एनसीईआरटी की आठवीं कक्षा की सामाजिक विज्ञान की किताब में न्यायपालिका
में भ्रष्टाचार पर कुछ बातें और उस बात को लेकर सुप्रीम कोर्ट का कठोर रूख और
किताब तत्काल हटाने का सख़्त आदेश। इतनी सख़्ती कि देश भर से किताबों को तत्काल
हटाना पड़ा, एनसीईआरटी को माफ़ी माँगनी पड़ी।
इस घटनाक्रम से तीन प्रमुख सवाल उठे हैं। पहला - आलोचना और मुक्त चिंतन के संवैधानिक अधिकार की अभिरक्षक
न्यायपालिका ख़ुद की आलोचना से असहज है? दूसरा - क्या इस मामले में
सुप्रीम कोर्ट ने ज़रूरत से ज़्यादा कठोर रूख अपनाया है? तीसरा - देश की सर्वोच्च अदालत ख़ुद के ख़िलाफ़ साज़िश की बात करती है, लेकिन न्यायपालिका या
सरकार, कोई बताने के लिए क्यों
तैयार नहीं कि यह साज़िश क्या है और इसके पीछे कौन लोग हैं?
न्यापालिका ख़ुद की आलोचना को रोक देती है, सरकार ने तो पहले से ही
आलोचना को देशद्रोह सरीखा अपराध बना रखा है, मीडिया सत्ता की आलोचना करने की हिम्मत नहीं कर सकता, जो सोशल मीडिया आलोचना
करता है उसे बैन या ब्लॉक कर दिया जाता है।
पिछले कुछ सालों में देश के उप राष्ट्रपति, राज्यपाल, केंद्रीय मंत्री, सांसद, सरीखे लोगों ने
न्यायपालिका और न्यायाधीशों के ऊपर असामान्य और उग्र आक्रमण किए। तत्कालीन चीफ़
जस्टिस ऑफ़ इंडिया को गृह युद्ध का अपराधी तक कहा गया! किसी पर सुप्रीम कोर्ट
इतना कठोर नहीं हुआ, फिर किताब पर इतना कठोर क्यों हो गया? साज़िश है तो क्या साज़िश
है, क्यों है, किसने की, कौन शामिल हैं, कुछ भी कहा नहीं जा रहा!
मामला
क्या है?
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं
प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की आठवीं कक्षा की नई सामाजिक विज्ञान की किताब
(एक्सप्लोरिंग सोसाइटी: इंडिया एंड बियोंड) में न्यायपालिका के बारे में एक
अध्याय था -
हमारे
समाज में न्यायपालिका की भूमिका। इसमें एक हिस्से का शीर्षक था - करप्शन इन द
ज्यूडिशियरी, यानी
न्यायपालिका में भ्रष्टाचार। इसमें लिखा था कि लोगों को न्यायपालिका में अलग-अलग
स्तरों पर भ्रष्टाचार का सामना करना पड़ता है।
इस किताब के बारे में एक ख़बर अंग्रेज़ी
अख़बार 'द
इंडियन एक्सप्रेस' में
छपी। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, एनसीईआरटी की कक्षा 8
की सामाजिक विज्ञान पुस्तक के एक अध्याय में पहली बार न्यायपालिका में भ्रष्टाचार
हिस्से को एक प्रमुख चुनौती के रूप में शामिल किया गया। इस रिपोर्ट के अनुसार किताब
में कहा गया कि न्यायपालिका के विभिन्न स्तरों पर भ्रष्टाचार, मामलों
का भारी लंबित बोझ और जजों की कमी जैसी समस्याएँ न्याय व्यवस्था को प्रभावित करती
हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, किताब
का चैप्टर बताता था कि जज एक आचार संहिता से बंधे होते हैं, जो
अदालत के भीतर ही नहीं बल्कि बाहर उनके व्यवहार को भी नियंत्रित करती है। गंभीर
आरोपों की स्थिति में संसद द्वारा महाभियोग की प्रक्रिया से जज को हटाने का
प्रावधान भी समझाया गया था।
इसी रिपोर्ट की माने तो, इसमें
शिकायतों के लिए CPGRAMS व्यवस्था
के उल्लेख के साथ 2017 से 2021 बीच दर्ज़ हुई
शिकायतों का आँकड़ा था। किताब में अदालतों में लंबित मामलों के आँकड़े भी दिए गए
थे। बताया गया था कि लोग न्यायपालिका के विभिन्न स्तरों पर भ्रष्टाचार का अनुभव
करते हैं और इसका सबसे अधिक असर ग़रीब व वंचित वर्गों के न्याय तक पहुँच पर पड़
सकता है।
इसके बाद कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु
सिंघवी जैसे वरिष्ठ वकीलों ने मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस
जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ के सामने इस अध्याय का मुद्दा
उठाया।
कपिल सिब्बल ने कहा कि हम काफ़ी परेशान
हैं, आठवीं
कक्षा के बच्चे-बच्चियों को पढ़ाया जा रहा है कि न्यायपालिका भ्रष्ट है। उन्होंने
इस तरफ़ अदालत का ध्यान 25 फ़रवरी को दिलाया। उन्होंने कहा कि बार
के वरिष्ठ सदस्य इस बात से बेहद व्यथित हैं कि स्कूल की किताबों में न्यायिक
भ्रष्टाचार शामिल किया गया है।
सिब्बल ने कहा, "हम, इस
संस्था के वरिष्ठ सदस्य होने के नाते, कक्षा 8 की किताबों में 'न्यायिक
भ्रष्टाचार' चैप्टर
शामिल होने से बहुत परेशान हैं।"
वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने
दलील दी कि ऐसा लगता है मानो केवल एक ही संस्था को निशाना बनाया गया है, जबकि
राजनेताओं, मंत्रियों
या नौकरशाहों में भ्रष्टाचार का कोई उल्लेख नहीं है।
एनसीईआरटी
की कंटेट चॉइस सवालों के घेरे में, सिर्फ़
न्यायपालिका के भ्रष्टाचार को ही जगह क्यों? दूसरी
संस्थाओं के भ्रष्टाचार के बारे में छात्र क्यों न पढ़े?
सरकारी या ग़ैर सरकारी संस्थाओं के
भ्रष्टाचार के बारे में पढ़ाई होनी चाहिए। लेकिन एनसीईआरटी ने मानो केवल एक ही
संस्था को अपनी ज़द में लिया। उसने राजनेताओं, मंत्रियों, नौकरशाहों, के
भ्रष्टाचार को छोड़ दिया। एनसीईआरटी की यह कंटेट चॉइस विवादित ज़रूर मानी जा सकती
है।
भ्रष्टाचार इस देश की सबसे पुरानी और
सबसे बड़ी समस्या है, जो हर वर्ग और हर समाज का जीना हराम कर चुकी है। इस बारे में
बच्चें-बच्चियाँ क्यों न पढ़े? बड़े विवादित तथा अति व्यक्तिगत शारीरिक व धार्मिक मुद्दों की
पढ़ाई बच्चों को करानी है, तो फिर भ्रष्टाचार की पढ़ाई क्यों न कराई जाए?
लेकिन एक बात एनसीईआरटी से ज़रूर पूछनी
चाहिए कि सिर्फ़ न्यायिक भ्रष्टाचार ही क्यों? राजनेताओं, सरकारों, नौकरशाहों
के भ्रष्टाचार पर भी पढ़ाई क्यों नहीं होनी चाहिए? देश का बच्चा बच्चा जय श्री राम बोले उस
समय उसे यह भी ज्ञान होना चाहिए कि भावना की आड़ में भ्रष्टाचार ने कितना नुक़सान
किया है।
देश की सर्वोच्च अदालत ने मीडिया
रिपोर्ट्स के अनुसार इस मामले की सुनवाई के दौरान 'साज़िश', 'सुनियोजित
और गहरे स्तर का हमला', 'गहराई
से जाँच की ज़रूरत', जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया। देश के बच्चों को वे क्या पढ़े
या क्या नहीं पढ़े यह पता चले उससे पहले उनके अभिभावकों को यह पता तो चलना चाहिए
कि एनसीईआरटी ने ऐसा क्यों किया?
ख़ुद
के भ्रष्टाचार को शिक्षा में शामिल होता देख सुप्रीम कोर्ट आग बबूला हुआ, दिए दो
त्वरित और सख़्त आदेश
इसके तुरंत बाद, सुप्रीम कोर्ट ने ख़ुद से
मामले का संज्ञान लिया और कुछ दिनों के अंदर दो आदेश दिए।
पहला - 26 फ़रवरी को अपने पहले
आदेश में ही कोर्ट ने इस किताब पर पाबंदी लगा दी और तब तक छपी सभी किताबों को वापस
लेने को कहा।
दूसरा - 11 मार्च को कोर्ट ने उन
तीन लोगों पर भी पाबंदी लगा दी जिन्होंने इस अध्याय को लिखा था। कोर्ट ने केंद्र
सरकार, सभी राज्य सरकारों, केंद्र शासित प्रदेशों और
उन सारे विश्वविद्यालयों और संस्थानों को जिन्हें सरकार से पैसे मिलते हैं, उनसे कहा कि वे इन तीन
लोगों से आगे किसी भी तरह का रिश्ता न रखें, जब तक अदालत अपने फ़ैसले में उन तीनों का पक्ष सुनकर कोई बदलाव न
करे।
मामले का ख़ुद से संज्ञान लेते हुए
सीजेआई ने कहा कि उन्हें इस मुद्दे पर लगातार फ़ोन कॉल और संदेश मिल रहे हैं, जिनमें
बड़ी अदालतों के जजों और वरिष्ठ वकीलों की चिंताएँ भी शामिल हैं।
26 फ़रवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने
इस मामले में कठोर टिप्पणी करते हुए एनसीईआरटी को तुरंत किताबों को वापस लेने के
लिए कहा, साथ
ही एनसीईआरटी से इस संबंध में जवाब भी माँगा। 11 मार्च को जब
एनसीईआरटी ने इस चैप्टर को दोबारा लिखकर दिया तब भी सुप्रीम कोर्ट संतुष्ट नहीं
हुआ और उसने किताब लिखने वाले लेखकों को ब्लैकलिस्ट करने का आदेश दे दिया।
अदालत ने किताब को भारत और विदेश में
बैन कर दिया और सभी प्रतियों को ज़ब्त करने के निर्देश दिए। साथ ही, किताब
को ऑनलाइन पूर्ण रूप से या उसके हिस्से को साझा करने पर भी पूर्ण प्रतिबंध लगा
दिया। कोर्ट ने केंद्र सरकार और एनसीईआरटी को नोटिस जारी किया।
सुप्रीम कोर्ट का कहना था कि हमें यह
ध्यान रखना होगा कि देश भर के मिडिल स्कूलों के पाठ्यक्रम में इस तरह के संदर्भ से
काटे गए पाठ को शामिल करना ठीक नहीं है, यह संतुलित शिक्षा के सुरक्षा उपायों को
नज़रंदाज़ करना है।
बीबीसी रिपोर्ट के अनुसार कोर्ट के
मुताबिक़, ''इससे
विद्यार्थियों के मन में, उन्हें पढ़ाने वाले शिक्षकों, छोटे बच्चे-बच्चियों के माता-पिता, पूरे
समाज में और अंततः अगली पीढ़ी तक… न्यायपालिका जैसी संस्था के प्रति भरोसे के धीरे-धीरे कमज़ोर
पड़ने का ख़तरा पैदा होता है।''
इसके साथ ही अदालत ने एनसीईआरटी के
निदेशक और 'स्कूल
शिक्षा और साक्षरता विभाग' के सचिव को कारण बताओ नोटिस जारी किए। कोर्ट ने पूछा कि क्यों
न उनके ख़िलाफ़ 'अदालत
की अवमानना' की
कार्यवाही चलाई जाए।
वहीं, अपने दूसरे फ़ैसले में 11
मार्च को कोर्ट ने उन तीन लेखकों पर भी पाबंदी लगा दी जिन्होंने इस अध्याय को लिखा
था। कोर्ट ने केंद्र सरकार, सभी राज्य सरकारों, केंद्र शासित प्रदेशों और उन सारे
विश्वविद्यालयों और संस्थानों को जिन्हें सरकार से पैसे मिलते हैं, उनसे
कहा कि वे इन तीन लोगों से आगे किसी भी तरह का रिश्ता न रखें।
बक़ौल बीबीसी, अपने
फ़ैसले में कोर्ट ने लिखा, "हमारे
पास इस बात पर शक करने की कोई वजह नहीं है कि या तो इन्हें भारत में न्यायपालिका
के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं है या उन्होंने जान-बूझकर तथ्यों को ग़लत तरीक़े
से प्रस्तुत किया है ताकि विद्यार्थियों को न्यायपालिका की ग़लत छवि दिखाई जा
सके।"
सत्यहिंदी रिपोर्ट के अनुसार, न्यायालय
ने कहा, "हमारे
पास संदेह करने का कोई कारण नहीं है कि या तो प्रोफ़ेसर मिशेल डैनियन और उनके
सहयोगी सुपर्णा दिवाकर तथा आलोक प्रसन्ना कुमार के पास भारतीय न्यायपालिका के
संबंध में पर्याप्त और सूचित ज्ञान नहीं है, या फिर उन्होंने जानबूझकर और समझते हुए
तथ्यों को ग़लत ढंग से प्रस्तुत किया, जिससे कक्षा 8 के विद्यार्थियों के सामने भारतीय न्यायपालिका
की नकारात्मक छवि प्रस्तुत की जा सके।"
कोर्ट ने यह भी कहा कि ये तीन लोग कोर्ट
के सामने आकर अपना पक्ष रख सकते हैं, फिर आगे देखा जाएगा कि इस फ़ैसले में कोई बदलाव आना चाहिए या
नहीं।
जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने टिप्पणी की, "किताब
में न्यायपालिका के मूल ढाँचे से जुड़ी संवैधानिक अखंडता का अभाव है।"
सीजेआई सूर्यकांत ने एनसीईआरटी के इस
चैप्टर की कड़ी आलोचना की। सीजेआई ने कहा कि यह न्यायपालिका के ख़िलाफ़ एक
सोची-समझी साज़िश है। रिपोर्टों के अनुसार, सीजेआई ने इसे 'न्यायपालिका
पर सुनियोजित और गहरे स्तर का हमला' बताया। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट किसी को भी न्यायिक
संस्था की साख पर सवाल उठाने या उसे बदनाम करने की अनुमति नहीं देगा।
बक़ौल मीडिया रिपोर्ट, सीजेआई
ने ज़ोर देते हुए कहा, "मामला
चाहे कितना भी ऊपर तक क्यों न जाए, कार्रवाई की जाएगी।"
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, सीजेआई ने
कहा, "हमें
गहराई से जाँच की ज़रूरत है। हमें पता लगाना है कि कौन ज़िम्मेदार है... सिर कलम
होने चाहिए! हम इस मामले को बंद नहीं करेंगे।"
उन्होंने एनसीईआरटी की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से सख़्त पूछताछ की।
जब सॉलिसिटर जनरल ने लेखकों पर कार्रवाई
का भरोसा दिया तब सीजेआई ने कहा, "यह बहुत कम महत्व की
बात है। उन्होंने गोली चलाई और न्यायपालिका आज ख़ून बहा रही है। यह एक गहरी साज़िश
लगती है। एक बहुत सोची-समझी चाल।"
इसके अलावा, कोर्ट
ने कहा कि उनके 26
फ़रवरी वाले फ़ैसले के बारे में बात करते हुए सोशल मीडिया पर कुछ लोग 'ग़ैर
ज़िम्मेदाराना'
तरीक़े
से पेश आ रहे हैं। कोर्ट ने कहा कि सरकार ऐसी वेबसाइट और अकाउंट की जानकारी उन्हें
दे। उसके बाद वे उनके ख़िलाफ़ पर्याप्त क़दम उठाएँगे।
हालाँकि मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, कोर्ट
ने अपने फ़ैसले में 'ग़ैर ज़िम्मेदाराना' की
व्याख्या नहीं की। साथ ही, इस अध्याय को वापस लिखने के लिए कोर्ट
ने कुछ शर्तें भी तय की।
सुप्रीम
कोर्ट की एनसीईआरटी पर अभूतपूर्व नाराज़गी, तीन
प्रसिद्ध लेखकों को ब्लैकलिस्ट करने का सख़्त आदेश
एनसीईआरटी की किताबें और उसके भीतर
चैप्टर, यह
सब अनेकों बार विवादों में आ चुका है। शिक्षा के सरकारीकरण के बाद पिछले कुछ समय
में एनसीईआरटी पर शिक्षा के भगवाकरण का आरोप भी लगा है। उधर देश की न्यायपालिका को
लेकर पिछले कुछ सालों में बुद्धिजीवियों के भीतर मायूसी है।
ऐसे में चर्चाओं में सवाल तैरने लगा कि
सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में अचानक इतना कठोर होने की ज़रूरत क्यों पड़ी? अदालत
ने कैसे बिना किसी विशेष सुनवाई के, बिना दूसरे पक्ष को सुने, सब तय कर लिया?
पहले उन तीन लेखकों के बारे में जान
लेते हैं। बक़ौल सत्यहिंदी रिपोर्ट, तीनों लेखक अकादमिक जगत से जुड़े हैं। प्रोफ़ेसर मिशेल डैनियन
ना सिर्फ़ सामाजिक विज्ञान की एनसीईआरटी की पुस्तकों का करिकुलम बनाने वाली समिति
के अध्यक्ष हैं, बल्कि
उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (2020) को बनाने में
महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाई थी। इसके अलावा वे 2017 में भारत के चौथे
सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म श्री से भी सम्मानित हो चुके हैं। सुपर्णा दिवाकर
शिक्षाविद् हैं और आलोक प्रसन्ना कुमार लीगल शोधकर्ता हैं।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की नाराज़गी
को अभूतपूर्व कहा गया, क्योंकि इस मामले में ना कोई विशेष सुनवाई हुई, ना
ही तारीख़ें दी गईं, ना ही सामने वाले पक्ष को पूरी तरह से सुना गया। इस मामले में
अदालत ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए सख़्त आदेश दिया, ना
ही अन्य समिति बनाकर मामले को गहराई से देखने के लिए कहा, जो
चैप्टर के कंटेट पर विचार करती, कमियों को ठीक करने के सुझाव देती।
किताब
पर अदालती फ़ैसला, क़ानून और बुद्धिजीवियों का नज़रिया क्या हैं?
कोर्ट ने 26
फ़रवरी के अपने फ़ैसले में लिखा कि वे इसके ज़रिए आलोचना को दबाना नहीं चाहते, लेकिन, बच्चे-बच्चियों
को एकतरफ़ा जानकारी देने से उनमें ज़िंदगी भर न्यायपालिका के ख़िलाफ़ ग़लतफ़हमियाँ
घर कर जाएगी।
कोर्ट के इस फ़ैसले का कईं वरिष्ठ
वकीलों ने समर्थन किया। वहीं दूसरी तरफ़ यह भी कहा गया कि अदालत को न्यायपालिका की
अच्छी और बेहतर छवि की चिंता है तो वह चिंताएँ कईं ऐसे मामलों में दिखाई देनी
चाहिए थी, जिन
मामलों ने पिछले कुछ सालों में न्यायपालिका की छवि को धूमिल किया।
26 फ़रवरी वाले फ़ैसले का कईं क़ानूनविदों
ने स्वागत किया, वहीं
बक़ौल बीबीसी रिपोर्ट, क़ानूनी जानकारों का यह भी कहना है कि इस फ़ैसले से लोग
न्यायपालिका पर किसी तरह का सवाल उठाने से घबराएँगे, ख़ासकर भ्रष्टाचार के मामलों में।
रिपोर्ट के अनुसार, इनका मानना है कि वैसे ही बहुत कम लोग हैं जो न्यायपालिका की
आलोचना खुल कर करते हैं, ऐसे फ़ैसले से वे लोग और भी कम हो जाएँगे।
बीबीसी हिंदी रिपोर्ट में प्रोफ़ेसर
शुभांकर दाम, जो इंग्लैंड की यूनिवर्सिटी ऑफ़ पोर्ट्समथ में
क़ानून पढ़ाते हैं, जिन्होंने न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर कई शोध किए हैं, कहते
हैं, "मुझे
इस बात पर कोई संदेह नहीं है कि इससे लोग न्यायपालिका के ख़िलाफ़ बोलने से
घबराएँगे। ख़ासकर वे लोग जो भारत में रहते और काम करते हैं।"
प्रोफ़ेसर शुभांकर के मुताबिक़, "अभी
भी कईं पत्रकार और अकादमिक विशेषज्ञ न्यायपालिका पर लिखने से घबराते हैं। मुझे आज
के दिन भारत में ऐसे किसी भी विश्वविद्यालय के बारे में नहीं पता जो अपने यहाँ
फ़ैकल्टी के सदस्य को इन बातों पर गंभीर रूप से शोध करने की इजाज़त देता हो।"
वे बीबीसी हिंदी में बताते हैं, "आप
आज के दिन कोई किताब या लेख देखिए। आपको ऐसे बहुत ही कम लेख मिलेंगे जो गंभीरता से
न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के बारे में पड़ताल करते हों। ऐसा होना कोई संयोग नहीं
है। लोगों को पता है कि इस विषय पर बात करने से क्या हो सकता है।"
बीबीसी हिंदी की इस रिपोर्ट में क़ानून
के जानकार और शोधकर्ता प्रशांत रेड्डी का नज़रिया शामिल है। इन्होंने हाल में ही
भारत की निचली अदालतों के बारे में अंग्रेज़ी में एक किताब 'तारीख़
पे जस्टिस' लिखी
है। वे रिपोर्ट में बताते हैं, "कोर्ट की अवमानना के
क़ानून के दुरुपयोग की वजह से कईं संपादक और समाचार संस्थान न्यायपालिका पर लिखने
में सतर्क रहते हैं। इससे अब उनका डर और बढ़ जाएगा।"
उनका कहना था, "अगर
आप पिछले कुछ दशक में न्यायपालिका में 'कुप्रशासन' और
'भ्रष्टाचार' पर
ख़बरें या स्तंभों को देखें तो ऐसे लेख बहुत कम मिलेंगे।" बक़ौल प्रशांत
रेड्डी, ऐसे
फ़ैसले के बाद लोग ऐसी बातों के बारे में लिखने से ख़ुद को रोकेंगे।
उनकी यह आशंका है कि अब सुप्रीम कोर्ट
के फ़ैसले को देखते हुए, हाईकोर्ट भी कोर्ट की अवमानना के लिए सख़्त आदेश देंगे।
सत्यहिंदी रिपोर्ट के अनुसार सुप्रीम
कोर्ट के वरिष्ठ वक़ील प्रशांत भूषण ने कहा, "मैंने कक्षा 8
की नई एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका पर लिखा गया 18
पन्नों का अध्याय पढ़ा है। मुझे यह अध्याय न्यायपालिका की संरचना, भूमिका
और उपलब्धियों के बारे में संतुलित प्रतीत होता है। इसके अंतिम दो पन्नों में
न्यायपालिका के सामने मौजूद चुनौतियों और उनके कारण होने वाले विलम्ब और
भ्रष्टाचार का उल्लेख किया गया है।"
संविधान के जानकार गौतम भाटिया ने इन
फ़ैसलों के बाद दो लेख लिखे। बीबीसी हिंदी की इसी रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने
लिखा कि किताबों और लोगों पर पाबंदी लगाना, एक संवैधानिक कोर्ट के दायरे के बाहर
है।
बीबीसी हिंदी रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने
लिखा कि किसी व्यक्ति के रोज़गार पर पाबंदी लगाना, उनके मौलिक अधिकार पर हमला है, साथ
ही, यह
बात भी साफ़ नहीं है कि उन्होंने कौन से क़ानून तोड़े हैं। यही नहीं, ऐसा
आदेश देते हुए कोर्ट ने न कोई सुनवाई की और न ही अपने फ़ैसले में सही से कारण
बताए।
रिपोर्ट में दर्ज़ है कि प्रोफ़ेसर
शुभांकर दाम का भी कहना था कि उन तीनों लोगों के आगे के काम पर पाबंदी लगाने का
फ़ैसला 'ग़ैर-कानूनी' है।
उन्होंने कहा, "मुझे
ऐसा कोई भी प्रावधान नहीं पता जो ऐसे फ़ैसले को वैधता दे सकता है। ख़ासकर तब जब यह
फ़ैसला दूसरे पक्ष को सुने बिना दिया गया हो।"
इस रिपोर्ट के अनुसार, प्रशांत
रेड्डी का भी मानना है, "मुझे
उस अध्याय (किताब का चैप्टर) में कुछ ग़लत नज़र नहीं आया। उसमें कोई भी तथ्य ग़लत
नहीं था। अगर कोई पूरा अध्याय पढ़े तो उससे न्यायपालिका की बुरी छवि पेश नहीं होती
है।"
बीबीसी हिंदी ने जब सुप्रीम कोर्ट के
पूर्व जस्टिस मदन लोकुर से इस फ़ैसले के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा, ''मुझे
लगता है कि तीनों विद्वानों को किसी भी सार्वजनिक विश्वविद्यालय से जुड़ने से
रोकने का यह आदेश ज़रूरत से ज़्यादा सख़्त है। इस बारे में कोई शक नहीं है।''
संविधान
की आलोचना की जा सकती है, संविधान
के अभिरक्षक की नहीं?!
देशद्रोह
और न्यायपालिका की अवमानना, दो
विषयों का विवाद
संविधान की आलोचना की जा सकती है, उसे
भला बुरा कहा जा सकता है, संविधान ख़ुद इसकी मंज़ूरी देता है, दूसरी
तरफ़ उसी संविधान की अभिरक्षा का काम जिसे सौंपा गया है उस न्यायपालिका की आलोचना
नहीं की जा सकती! सालों पुराना यह विवाद फिर एक बार
चर्चा में है।
उपरांत, 'देशद्रोह' और
'न्यायपालिका
की अवमानना', दो
ऐसे विषय, जो
पिछले कुछ सालों में विवादों की ज़द में हैं, वे फिर एक बार चर्चा में आए।
सरकार की नीतिसंगत या तर्कसंगत आलोचनाओं
तक को सत्ता ने सरकार के ख़िलाफ़ साज़िश या देशद्रोह तक की धारणा के भीतर लपेट
लिया है। इधर न्यायपालिका, जिसके भ्रष्टाचार को लेकर अदालत के ही तत्कालीन और पूर्व जजों
ने, क़ानूनविदों
ने, सरकारों
ने, विपक्षों
ने कहा, वह
अब न्यायपालिका की अवमानना की धारणा की ज़द में जाता दिख रहा है।
1968 के साल के ब्रिटिश न्यायिक मामले में, जिसमें
न्यायपालिका की बेहद सख़्त आलोचना की गई थी, फ़ैसला देते समय जस्टिस लॉर्ड डेनिंग ने
कहा था कि हम हमारे अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा बनाए
रखने के साधन के रूप में नहीं करेंगे। उन्होंने मामले को रद्द करते हुए कहा था कि
हम आलोचना से न तो डरते हैं और ना ही उससे नाराज़ होते हैं।
इस फ़ैसले में भाव यह था कि संस्था की
प्रतिष्ठा के अपने दूसरे मज़बूत आधार होते हैं, संस्था की आलोचना जैसी घटना उस संस्था
की प्रतिष्ठा को धूमिल नहीं कर सकती, बल्कि आलोचना को झेलते हुए अपने फ़ैसलों से उन आलोचनाओं को
झूठा साबित करते रहने से संस्था की प्रतिष्ठा मजबूत होती है।
ब्रिटिश विधि आयोग की सिफ़ारिशों के
आधार पर यूनाइटेड किंगडम की संसद ने 'क्राइम एंड कोर्ट्स एक्ट, 2013' के
माध्यम से 'न्यायपालिका
के अपमान'/ 'न्यायालय
के अपमान' नाम
के अपराध को अब समाप्त कर दिया है।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 11
मार्च के अपने आदेश में कहा कि 26 फ़रवरी के उसके आदेश के पारित होने के
बाद सोशल मीडिया में 'कुछ तत्व' सक्रिय हो गए हैं और 'ग़ैर
ज़िम्मेदाराना' प्रतिक्रिया
दे रहे हैं। अदालत ने सरकार को निर्देश दे दिया कि ऐसे साइट्स और उसे चलाने वाले
लोगों की पहचान हमें कराएँ, हम कार्रवाई करेंगे।
सवाल है कि इससे क्या हासिल होगा? मीडिया
रिपोर्ट्स की माने तो, अदालत ने 'कुछ तत्व' और 'ग़ैर ज़िम्मेदाराना
प्रतिक्रिया', शब्द
का इस्तेमाल किया। लेकिन किसी को नहीं पता कि यह कुछ तत्व कौन हैं, उन्हें
इस तरह आपराधिक गैंग की धारणा की ज़द में पेश करना, इसका आधार क्या है? यह
भी नहीं पता कि ग़ैर ज़िम्मेदार प्रतिक्रिया, इस शब्द की परिभाषा क्या है, कौन
सी अवधारणा है?
ऐसे साइट्स और उन्हें चलाने वाले लोगों
की पहचान हमें दें, हम क़ानूनी कार्रवाई करेंगे - इस मसले पर भी कोई जानकारी नहीं
है कि यह सब क्या है? इनके ऊपर क़ानूनी कार्रवाई के विविध आधार क्या हैं?
यह भी तर्कहीन सा लगता है कि हमारी
संस्था के भ्रष्टाचार के बारे में बात ना करें, किसी और संस्था के भ्रष्टाचार की बातों
का हमें नहीं पता, उनकी
वो जाने। जब भ्रष्टाचार सबसे बड़ी समस्या दशकों से है, तो
फिर इस समस्या का गहरा विवरण और विस्तृत पृथ्थक्करण क्यों न हो?
क्या वाक़ई न्यायपालिका में भ्रष्टाचार
नहीं है? अगर
है तो क्या इस पर सिर्फ़ इसलिए बात नहीं करनी चाहिए कि यह न्यायपालिका से संबंधित
है?
भ्रष्टाचार इस देश की सबसे पुरानी और
सबसे बड़ी समस्या है, जो हर वर्ग और हर समाज का जीना हराम कर चुकी है। इस बारे में
बच्चें-बच्चियाँ क्यों न पढ़े? यह बात ज़रूर है कि सिर्फ़ न्यायिक भ्रष्टाचार ही नहीं, राजनेताओं, सरकारों, नौकरशाहों
के भ्रष्टाचार पर भी पढ़ाना चाहिए। देश का बच्चा बच्चा जय श्री राम बोले उस समय
उसे यह भी ज्ञान होना चाहिए कि भावना की आड़ में भ्रष्टाचार ने कितना नुक़सान किया
है।
समापन करने से पहले एक दूसरे मामले को याद कर लेते हैं। जिस मामले
को याद करना है वह 1968 के साल का मामला है। यह प्रसिद्ध ब्रिटिश न्यायिक मामला था, जिसे ‘कमिश्नर ऑफ़ पुलिस ऑफ़
मेट्रोपॉलिस’ के नाम
से जाना जाता है। इस मामले में क्विंटन हॉग के ख़िलाफ़ उनके एक लेख को लेकर ‘न्यायालय की अवमानना’ का मामला दर्ज़ हुआ था।
मामले की सुनवाई प्रसिद्ध जस्टिस लॉर्ड डेनिंग कर रहे थे। क्विंटन हॉग के लेख में
न्यायालय की बेहद सख़्त आलोचना की गई थी।
तमाम आशंकाओं के उलट अपने फ़ैसले में लॉर्ड डेनिंग ने कहा कि, "हम इस अधिकार-क्षेत्र का उपयोग कभी भी अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा
बनाए रखने के साधन के रूप में नहीं करेंगे। वह कहीं अधिक मजबूत आधारों पर टिकी
होनी चाहिए। और न ही हम इसका प्रयोग उन लोगों को दबाने के लिए करेंगे जो हमारे
विरुद्ध बोलते हैं। हम आलोचना से न तो डरते हैं और न ही उससे नाराज़ होते
हैं।"
संविधान, लोकतंत्र, मौलिक अधिकार, आलोचना, मुक्त चिंतन, के संवैधानिक अधिकार की अभिरक्षक न्यायपालिका को इतना तत्पर, इतना कठोर, हर मामले में होना चाहिए।
जाँच और न्याय की अद्भुत गति सिर्फ़ वनतारा को ही नहीं, सबको मिलनी चाहिए। उसे
स्वत: संज्ञान सभी स्वतंत्रता नायकों पर लेना चाहिए, ना की सिर्फ़ सावरकर पर।
किसी भी संस्थान को अपना बचाव ख़ुद क्यों करना? क्यों न इसे नागरिकों पर
ही छोड़ दिया जाए कि वो अपने संस्थानों को किस तरह से देखे। किसी ऐसे मामले में
कुछ जानबूझकर किया गया है, साज़िश की बू आती है, तो फिर संबंधित संस्थान क्यों न कथित साज़िश या संभावना के बारे
में नागरिकों को तथ्यों के साथ बता दें।
(इनसाइड इंडिया, एम
वाला)











