मोदी
कैबिनेट से सेमीकंडक्टर प्रोजेक्ट मिलते ही टाटा ने बीजेपी को 758 करोड़ चंदा दिया - देश के मुख्यधारा के प्रिंट मीडिया में यह
ख़बर है। इस प्रकार के मामलों को पहले भ्रष्टाचार माना जाता था, अब राष्ट्रनिर्माण में योगदान कहा जाता है!
"तुम
मुझे ख़ून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा, यह अब पुराना हो गया; नया
वाला इस प्रकार है, तुम मुझे चंदा दो, मैं
तुम्हें धंधा दूँगा" - सोशल मीडिया पर यह तंज़ इलेक्टोरल बॉन्ड का विवाद जिस बरस
शुरू हुआ तभी से चल रहा है। इस नयी घटना के बाद ऊपर पैरा में लिखा वह तंज़ सोशल मीडिया
पर चल पड़ा है।
स्वतंत्र
विश्लेषकों ने इलेक्टोरल बॉन्ड की योजना को 'वसूली
और भ्रष्टाचार की उस्तादी योजना' कहा था। भ्रष्टाचार के राक्षस
के मुँह को क़ानूनी बुर्के से ढाँप देने वाली इस योजना को 15 फ़रवरी 2024 के
दिन सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक व ग़ैरक़ानूनी घोषित कर दिया था।
पॉलिटिकल
फंडिंग और मुनाफ़ा कमाने की सहुलियत का यह कॉकटेल उसी योजना के नये अवतार के रूप में
देखा जा रहा है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक और ग़ैरक़ानूनी कहा था। 44203 करोड़ की सब्सिडी, 758 करोड़ का चंदा, लोकसभा चुनाव। क़ानूनी लिहाज़
से इसमें कुछ भी ग़लत साबित करना नामुमकिन है, लेकिन सत्ताधारी दल और एक कॉर्पोरेट कंपनी के बीच इस व्यवहार
का एक सामाजिक नैरेटिव भी है।
स्क्रॉल ने 27 नवंबर 2025 को यह ख़बर दी कि
मोदी कैबिनेट द्वारा सेमीकंडक्टर इकाइयों को मंज़ूरी दिए जाने के कुछ ही हफ़्तों बाद
टाटा समूह भाजपा का सबसे बड़ा दानदाता बन गया। स्क्रॉल ने लिखा है कि यह दान उसी महीने
दिया गया था जब लोकसभा चुनाव 2024 के लिए मतदान शुरू हुआ था।
स्क्रॉल के लिए आयुष
तिवारी की इस रिपोर्ट के अनुसार 29 फ़रवरी 2024 को पीएम नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने घरेलू सेमीकंडक्टर
उद्योग के निर्माण के लिए सरकार के प्रयासों के तहत तीन सेमीकंडक्टर इकाइयों को मंज़ूरी
दी। इनमें से दो इकाइयों का नेतृत्व टाटा समूह कर रहा है।
सेमीकंडक्टर उत्पादन
को प्रोत्साहित करने की एक योजना के तहत केंद्र सरकार ने इन इकाइयों के निर्माण की
आधी लागत वहन करने पर सहमति जताई। रिपोर्ट की माने तो टाटा समूह की इन दोनों इकाइयों
के लिए यह सब्सिडी 44,203 करोड़ रुपये की है।
टाटा समूह द्वारा सत्ताधारी
दल बीजेपी को दिए गए करोड़ों के इस चंदे की टाइमिंग ने व्यापक ध्यान आकर्षित किया है।
यह घटना सिर्फ़ टाटा तक सीमित नहीं है। उदाहरण के लिए, मुरुगप्पा समूह ने
अपनी सेमीकंडक्टर इकाई के लिए सरकारी मंज़ूरी मिलने के तुरंत बाद भाजपा को 125 करोड़ रुपये का दान
दिया, जो पिछले एक दशक में मिले सिर्फ़ 21 करोड़ रुपये के दान से काफ़ी ज़्यादा है।
विश्लेषक एक व्यापक
पैटर्न पर ध्यान दे रहे हैं जहाँ कंपनियाँ सरकारी प्रोत्साहनों के बाद राजनीतिक चंदे
में वृद्धि करती हैं, और चुनावी ट्रस्टों का इस्तेमाल करके धन का प्रबंधन करती हैं।
हालाँकि किसी भी औपचारिक
जाँच ने किसी भी गड़बड़ी की पुष्टि नहीं की है, लेकिन मंज़ूरियों और दान की निकटता के बीच एक संबंध देखा जा रहा है, जिससे देश के नीति
निर्माण पर निजी फंडिंग के प्रभाव के साथ दूसरे भी मुद्दे उठ रहे हैं।
स्क्रॉल की इस रिपोर्ट के आधार पर सत्यहिंदी ने लिखा है कि टाटा
समूह को सेमीकंडक्टर प्रोजेक्ट के लिए 44000 करोड़ की सब्सिडी मिली और ठीक चार हफ़्ते बाद बीजेपी के खाते
में 758 करोड़ रुपये पहुँच गए! रिपोर्ट के अनुसार सेमीकंडक्टर प्लांट की मंज़ूरी के नाम पर
सरकारी ख़ज़ाना खुला और चुनाव से पहले टाटा समूह बीजेपी का सबसे बड़ा दानदाता बन गया।
स्क्रॉल की रिपोर्ट
के अनुसार मोदी सरकार के फ़ैसले के ठीक चार हफ़्ते बाद, यानी अप्रैल 2024 में टाटा ग्रुप ने
बीजेपी को 758 करोड़ रुपये का दान दे दिया। 2024 लोकसभा चुनाव से पहले यह किसी एक समूह द्वारा बीजेपी को दिया गया अब तक का सबसे
बड़ा चंदा है। 2023-24 में किसी ने भी इतनी बड़ी रकम एक पार्टी को नहीं दी थी।
टाटा की पंद्रह कंपनियो ने मिलकर 915 करोड़ का चंदा राजनीतिक दलों को दिया, रोटी का छोटा सा निवाला कांग्रेस को भी
इस मीडिया रिपोर्ट
के अनुसार, वित्त वर्ष 2024-25 में टाटा ग्रुप की 15 कंपनियों ने मिलकर क़रीब 915 करोड़ रुपये राजनीतिक दलों को दिए। यह सारा पैसा टाटा ग्रुप के 'प्रोग्रेसिव इलेक्टोरल
ट्रस्ट' के ज़रिए दिया गया। इसमें सबसे बड़ी रकम टाटा संस प्राइवेट लिमिटेड की थी जिसने
308 करोड़ रुपये दिए।
बीजेपी को मिले 758 करोड़ रुपये के बाद दूसरा सबसे बड़ा हिस्सेदार कांग्रेस रही, जिसे महज़ 77.3 करोड़ रुपये मिले।
आठ अन्य क्षेत्रीय दलों को 10-10 करोड़ रुपये दिए गए।
दिलचस्प बात यह है
कि टाटा के इस प्रोग्रेसिव इलेक्टोरल ट्रस्ट ने 2021 से 2024 तक तीन साल तक एक भी रुपया किसी राजनीतिक दल को नहीं दिया था। स्क्रॉल की रिपोर्ट
के अनुसार अचानक अप्रैल 2024 में लोकसभा चुनाव शुरू होने से ठीक पहले 758 करोड़ रुपये बीजेपी के खाते में पहुँच गए।
इस साल बिहार विधानसभा
चुनाव में आचारसंहिता लागू थी तभी सार्वजनिक रूप से बीजेपी ने महिलाओं के खाते में
10 हज़ार रूपये जमा किए
थे। नोट करें कि महज़ कुछ ही सालों पहले तक इस प्रकार की सरकारी प्रक्रिया को चुनाव
आयोग द्वारा तत्काल रोक दिया जाता था। कभी अदालतें इसे रोक देती थीं। इसके अनेक उदाहरण
हैं। लेकिन अक्टूबर - नवंबर 2024 में बिहार में यह बेरोकटोक चला! जिसे आज भी नियमों के हिसाब से भी भ्रष्टाचार
माना जाता है वह आचरण बिना चुनाव आयोग की दखल के चला!
और अब यह ख़बर कि लोकसभा चुनाव 2024 के लिए मतदान शुरू हुआ उससे ऐन पहले एक प्रोजेक्ट के मामले
में एक ऊद्योग समूह ने सत्ताधारी पार्टी को करोड़ों रूपये का चंदा दिया, हज़ारों करोड़ की सब्सिडी ली और बदले में मुनाफ़ेदार योजना
की मंज़ूरी प्राप्त कर ली! लोग लिख रहे हैं कि जिसे कभी भ्रष्टाचार माना जाता था वह आज
राष्ट्रनिर्माण के ख़ूबसूरत नाम तले किया जा रहा है!
स्वाभाविक है कि इसे
जनता के बहुत अधिक हिस्से में पॉलिटिकल फंडिंग और मुनाफ़ा कमाने की सहुलियत के उस पुराने
कॉकटेल योजना के नये अवतार के रूप में देखा जा रहा है, जिसे सुप्रीम कोर्ट
ने असंवैधानिक और ग़ैरक़ानूनी कहा था। और यह ख़याल सोशल मीडिया पर तेज़ी के साथ प्रकट
किया जा रहा है।
बता दें कि इलेक्टोरल
ट्रस्ट कंपनियों द्वारा स्थापित एक ट्रस्ट होता है जिसका उद्देश्य कंपनियों और व्यक्तियों
द्वारा राजनीतिक दलों को दिए जाने वाले दान को सुगम बनाना होता है। यह योजना 2013 में यूपीए सरकार द्वारा
शुरू की गई थी।
पैटर्न उस इलेक्टरोल बॉन्ड योजना जैसा जिसे सुप्रीम कोर्ट ने
असंवैधानिक घोषित किया था, चंदा दो और धंधा लो!
जिस विवादित योजना
को 15 फ़रवरी 2024 को सुप्रीम कोर्ट असंवैधानिक व ग़ैरक़ानूनी घोषित कर चुका था, नया आने वाला यह प्रकरण
उसीके नये रूप सरीखा दिखाई दे रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार
सेमीकंडक्टर प्रोजेक्ट में सरकारी सब्सिडी पाने वाली हर बड़ी कंपनी ने ठीक मंज़ूरी
के कुछ दिनों या हफ़्तों बाद बीजेपी को मोटा चंदा दिया! जैसे कि,
तमिलनाडु का मुरुगप्पा ग्रुप: फ़रवरी 2024 में ही तीसरे सेमीकंडक्टर
प्लांट की मंज़ूरी मिली। सब्सिडी 3501 करोड़ रुपये की मिली। रिपोर्ट के अनुसार मंज़ूरी के कुछ दिनों बाद ग्रुप ने बीजेपी
को 125 करोड़ रुपये का दान दिया।
कायनेस टेक्नोलॉजी के एमडी रमेश कुन्हिकन्नन: सितंबर 2024 में गुजरात के साणंद में सेमीकंडक्टर यूनिट की मंज़ूरी मिली। इससे पहले 2023-24 में उन्होंने व्यक्तिगत
रूप से बीजेपी को 12 करोड़ रुपये दिए थे।
मोदी सरकार का सेमीकंडकटर मिशन, राष्ट्रनिर्माण जैसे भावनात्मक नाम के नीचे पैटर्न वही जो असंवैधानिक
घोषित इलेक्टरोल बॉन्ड योजना में था
जैसे कि ऊपर लिखा, यहाँ पैटर्न उस इलेक्टरोल
बॉन्ड योजना जैसा दिखाई दिया, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक घोषित किया था। वही पैटर्न - चंदा दो और धंधा
लो! वसूली और भ्रष्टाचार की उस उस्तादी योजना जैसे ही रंग और ढंग! भ्रष्टाचार के ऊपर राष्ट्रनिर्माण जैसे भावनात्मक नाम का आवरण!
2021 में कोविड महामारी के दौरान चीन-ताइवान से चिप सप्लाई बाधित होने के बाद ऑटोमोबाइल
सेक्टर को भारी नुक़सान हुआ था। इसके बाद मोदी सरकार ने 'इंडिया सेमीकंडक्टर
मिशन' शुरू किया और हज़ारों करोड़ रुपये की सब्सिडी देने का ऐलान किया। योजना यह थी
कि जो कंपनी प्लांट लगाएगी, उसकी कुल लागत का 50 फ़ीसदी केंद्र और कुछ हिस्सा राज्य सरकार उठाएगी।
157 साल पुराने टाटा ग्रुप की सेमीकंडक्टर में दिलचस्पी भी पहले से ही है। 2021 में टाटा संस ने एक
टेलीकॉम कंपनी ख़रीदी, जिसने बाद में एक भारतीय चिप डिज़ाइन कंपनी में सबसे बड़ी हिस्सेदारी ली। 2022-23 में जापान की रेनेसास
और अमेरिका की माइक्रोन के साथ साझेदारी की।
फ़रवरी 2024 में मोदी कैबिनेट
ने तीन प्लांट को हरी झंडी दिखाई। इसमें से दो प्लांट गुजरात में और एक असम में लगाने
की बात कही गई। दो बीजेपी शासित राज्य में हैं।
टाटा को दो प्लांट
मिल गए।
पहला - धोलेरा (गुजरात)
में 91000 करोड़ का फैब्रिकेशन प्लांट - ताइवान की पावरचिप के साथ मिलकर सिलिकॉन वेफ़र से
तैयार चिप बनाना,
और दूसरा - मोरीगाँव
(असम) में 27000 करोड़ का असेंबली यूनिट - चिप असेंबली, टेस्टिंग और पैकेजिंग यूनिट।
टाटा और बीजेपी के
बीच यह वित्तीय लेन-देन सब्सिडी और चंदे के बीच संयोग है या कुछ और, इस सवाल को किसी एक
नज़रिए सोचा-समझा जा सकता है, लेकिन साबित कुछ भी किया नहीं जा सकता। वहीं आँकड़े एक पैटर्न दिखा रहे हैं -
जिस कंपनी को सेमीकंडक्टर में सबसे बड़ी सब्सिडी मिली, वही बीजेपी की सबसे
बड़ी दानदाता बन गई!
इलेक्टोरल बॉन्ड असंवैधानिक और ग़ैरक़ानूनी योजना थी लेकिन उस
योजना में शामिल किसी को सज़ा नहीं मिली थी, यहाँ
भी साबित कुछ नहीं किया जा सकता
इन्हीं चीज़ों को पहले
भ्रष्टाचार कहा जाता था। देश का मीडिया इस कदर किसी सत्ता की मुठ्ठी में नहीं था और
इस वजह से वह थोड़ा स्वतंत्र या थोड़ा बेबाक होकर रिपोर्टींग करता था। देश का मीडिया
देश की जनता के नैरेटिव को बदल देता था।
जिस इलेक्टोरल बॉन्ड
योजना को सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक व ग़ैरक़ानूनी घोषित किया था, उसमें बहुत सारी कंपनियाँ, संस्थाएँ, व्यक्ति थे, जिन्होंने उस प्रक्रिया
में खुलकर भाग लिया था। ऐसे बहुत से नाम उन दिनों सार्वजनिक हुए थे। उसे फिर से देखने
के लिए यहाँ क्लिक करें।
लेकिन उसमें से किसी
एक को भी सज़ा नहीं हुई, ना ही किसी को क़ानूनी प्रक्रिया का सामना करना पड़ा। वजह साफ़ थी। यही कि जिन्होंने
भी हिस्सा लिया था वह उसमें क़ानूनी ढंग से शामिल थे, क्योंकि वे तो केंद्र
सरकार द्वारा चलाई जा रही क़ानूनी योजना में शामिल हो रहे थे। उस योजना को ग़ैरक़ानूनी
और असंवैधानिक तो बाद में घोषित किया गया था।
तभी तो कहा गया था
कि मोदी सत्ता ने भ्रष्टाचार के राक्षस के मुँह को क़ानूनी बुर्के से ढाँप दिया था, इसलिए योजना भले ही
ग़ैरक़ानूनी और असंवैधानिक घोषित हुई, लेकिन चल रही थी तब तो वो केंद्र की योजना थी, जिसमें शामिल होना अपराध नहीं था।
इसीके चलते ही उसे 'वसूली और भ्रष्टाचार की उस्तादी योजना' कहा गया था। यहाँ भी जो हुआ वह अनीति और भ्रष्ट आचरण है, लेकिन उसे घोटाला या भ्रष्टाचार के रूप में साबित नहीं किया
जा सकता। चंदे के बदले धंधा - यह हुआ है तब भी नहीं। गोदी मीडिया जब तक मुठ्ठी में
है तब तक तो बिलकुल नहीं।
किसी बड़ी परियोजना
की मंज़ूरी के बाद सत्ताधारी दल को करोड़ों का चंदा देना। इस मामले में फंडिंग का विवाद
नहीं है, बल्कि टाइमिंग का विवाद है। संयोग है या सबूत, इस पर सबकी अपनी अपनी राय है। प्रसिद्ध वक़ील और सामाजिक कार्यकर्ता
प्रशांत भूषण इसे रिश्वतखोरी कहते हैं। कहते हैं कि चंदा वैध है, लेकिन बदले में ठेका
मिला तब ग़लत।
क़ानूनी लिहाज़ से
इसमें कुछ भी ग़लत साबित करना मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुमकिन है। लेकिन अँधा भी देख
सकता है कि यह न सिर्फ़ अनैतिक है, बल्कि सत्ताधारी दल और कॉर्पोरेट कंपनी के बीच लेन-देन का खुला खेल है।
चंदे का खेल, दस साल की सत्ता में बीजेपी
साठ साल की कांग्रेस से भी दस गुना अमीर!
इलेक्टोरल बॉन्ड योजना
असंवैधानिक और ग़ैरक़ानूनी घोषित होने के बाद यह एक नया तरीक़ा मालूम पड़ता है। बीजेपी
और नरेंद्र मोदी, दोनों की विशेष महारत चुनाव है। वे चुनाव लड़ने के लिए नहीं लड़ते, वे जीतने के लिए ही
लड़ते हैँ। चुनाव लड़ने और जीतने के लिए जिस तरह के हथकंडे इन्होंने अपनाये हैं, पहले उन हथकंडों को
छूने से भी राजनीतिक दल डरा करते थे! सबसे बड़ा डर देश के मीडिया का था।
इसके लिए ढेर सारा
पैसा चाहिए। और इसका रास्ता है चंदा। चंदा वैसे होता तो आसमान में है, लेकिन ज़मीन पर राजनीतिक
दलों को बेहद काम आता है! चुनावी चंदे के मामले में बीजेपी और दूसरों का मोटा मोटी इतिहास
हम देख चुके हैं। चंदा किस तरह जबरन वसूली बन गया वह भी हमने देखा।
13 दिसंबर 1948 को संविधान सभा में प्रो. केटी शाह (समाजवादी) ने प्रस्ताव रखा था कि राजनीतिक
दलों को केवल व्यक्ति-व्यक्ति से ही चंदा लेने का अधिकार हो, कोई कंपनी, फ़र्म या संस्था राजनीतिक
दल को चंदा न दे सके। तर्क और सामान्य समझ थी कि कंपनियाँ चंदा देकर सरकारों को प्रभावित
करती हैं, यह लोकतंत्र के लिए ख़तरा है। लेकिन केटी शाह का प्रस्ताव इस तर्क पर ख़ारिज
हो गया कि अगर कंपनियों का चंदा बंद कर दिया तो दल केवल अमीर व्यक्तियों पर निर्भर
हो जाएँगे। इससे और ज़्यादा पूँजीपति प्रभाव बढ़ेगा।
2014 के आम चुनाव से ठीक पहले यानी 2013-14 में, बीजेपी के खाते में 464 करोड़ रुपये थे। कांग्रेस के पास 586 करोड़, और अन्य राष्ट्रीय दलों के पास मिलाकर 1,000 करोड़ से कम पैसा था। 2023-24 में बीजेपी के पास कैश और बैंक बैलेंस 7113 करोड़ हो गया। कांग्रेस के पास 857 करोड़ और अन्य दलों के पास मिलाकर कुल राष्ट्रीय दलों के पास 5,820 करोड़ हैं।
यानी साठ साल राज करने
वाली कांग्रेस से लगभग दस गुना पैसा उस बीजेपी के पास है जो दस साल से राज कर रही है! वैसे चंदा हमेशा ही लिया जाता रहा है। पार्टियों के आम कार्यकर्ता जनता के बीच
जाकर चंदा माँगते थे लेकिन धीरे-धीरे यह रिवाज ख़त्म हुआ और पूरी निर्भरता बड़ी कंपनियों
पर हो गयी।
यानी पूरी लोकतांत्रिक
प्रणाली बड़ी पूँजी पर निर्भर हो गयी। नतीजा यह कि सरकारें पूरी बेशर्मी से कॉर्पोरेट
कंपनियों के हित में नीतियाँ बनाने लगीं। ताज़ा मामला श्रम क़ानूनों का है।
भारत
एक भावनात्मक समाज है। जहाँ भावना हो वहाँ बहुत सारी चीज़ें छोटी पड़ जाती हैं। टाटा
जैसा प्रतिष्ठित नाम इस प्रकरण में शामिल है। वह नाम जो भारत के लोगों की भावना से
जाकर जुड़ता है। व्यावहारिक बुद्धि कहती है कि जहाँ करोड़ों की कमाई हो वहाँ सब इतना
सीधा नहीं होता। सीधे रस्ते से हज़ार रूपये कमाना भी टेढ़ी खीर है, करोड़ों अरबों की बात तो दूर है।
टाटा
के सिवा भी भारतीय समाज में दूसरे अनेक ब्रांड, कंपनियाँ, व्यक्ति या संस्थाएँ हैं, जो समाज की इसी भावना की आड़ में व्यापार या राजनीति कर जाते
हैं। जिनके उत्पाद, जिनके इश्तेहार, तक पेनल्टी के क़ाबिल माने
जा चुके हैं वह रामदेव बाबा भी तिरंगे और देश के ज़रिए बहुत कुछ कर जाते हैं।
उद्योग, कंपनियाँ, उत्पाद, निवेश, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय
पहचान, रोजगार, आर्थिक मौक़ा, तकनीक, समाज, प्रगति। न जाने क्या क्या? ऊपर से अनगिनत दान, जिससे
स्कूल, अस्पताल, सामाजिक या मानवीय कल्याण
के विभिन्न काम चलते हैं। दस ग़लत काम करते हुए एकाध-दो अच्छे काम वाला द्दष्टिकोण
भी दुनिया में इसे लेकर ज़िंदा है।
इस लिहाज़
से टाटा, बिरला, रिलायंस समेत बड़े बड़े ब्रांड
के साथ जुड़े अतिविवादित संस्करणों को सभी अपने अपने हिसाब से देखते और समझते हैं।
पूंजीवाद या समाजवाद जैसे चक्करों में फ़िलहाल हमें नहीं जाना है। यह आप देख लीजिएगा।
बात इतनी सी है कि राष्ट्र और धर्म, दोनों बहुत विशाल मुद्दे हैं
और इन दोनों के साथ राजनीति और उद्योग, दोनों जुड़ जाए तब आसमाँ छोटा
पड़ जाता है।
(इनसाइड इंडिया, एम वाला)






