निदेशक हैं डॉन डब्ल्यू ईबैंक्स और मोहम्मद अलताफ़ मुस्लियाम। यानी, देश
के लोगों से हिंदू-मुस्लिम कराते रहिए, और ख़ुद उन्हीं के
साथ मिलकर कारोबार करिए! ईबैंक्स वो बदनाम
नाम है जिसका ज़िक्र पैराडाइज़ पेपर्स और पनामा पेपर्स में भी हो चुका है।
नोटबंदी, जिसे काला धन के ख़िलाफ़ ऐतिहासिक मुहिम
बताया गया था, कैरवां
ने सबको यह कहकर चौंका दिया कि नोटबंदी के सिर्फ़ 13 दिन बाद भारत के
नामी लोगों ने विदेश में काला धन का कारखाना खोल दिया था!
2018 के अंतिम महीनों में सीबीआई का वो
ऐतिहासिक विवाद हुआ था, जिसके बाद आधी रात को विवादास्पद ढंग से सीबीआई में तख्तापलट
भी हुआ। इसी घटनाक्रम के दौरान देश के एनएसए अजीत डोभाल पर भारत की सबसे बड़ी जाँच
एजेंसी सीबीआई के डीआईजी स्तर के आला अधिकारी एमके सिन्हा ने सनसीखेज़ आरोप लगाए
थे।
ख़ास बात यह कि सीबीआई के डीआईजी सिन्हा
ने यह आरोप बोलकर नहीं बल्कि लिखित रूप से लगाए थे, और वो भी सुप्रीम कोर्ट के
भीतर!
मामला राकेश अस्थाना का था, जिसका
केस एमके सिन्हा देख रहे थे। सिन्हा ने सुप्रीम कोर्ट में लिखित रूप से कहा था कि
देश के एनएसए अजीत डोभाल केस में अनधिकृत दखल देते थे और मामले को प्रभावित करने
की कोशिश करते थे। लिखित रूप से सिन्हा ने कहा था कि डोभाल के इशारे पर अस्थाना को
बचाया जा रहा था और उन्हें मामले से हटाकर उनका तबादला नागपुर कर दिया गया।
सीबीआई के डीआईजी सिन्हा के लिखित बयान
में दर्ज था कि अस्थाना के यहाँ छापेमारी से लेकर उसका फ़ोन ज़ब्त करने से डोभाल
ने रोका था। इस मामले में आलोक वर्मा, दुबई के एक मिडिलमैन मनोज, उसके भाई सोमेश, रॉ
के अधिकारी सामंत गोयल, राज्य स्तर के मंत्री हरिभाई पार्थीभाई चौधरी, नितिन
संदेसरा, आदि
का ज़िक्र भी हुआ था।
सितंबर 2024 के दौरान खालिस्तानी
आतंकवादी गुरपतवंत सिंह पन्नू मामले में अमेरिकी अदालत ने भारत के एनएसए अजीत
डोभाल को समन भेजा था। इस मामले में भी सामंत गोयल का नाम शामिल था। यह संभवत:
पहली बार था जब किसी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को अमेरिका या किसी दूसरे देश की
अदालत ने समन जारी किया हो।
अपने काम के लिए नहीं
लेकिन अपने विवादित बयानों के लिए क्यों चर्चा में रहे देश के एनएसए?
रॉ की स्थापना हुई तब से ही नहीं लेकिन
इससे पहले भी देश की सुरक्षा से जुड़े कामकाज देखने वाले अधिकारी ज़्यादातर पर्दे
के पीछे रहते थे और अपने काम को अंजाम दिया करते थे। रॉ के आर. एन. काव की तस्वीर
तक उन दिनों दुर्लभ हुआ करती थी।
सवाल उठता है कि अपने काम के लिए नहीं
लेकिन अपने बयानों से ही क्यों एनएसए चर्चा में रहे? राजनीतिक नेतृत्व
कैमरा प्रेमी हो सकता है, लेकिन ख़ुफ़िया काम करने वाले अधिकारी कैमरे और अख़बारों का
मोह पालने लगे तब विश्लेषण ज़रूरी हो जाता है।
सत्यहिंदी रिपोर्ट की माने तो, दिल्ली
ब्लास्ट के बाद अजीत डोभाल का एक वीडियो वायरल हुआ था। उन्होंने 2014
में कहा था कि ISI
ने
भारत में इंटेलिजेंस के लिए मुसलमानों से ज़्यादा हिंदुओं को भर्ती किया है। लेकिन
बाद में CNN
से
बातचीत में उन्होंने इसे डीपफ़ेक बताया यानी फ़र्ज़ी क़रार दिया। लेकिन फ़ैक्ट चेक
करने वाली वेबसाइट ऑल्ट न्यूज ने जाँच कर बताया कि अजीत डोभाल का वायरल वीडियो
असली था। ऑल्ट न्यूज के मुताबिक़ डोभाल ने 2014 में सचमुच ये कहा था
कि ISI ने
भारत में इंटेलिजेंस काम के लिए मुसलमानों से ज़्यादा हिंदुओं को भर्ती किया है।
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश के एनएसए
जैसे ओहदे पर बैठा अधिकारी, जिसका कर्तव्य देश को आंतरिक और बाहरी नापाक मंसूबों से बचाना
है, उसके
बयान में सांप्रदायिक विचारधारा और धृणा की बू आती है।
सीधी बात है कि वर्तमान में देश के भीतर
जो स्थितियाँ हैं उसे भूल कर देश के युवाओं को सदियों पुरानी घटनाओं की याद दिलाते
हुए आह्वान करने के लिए कहना, यह छलावा है। ग़रीब, बेरोजगार और बदतर आर्थिक हालात में जा
पहुँचे समाज को उकसाने सरीखा भाषण देश का एनएसए क्यों दे?
इस दर्दनाक इतिहास का
बदला लेना है या नही, जब कथित राष्ट्रवादी अंग्रेज़ों की ताक़त के सामने नतमस्तक
मोड में थे
'देश के दर्दनाक इतिहास का बदला लीजिए...' - देश
के एनएसए अजीत डोभाल ने देश के युवाओं को यह सलाह दी।
इतिहास स्वयं गवाह है इतिहास के दो
दर्दनाक घटनाक्रमों का। वह इतिहास, जब कथित राष्ट्रवादी लोग या समूह या संगठनों ने, जिसमें
आरएसएस का नाम प्रमुख रूप से लिया जाता है, अंग्रेज़ों की ताक़त के आगे नतमस्तक मोड
में रहना स्वीकार किया। भारत के अपने ही लोग, जो ख़ुद को देशभक्त नहीं बल्कि
राष्ट्रवादी बताते थे, उन्होंने भारते के उस अभूतपूर्व स्वतंत्रता संग्राम के दौरान
चींटी जितना भी योगदान नहीं दिया, बल्कि जो योगदान दे रहे थे उन्हें भला बुरा कहा, उनसे
असह्योग किया, उनके
देशहित के प्रयासों को बाधित किया।
इन्हीं समूह ने, न
तो भारत के सर्वोच्च राष्ट्रीय प्रतीक तिरंगे को स्वीकार किया और न संविधान को। यह
समूह सिर्फ़ अंग्रेज़ी सत्ता के दौरान ही नहीं, स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद बनी भारतीय
सरकारों के दौरान भी, सत्ता और पैसे की ताक़त के आगे लचीला बना रहा।
वह इतिहास भी दर्दनाक था, जब
महात्मा गाँधी की निर्मम हत्या कर दी गई। उस व्यक्ति की हत्या, जिसे
दुनिया ने मानवता का प्रतिनिधि माना था, जो दुनिया में सबसे ज़्यादा चर्चित और
लोकप्रिय व्यक्ति के रूप में स्थापित हैं, दुनियाभर के नामी लोग जिस व्यक्ति के
दीवाने थे, जिन्होंने
संसार के सबसे महान स्वतंत्रता संग्राम की एक प्रमुख धारा का सफल नेतृत्व किया, जिसके
नाम से आज भी भारत दुनिया में देखा-जाना जाता है, उस महात्मा गाँधी की निर्मम और जघन्य हत्या।
जिस व्यक्ति ने अपना पूरा जीवन, संपत्ति
और परिवार समाज और देश के लिए कुर्बान किया, उनकी वह हत्या जितनी दर्दनाक थी, उससे
ज़्यादा शर्मदेह और दर्ददेह है उस हत्या को सही ठहराने के लिए मिथ्या तर्कों के
साथ आज भी टहलते रहना।
अजीत डोभाल ने गुलामी और कुचली हुई
सभ्यता की बात करते हुए वह सच नहीं बताया कि उस दर्द से देश को बाहर कौन लेकर आया
था, गाँधीजी- पटेल- भगत सिंह या गोडसे?
इस दर्दनाक इतिहास का बदला युवाओं को लेना
है या नहीं, नहीं लेना तो क्यों नहीं लेना और अगर लेना है तो कैसे लेना चाहिए, इसका
ज्ञान देश के एनएसए को देना चाहिए था।
यूँ तो अजीत डोभाल के इस भाषण को आपत्तिजनक ठहराया भी जा सकता है
और नहीं भी। क्योंकि अमूमन इस तरह के भाषणों में दूसरे अच्छे शब्द भी शामिल होते
हैं। तर्क दिया जा सकता है कि उनके भाषण में शामिल बदला शब्द, तथा दूसरे राजनीतिक जुमले
सरीखे कुछ शब्दों का अर्थ यह है या यह नहीं है। कहा जा सकता है कि एनएसए ने देश की
सुरक्षा के लिए जो ख़तरे हैं उससे युवाओं को आगाह किया।
यह भी दलील दी जा सकती है कि डोभाल के इस भाषण में युवाओं की
भूमिका और राष्ट्र निर्माण के लिए अहम सुझाव थे। यह भी लिखा जा सकता है कि वे यह
कहना चाह रहे थे कि भारत ने इतिहास में जो ग़लतियाँ की हैं, वे आगे नहीं होनी चाहिए।
फिर भी देश के एनएसए का अंदाज़ 'विभाजन स्मृति दिवस' की राजनीति कर रहे घोर चुनावी नेता जैसा दिख जाता है।
2021 में पीएम मोदी ने ऐलान
किया था कि अब से 14 अगस्त का दिन विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस के रूप में मनाया
जाएगा। यानी, कोरोना की विभिषिका भूल जाओ, विभाजन की विभीषिका याद रखो! ताज़ा दिक्कतें, ताज़ा दर्द याद रखोगे तो
सरकार की साँसें फूलेगी, इसलिए विभाजन का दर्द याद करो। एनएसए डोभाल भी शायद इसी राह पर
चलते हुए दिख रहे हैं कि वर्तमान समय के दर्द, सवाल, दिक्कतें, महंगाई, बेरोजगारी, सब भूल जाओ और पुराने
इतिहास से दर्द को जबरन ढूँढो, याद करो और बदला लो!
(इनसाइड इंडिया, एम
वाला)








