अरावली
- सिर्फ़ भारत ही नहीं
बल्कि दुनिया की सबसे पुरानी ग्रीन वॉल्स में शामिल वो पर्वतमाला, जो हिमालय के दादा समान
गिरनार की भी परदादा है। भारत के एक बड़े भूभाग का प्राकृतिक फेफड़ा।
प्राचीन-वाचीन तो चुनावी नारा है, चलिए, आधुनिक विकास आ रहा है तो प्राचीन चीज़ों की भी परिभाषा बदलते हैं!
पहाड़, नदियाँ, जंगल, सब का नाश कर देने की
ज़िद हमने यूँ ही थोड़ी पाली है? विकास के लिए थोड़ा बहुत तो होता है। है न? जो विकास की ज़िद पाले
बैठे हैं उनके लिए तो बड़े पहाड़ तक पहाड़ नहीं हैं, फिर ये 100 मीटर-सीटर क्या है?
धार्मिक
ग्रंथों में पहाड़ भगवान ने लोगों और मवेशियों की रक्षा हेतु उठाया था, फिर वापस वहीं रख दिया
था। हम भगवान थोड़ी हैं? हम दूसरे मक़सद के चलते पहाड़ उठाएँगे। हमसे नहीं उठे तो फिर पहाड़
को कह देंगे कि भाई तूँ इतने मीटर का है इसलिए तूँ पहाड़ नहीं है, चल हट, विकास के लिए रास्ता कर!
हम लोग
समंदर में डूब चुके नगर को ढूँढेंगे, नहीं मिल रहा होगा तो भी ढूँढेंगे, उधर आँखों के सामने इससे
भी प्राचीन है, जो दिख रहा है, उसे डूबा कर दम लेंगे! ये पर्वत-सर्वत क्या है? ऐ पर्वत, तेरा अपना हिस्सा, जो तेरा ख़ुद का है, वह तेरा माना जाएगा या
नहीं यह भी हम ही तय करेंगे!
फ़िलहाल तो सुप्रीम कोर्ट ने भारी विरोध
के बाद अपने ही फ़ैसले को रोक दिया है। देश का सर्वोच्च न्यायालय है, लिहाज़ा
उसे पूछा नहीं जा सकता कि इतनी प्राचीन और महत्वपूर्ण विरासत पर फ़ैसला देते समय
उसे जो जाँचना-परखना-समझना था वो सब तभी क्यों नहीं हुआ जब वह फ़ैसला दिया जा रहा
था?
जो लोग हिमालय को जानते-समझते हैं
उन्हें पता होना चाहिए कि हिमालय के एक दादा गुजरात में स्थित है, जिसे
गिरनार कहा जाता है। गुजरात के जूनागढ़ में स्थित गिरनार, हिमालय
की उत्पति हुई उससे भी पहले मौजूद है। और इस गिरनार के परदादा समान है अरावली।
दुनिया की प्राचीनतम पर्वत श्रुंखलाओं में से एक।
वह दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत
श्रृंखलाओं में से एक है, लगभग 2-2.5 अरब साल पुरानी, जिसका
निर्माण प्रोटेरोज़ोइक युग में हुआ। यह युग पृथ्वी के इतिहास का वह दौर था जब
वायुमंडल ऑक्सीजन से भरने लगा था और जीवन का स्पंदन बहुकोशिकीय जीवन के रूप में शुरू
हो रहा था। अरावली की उम्र के सामने महान हिमालय बच्चा ही है!
स्वाभाविक है कि अरावली की मूल संरचना
या मूल रूप वर्तमान स्थिति से बहुत अलग था। उसकी हत्या आज से नहीं बल्कि दशकों से
हम लोग कर रहे हैं। धीरे धीरे आधुनिक भारत काल में यह दिल्ली के रायसीना हिल्स से
शुरू होती है, चार
राज्यों से गुज़रते हुए, राजस्थान के माउंट आबू में गुरूशिखर पर अपनी सबसे ऊँची चोटी
बनाकर, गुजरात
के अहमदाबाद में गुलबाई टेकरा पर ख़त्म होती है।
हालाँकि ज़मीनी रूप से अरावली की इस
आधुनिक पहचान को भी बदल दिया गया है। चार राज्यों से गुज़रने वाली इस पर्वतमाला के
ऊपर या आसपास बसे कई इलाक़ों के लोग जानते तक नहीं कि वे दुनिया की सबसे
प्राचीन श्रुंखला में से एक पर बसे हैं!
सबसे पहले देखते है ताज़ा घटनाक्रम को।
अरावली पर्वतमाला पर सुप्रीम कोर्ट का वह फ़ैसला, जिसके
बाद विवाद और विरोध की आँधी चली
अरावली पहाड़ियों की परिभाषा के लिए
सुप्रीम कोर्ट द्वारा पर्यावरण मंत्रालय, भारतीय वन सर्वेक्षण, भारतीय
भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण, राज्यों के वन विभागों और सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी के सदस्यों
की एक कमेटी बनाई गई थी, जिसे अरावली को परिभाषित करने को कहा गया था।
इस कमेटी ने कोर्ट के सामने अपनी
अनुशंसा में कहा कि चार राज्यों में फैली अरावली पहाड़ियों में वही पहाड़ियाँ
अरावली श्रृंखला का हिस्सा मानी जाएँ जिनकी ऊँचाई 100 मीटर या उससे अधिक
हो।
कमेटी की इस अनुसंशा पर केंद्र सरकार का
कहना था कि नई परिभाषा का मक़सद नियमों को मज़बूत करना और एकरूपता लाना है, जिससे
अरावली ज़्यादा सुरक्षित हो पाए।
20 नवम्बर 2025 के दिन सुप्रीम
कोर्ट ने इस अनुसंशा को मान लिया और फ़ैसला दिया कि जिनकी ऊँचाई आसपास की ज़मीन से
कम से कम 100
मीटर (328
फ़ीट) या उससे अधिक होगी उसे ही पहाड़ माना जाएगा। दो या उससे ज़्यादा ऐसी
पहाड़ियाँ, जो
500
मीटर के दायरे के अंदर हों और उनके बीच ज़मीन भी मौजूद हो, तब
उन्हें अरावली श्रृंखला का हिस्सा माना जाएगा।
स्थानीय या लोकल रिलीफ़ किसी भू-आकृति
(जैसे पहाड़ी) के आसपास की सबसे निचली सतह से ऊँचाई का अंतर है। जैसे, किसी
पहाड़ी के आधार पर सबसे निचली कंटूर लाइन 300 मीटर पर है, और
शिखर 450
मीटर पर, तो
स्थानीय रिलीफ़ 150
मीटर होगी।
यानी सुप्रीम कोर्ट ने खनन के लिए
ज़रूरी कर दिया कि सौ मीटर से कम लोकल रिलीफ़ हो तो खनन किया जा सकता है। हालाँकि
आदेश में नयी खनन लीज़ पर रोक लगायी गयी। लेकिन यह रोक ‘सस्टेनेबल
प्लान’ बनने
तक ही थी। साथ ही मौजूदा वैध खनन जारी रखने की अनुमित शामिल थी।
अदालत के इस फ़ैसले से यह डर पैदा हो
गया कि संकीर्ण, ऊँचाई
पर आधारित यह मानदंड पारिस्थितिक रूप से महत्वपूर्ण निचली पहाड़ियों को बाहर कर
देगा, जिससे
वे खनन, निर्माण
और विकास की अँधी ज़द में आसानी से आ जाएगी। उत्तरी भारत के लिए भूजल रिचार्ज, जैव
विविधता और जलवायु विनियमन तबाह होने के जोखिम को लेकर भी चिंताएँ पसर गईँ।
सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले के तुरंत
बाद उत्तर भारत के राज्यों में लोग सड़क पर उतर आए और विरोध प्रदर्शन होने लगे।
सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक कैंपेन चल पड़ा।
उत्तर भारत के कई शहरों में शांतिपूर्ण
प्रदर्शन हुए। इनमें स्थानीय लोग, किसान, पर्यावरण कार्यकर्ताओं के अलावा कुछ जगहों पर वकील और अन्य
व्यवसायी भी शामिल हुए। इन प्रदर्शनों में तेज़ी लाने की तथा प्रदर्शन का दायरा
बढ़ाने की बातें होने लगीं।
जिस सौ मीटर नियम को
सुप्रीम कोर्ट ने मंज़ूर किया उसका अपनी ही कमेटी ने किया था विरोध!
इस अति विवादित घटनाक्रम में सबसे
चौंकाने वाली बात यह थी कि इसी सौ मीटर वाले नियम का सुप्रीम कोर्ट की अपनी समिति
ने पहले विरोध किया था!
पिछले कुछ समय के दौरान बहुत कुछ ऐसा
हुआ है जिससे न्यायपालिका की साख पर सवाल उठाए जा चुके हैं, और
इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने जिस क़िस्म की लापरवाही बरती है वह बेशक अफ़सोसजनक है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अपने ही एमिकस क्यूरी (न्यायमित्र) की बात मानने से
इनकार कर दिया।
कमेटी की अनुशंसाओं से असहमति जताते हुए
न्यायमित्र वरिष्ठ वक़ील के. परमेश्वर ने अरावली श्रृंखला की नई परिभाषा का विरोध
किया। उन्होंने कहा कि भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI) ने इससे पहले अरावली की परिभाषा को लेकर
जो नियम बनाए थे वो ज़्यादा बेहतर और पारिस्थितिकीय रूप से उपयुक्त थे।
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के
अनुसार अदालत को सहायता देने वाले वकील के. परमेश्वर ने कोर्ट में पावरपॉइंट
प्रेजेंटेशन देकर 100 मीटर नियम का विरोध किया था। उन्होंने
कहा था कि इससे अरावली की इंटेग्रिटी ख़त्म हो जाएगी और छोटी पहाड़ियाँ खनन के लिए
खुल जाएगी।
13 अक्टूबर 2025
को मंत्रालय ने कोर्ट में 100 मीटर ऊँचाई वाली
परिभाषा पेश की। सत्यहिंदी ने द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के आधार पर लिखा है
कि अगले ही दिन, 14
अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट की कमेटी सीईसी ने कोर्ट की मदद करने वाले वकील को पत्र
लिखकर कहा कि उन्होंने न तो इस प्रस्ताव की जाँच की है और न ही मंज़ूरी दी है।
अख़बार की रिपोर्ट के अनुसार सीईसी के
चेयरमैन सिद्धांत दास ने लिखा कि एफएसआई की पुरानी परिभाषा ही अपनाई जानी चाहिए, जिसमें
कम से कम 3
डिग्री ढलान वाले इलाक़े को अरावली माना जाता है। इससे छोटी पहाड़ियाँ भी सुरक्षित
रहती हैं।
अरावली पहाड़ की पहले की परिभाषा क्या?
इस विवादित फ़ैसले से पहले की स्थिति
देखें तो, भारतीय
वन सर्वेक्षण की पूर्व अनुशंसा के अनुसार, 3 डिग्री से अधिक ढाल, जिसमें
घाटियों की चौड़ाई 500 मीटर हो, उसे अरावली श्रृंखला का हिस्सा समझा जाए, इसके
अतिरिक्त पहाड़ी के नीचे (तलछटी) में 100 मीटर की चौड़ाई तक
किसी भी क़िस्म की कोई गतिविधि ना की जाए।
लेकिन शायद सरकार, उसकी
कमेटी और सुप्रीम कोर्ट, तीनों को यह रास नहीं आया।
अरावली का हाल
हालाँकि सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही
फ़ैसले को विरोध के बाद रोका ज़रूर है, किंतु उस विवादित फ़ैसले के संबंध में
देखा जाए तो,
भारतीय वन सर्वेक्षण के अनुसार, पूरी
अरावली श्रृंखला में 12,081 पहाड़ियाँ हैं जिनमें से मात्र 1048
पहाड़ियाँ ही सरकार के 100 मीटर के मानक पर खरी उतरती हैं। यानी
पूरे अरावली का सिर्फ़ 8.7% हिस्सा ही अरावली माना जाएगा?
सोच कर देखिए कि लगभग 200
करोड़ साल पुरानी अरावली श्रृंखला, जो चार राज्यों में लगभग 670 किमी तक फैली है, उसके
भविष्य को कुछ एक मानक 'ऊँचाई' के आधार पर तय कर दिया गया!
क्या सुप्रीम कोर्ट को उस कमेटी के पक्ष को मानने से पहले स्वतंत्र पर्यावरणविदों
और इसके विशेषज्ञों से सलाह मशविरा नहीं करना चाहिए था?
अरावली पर सुप्रीम कोर्ट
का फ़ैसला और सतत खनन की सरकारी ज़िद, दोनों
को एक साँचे में क्यों देखने लगे लोग?
फ़िलहाल तो सुप्रीम कोर्ट ने भारी विरोध
के बाद अपने ही फ़ैसले को रोक दिया है। देश का सर्वोच्च न्यायालय है, लिहाज़ा
उसे पूछा नहीं जा सकता कि इतनी प्राचीन और महत्वपूर्ण विरासत पर फ़ैसला देते समय
उसे जो जाँचना-परखना-समझना था वो सब तभी क्यों नहीं हुआ जब वह फ़ैसला दिया जा रहा
था?
सुप्रीम कोर्ट से पूछा नहीं जा सकता कि
इतना विरोध नहीं हुआ होता तो अब जो जाँचना-परखना-समझना है वह नहीं होता? पर्यावरण
से जुड़ा मामला, प्रकृति
की सबसे प्राचीन धरोहरों से जुड़ा मामला, एक ऐसा मामला जिसमें
यदि एक बार गँवा दिया तो वह दोबारा हासिल नहीं हो सकता, क्या
ऐसे मामले में पहले फ़ैसला देते समय वह व्यापक जाँच-परख-विश्लेषण नहीं हुआ था, कि
अब स्टे लगाकर किया जाएगा?
ना केंद्र सरकार, ना
राष्ट्रपति और ना सुप्रीम कोर्ट। किसी को स्वयं को भारत का मालिक समझना ठीक नहीं
है। ताक़त संविधान से आती है और उस संविधान का संरक्षक सुप्रीम कोर्ट है। असली
ताक़त भारत के लोगों में निहित है।
पूरी दुनिया में सबसे संवेदनशील, सबसे
बड़ा, सबसे
महत्वपूर्ण, मुद्दा
पर्यावरण है। इस पर व्यापक बहस होती है, हर पक्ष को सुना जाता है और सर्वसम्मति
से फ़ैसले लिए जाते हैं। शायद भारत इकलौता देश है जहाँ सर्वोच्च अदालत, जिसके
पास पर्यावरण संबंधी मुद्दों में कोई विशेषज्ञता नहीं है, वे
एक जगह पर बैठकर उन मुद्दों पर फ़ैसले सुना देती है जिनका असर सिर्फ़ भारत ही नहीं
पूरी मानवता पर पड़ सकता है!
फिर विवाद और विरोध के सुर उठने के बाद
वह अपने फ़ैसले पर रोक लगा देती है! दरअसल, अरावली
पर्वतमाला के वर्तमान विवाद में सुप्रीम कोर्ट और उसका फ़ैसला, दोनों
आम जनता में चिंता, निराशा और भय का सबब बना हुआ है।
अरावली पर सुप्रीम कोर्ट ने जब अपना वह
विवादित फ़ैसला दिया, तभी से पर्यावरण संरक्षण से जुड़े लोगों ने इस पर आपत्तियाँ
जताई थीं। इस फ़ैसले से अरावली का भविष्य और पर्यावरणीय असर, जैव
सृष्टि, वन
संपदा और पूरे इको सिस्टम पर होने वाले बुरे प्रभावों की बातें कही गईं, जैसे
कि,
·
ऐसी परिभाषा जानलेवा है, फैटल है
·
यह अरावली के लिए एक डेथ
वारंट है
· सुप्रीम कोर्ट ने जिस
कमेटी की अनुसंशा को माना उस पूरी कमेटी का ढाँचा सरकारी अधिकारियों से पटा पड़ा
है, शायद ही इसमें कोई
स्वतंत्र पर्यावरणविद् हो
·
इसलिए कोई ताज्जुब नहीं
कि सरकारी अधिकारी अपने आका की बातों को कोर्ट के सामने रख रहे हों
·
पर्यावरण मुद्दों को लेकर
सामान्य समझ रखने वाला भी इस बात को नकार देता, जिसे अनुसंशा के नाम पर स्वीकार किया गया
पर्यावरणविदों का कहना है कि सिर्फ़
ऊँचाई के आधार पर अरावली को परिभाषित करने से कई ऐसी पहाड़ियों पर खनन और निर्माण
के लिए दरवाज़ा खुल जाने का ख़तरा पैदा हो जाएगा, जो 100 मीटर से छोटी हैं, झाड़ियों
से ढँकी हुईं और पर्यावरण के लिए ज़रूरी हैं।
लोगों में एक धारणा पनपी कि अरावली के
मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की ज़िद को आँख बंद करके मान लिया था और
आँख बंद करके केंद्र सरकार को ऐसी आज़ादी दी थी, जो मानवता पर असर डालने वाला गंभीर
मामला था।
अरावली को लेकर
विशेषज्ञों की चिंताएँ क्या है?
जैसा कि हमने देखा, पर्यावरणविदों
का कहना है कि सिर्फ़ ऊँचाई के आधार पर अरावली को परिभाषित करने से कई ऐसी
पहाड़ियों पर खनन और निर्माण के लिए दरवाज़ा खुल जाने का ख़तरा पैदा हो जाएगा, जो
100
मीटर से छोटी हैं, झाड़ियों
से ढँकी हुईं और पर्यावरण के लिए ज़रूरी हैं।
पर्यावरणविदों का कहना है कि 25%
अरावली खनन से पहले ही नष्ट हो चुकी है। और यही ख़तरा सुप्रीम कोर्ट के नये आदेश
से है।
पीपल फ़ॉर अरावलीज़ समूह की संस्थापक
सदस्य नीलम आहलूवालिया ने बीबीसी से कहा कि नई परिभाषा अरावली की अहम भूमिका को
कमज़ोर कर सकती है। उन्होंने कहा कि अरावली उत्तर पश्चिम भारत में रेगिस्तान बनने
से रोकने, भूजल
को रीचार्ज करने और लोगों की आजीविका बचाने के लिए ज़रूरी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि छोटी-छोटी
झाड़ियों से ढँकी पहाड़ियाँ भी रेगिस्तान बनने से रोकने, भूजल
रीचार्ज करने और स्थानीय लोगों के रोज़गार में अहम योगदान देती हैं।
अरावली बचाने के आंदोलन से जुड़े
पर्यावरण कार्यकर्ता विक्रांत टोंगड़ कहते हैं, "अरावली को सिर्फ़
ऊँचाई से नहीं बल्कि उसके पर्यावरणीय, भूगर्भीय और जलवायु संबंधी महत्व से परिभाषित किया जाना
चाहिए।"
उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहाड़ों
और पहाड़ी प्रणालियों की पहचान उस काम से होती है, जो
उनके होने से संभव होते हैं न कि ऊँचाई के किसी मनमाने पैमाने से।
वह कहते हैं, "ज़मीन
का कोई भी हिस्सा जो भूगर्भीय रूप से अरावली का हिस्सा है और पर्यावरण संरक्षण या
रेगिस्तान बनने से रोकने में अहम भूमिका निभाता है, उसे अरावली माना जाना चाहिए, चाहे
उसकी ऊँचाई कितनी भी हो।"
टोंगड़ चेतावनी देते हैं कि अदालत की नई
परिभाषा से खनन, निर्माण
और व्यावसायिक गतिविधियों को बढ़ावा मिल सकता है, जिससे पारिस्थितिकीय तंत्र को नुक़सान
होने का ख़तरा बढ़ जाएगा।
कार्यकर्ता माँग कर रहे हैं कि सरकार
अरावली क्षेत्रों को वैज्ञानिक मानकों से परिभाषित करे, जिसमें
उसका भूगोल, पर्यावरण, वन्यजीव
संपर्क और जलवायु संघर्ष क्षमता शामिल हो।
विवादित फ़ैसले के बाद
सरकार का क्या कहना था?
सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही फ़ैसले को
फ़िलहाल तो रोक दिया है। लेकिन इससे पहले केंद्र सरकार उत्तर भारत के लोगों, पर्यावरणविदों, विशेषज्ञों, सभी
की चिंताओं को कम गंभीर दिखाने की कोशिश कर रही थी।
सरकार की तरफ़ से 21
दिसम्बर को एक बयान में कहा गया था कि नई परिभाषा का मक़सद नियमों को मज़बूत करना
और एकरूपता लाना है। बयान में यह भी कहा गया था कि खनन को सभी राज्यों में समान
रूप से नियंत्रित करने के लिए एक स्पष्ट और वस्तुनिष्ठ परिभाषा ज़रूरी थी।
इसमें जोड़ा गया था कि नई परिभाषा पूरे
पहाड़ी तंत्र को शामिल करती है, जिसमें ढलानें, आसपास की ज़मीन और बीच के इलाक़े शामिल हैं ताकि पहाड़ी समूहों
और उनके आपसी संबंधों की सुरक्षा हो सके। केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने कहा था कि
यह मान लेना ग़लत है कि 100 मीटर से कम ऊँचाई
वाली हर ज़मीन पर खनन की इजाज़त होगी।
सरकार ने कहा था कि अरावली पहाड़ियों या
श्रृंखलाओं के भीतर नए खनन पट्टे नहीं दिए जाएँगे और पुराने पट्टे तभी जारी रह
सकते हैं, जब
वे टिकाऊ खनन के नियमों का पालन करें। मंत्रालय ने यह कहा था कि अभेद्य क्षेत्रों, जैसे
कि संरक्षित जंगल, पर्यावरण
संवेदनशील क्षेत्र और आर्द्रभूमि में खनन पर पूरी तरह रोक है। हालाँकि इसका अपवाद
कुछ विशेष,
रणनीतिक
और परमाणु खनिज हो सकते हैं, जिसकी अनुमति क़ानूनन दी गई हो।
पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा
था कि 1,47,000
वर्ग किलोमीटर में फैली अरावली श्रृंखला का सिर्फ़ लगभग 2%
हिस्सा ही संभावित रूप से खनन के लिए इस्तेमाल हो सकता है और वह भी विस्तृत अध्ययन
और आधिकारिक मंज़ूरी के बाद।
केंद्र सरकार कहती है कि अरावली का 90%
क्षेत्र संरक्षित रहेगा, केवल 0.19% में खनन होगा। लेकिन
फ़ैसले का विरोध करने वालों का कहना है कि यह एक 'चोर
रास्ता' है जिससे खनन तेज़ होगा और अरावली को
नुक़सान होगा।
पर्यावरण के मामलों में
सरकारें संदिग्ध रही हैं, सुप्रीम
कोर्ट को अपने ही फ़ैसले पर स्टे लगाने के घटनाक्रम से बचना नहीं चाहिए था?
नवंबर 2025 में अरावली को लेकर
फ़ैसले के बाद उत्तर भारत समेत लगभग पूरे भारत में विरोध हुआ, चिंताएँ
जताईं गईं। इसके बाद 29 दिसंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने
अपने उस फ़ैसले पर स्वयं ही रोक लगा दी।
बिलकुल साफ़ बात है कि पर्यावरण के
मामलों में सरकारें सदैव संदिग्ध रही हैं। तमाम राज्यों में, तमाम
समय, पर्यावरण
का नाश करने की आज़ादी सरकारों ने ही दे रखी हो ऐसा माहौल देखा जा चुका है। विकास, सहुलियत, भव्यता
और दिव्यता के नाम पर सरकारें जंगल, नदियाँ, पहाड़, सभी की भद्द पीट चुकी हैं।
अदालतें, ख़ासकर सुप्रीम कोर्ट को सरकारी पक्ष या
ऐसी कमेटी के निष्कर्षों को सुनते समय बहुत ज़्यादा सतर्क रहना चाहिए था। सरकार, जिसका
सीधा संबंध एक ख़ास विचारधारा वाले राजनीतिक दल से होता है, उसके
अपने व्यक्तिगत आर्थिक हित भी हो सकते हैं, वह उद्योगपतियों और दलालों के
अप्रत्यक्ष गिरफ़्त में भी हो सकती है, ऐसे में उस पर या ऐसी कमेटी पर सीधे
आँखें बंद करके भरोसा नहीं किया जा सकता था।
दरअसल, कोई भी समृद्ध लोकतंत्र सक्षम नागरिक समूहों
(सिविल सोसाइटी) के बिना अस्तित्व में नहीं रह सकता। स्वतंत्र पर्यावरणविद् और
विशेषज्ञों की राय व रिपोर्ट के बिना सिर्फ़ सरकारी पक्ष या किसी कमेटी को सुनकर
फ़ैसला लेना अनुचित था।
जो मसला सतत विकास से जुड़ा हो वो बेहद
संवेदनशील मुद्दा होता है। यह क़ानून के प्रश्नों और ज़मानत इत्यादि से कहीं अधिक
महत्वपूर्ण है। एक भी ग़लत फैसला कई चीज़ो को संकट में डाल सकता है। ऐसी चीज़ें, जिसे
गँवा दिया तो फिर दोबारा हासिल नहीं किया जा सकेगा।
अगर कोई यह कहता है कि सुप्रीम कोर्ट
इतना गंभीर है कि उसने अपने ही फ़ैसले पर स्टे लगा दिया, तो
यह दलील चंद सेंकड तक ही ज़िंदा रह सकती है। उसे अपने ही फ़ैसले पर स्टे लगाने के
घटनाक्रम से बचना चाहिए था।
अरावली केवल दुनिया की
प्राचीन प्राकृतिक रचनाओं में से एक नहीं, इससे भी बहुत अधिक है
अरावली दुनिया की प्राचीनतम प्राकृतिक
रचनाओं में से एक ही नहीं है, वह केवल हिमालय के दादा गिरनार की परदादा मात्र नहीं है, वह
इससे भी बहुत अधिक है। वह भारत के एक बड़े भूभाग का प्राकृतिक फेफड़ा है। वह
दुनिया के सबसे पुराने 'टाइम कैप्सूल' में
से एक है और सबसे नाज़ुक वर्तमान है।
अरावली में पोस्टकार्ड-शिखर कम हैं, यानी
यह उतनी नाटकीय ऊँचाई वाली नहीं दिखती; लेकिन उसका पर्यावरणीय काम बहुत बड़ा
है। धूल को रोकना, पानी
रीचार्ज करना, जैव
विविधता की रक्षा करना और अपनी गोद में वन्यजीवों का लालन-पालन।
उत्तर-पश्चिम भारत की वह पर्वतमाला, जिसे
वैज्ञानिक साहित्य और लोकप्रिय भू-ज्ञान दोनों 'भारत की सबसे पुरानी
फोल्ड-माउंटेन बेल्ट' के रूप में पहचानते हैं। लोकइतिहासकार श्रीकृष्ण जुगनू बताते
हैं, "यह
वह पर्वत श्रृंखला है, जिसमें लूनी, बनास, साबरमती, साहिबी, बेड़च (आयड़), खारी, सूकड़ी, कोठारी, सोम, जाखमी, कमला नदियाँ और नक्की, पुष्कर, जयसमंद, मातृकुंडिया, बेणेश्वर
जैसी झीलें हैं।"
वह अनगिनत सदियों से थार मरुस्थल को
पूर्व की ओर बढ़ने से रोक रही है, वह सिंधु-गंगा के उर्वर मैदान को मरुस्थल बनने से रोक रही है, वह
चंबल, साबरमती
और लूनी जैसी महत्वपूर्ण नदियों को सहायता प्रदान करती है, ऐसे
में चार चार राज्यों- दिल्ली, राजस्थान, हरियाणा, गुजरात- में फैले पारिस्थिकीय तंत्र को लेकर न्यायिक और सरकारी
उदासीनता विचलित करने वाली है।
अरावली पर्वतमाला उत्तर भारत के लिए
उतनी ही महत्वपूर्ण है जितना कि विशाल हिमालय पर्वत। और अरावली तो हिमालय से भी
पुराने पर्वत गिरनार की परदादा है। अरावली के लंबे चौड़े वन क्षेत्र गुजरात, राजस्थान, हरियाणा
और दिल्ली में हवा की रफ़्तार तोड़ते हैं, नमी को रोकते हैं और इस तरह सूखे की
संभावना कम होती है।
अरावली सिर्फ पहाड़ नहीं, मौसम
को संतुलित करने की नैसर्गिक मशीन है। अरावली श्रृंखला वर्षा बढ़ाने, सूखे
को रोकने और आर्द्रता यानी वैटलैंड बनाए रखने में महत्वपूर्ण पारिस्थितिकीय भूमिका
निभाती है।
यहाँ की दरारयुक्त चट्टानें ग्राउंड
वाटर रीचार्जिंग के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। अरावली की चट्टानें टूटी-फूटी और
दरारों वाली हैं जिसकी वजह से बारिश का पानी सीधे नीचे चला जाता है, बोरवेल, कुएँ
और एक्विफर भरते हैं। यही वजह है कि दिल्ली-एनसीआर और राजस्थान में पानी अब भी
पूरी तरह ख़त्म नहीं हुआ। एक अनुमान के अनुसार यहाँ प्रति हेक्टेयर लगभग 20
लाख लीटर पानी पुनर्भरित होता है।
भूगोलविद् सीमा जालान बताती हैं कि
अरावली पर्वतमाला नहीं होतीं तो उत्तर भारत की जाने कितनी नदियाँ नहीं होतीं, जाने
कितने जंगल, कितनी
वनस्पतियाँ, कितने
बहुमूल्य धातु और कितने इकोलॉजिकल वैभव नहीं होते।
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट से
जुड़ी हुई पर्यावरणविद् अनुमिता चौधरी बताती हैं कि अरावली पर्वतमाला न केवल हमें
रेगिस्तानी धूल से बचाती है, बल्कि प्रदूषण को रोकने और हवा के विषाक्त उत्सर्जन को अवशोषित
करने के लिए आवश्यक हरित आवरण भी प्रदान करती है।
बड़े आश्चर्य की बात है कि करोड़ों
साल पुराने एक सम्पूर्ण पारिस्थितिकीय तंत्र को एक 'तथाकथित
एक्सपर्ट कमेटी' ने सिर्फ़ एक 'ऊँचाई' से
परिभाषित कर दिया! यह पारिस्थितिकी और
पर्यावरण को लेकर वर्तमान केंद्र सरकार की मंशा और चालाकी ही नहीं, हम
सबके पागलपन और वैज्ञानिक नासमझी को भी दर्शाती है।
सतत खनन की ज़िद चाहिए या
अरावली? जो नियम हत्यारा सरीखा था उसे विस्तृत रूप से
अधिकृत क्यों किया गया?
हर कोई जानता है कि मोदी सरकार हो या
इससे पहले की सरकारें हो, पर्यावरण या प्रकृति को बचाने के नाम पर कुछ अच्छा किया गया हो
ऐसे मामले मैग्नीफायर ग्लास से ढूँढने पर ही मिलते हैं। जंगल, नदी, पर्वत, पेड़, अलग
अलग जीव, सभी
को हम धार्मिक रूप से पूजते हैं, लेकिन इतिहास गवाह है कि हमने जिन जिनको पूजा, उन
सबकी भद्द भी हमींने पीटी है!
गँगा, यमुना, किसी का पानी पीने तो क्या नाहने लायक
नहीं है!
गुजरात के गीर को देख लीजिए। 15-20 साल पहले गीर का
पूरा प्रकृति तंत्र अलग था, आज वह घूमने की जगह बनकर रह गया है। लेह, लद्दाख, हिमालय, हमने
हर उस चीज़ का नाश कर दिया है, जो इस देश की सबसे बड़ी संपदा थी!
अरावली पहाड़ी जिन प्रमुख शहरों से होकर
गुज़र रही है, वहाँ
इसका सबसे ज़्यादा दोहन हुआ है। दिल्ली, गुड़गाँव, फरीदाबाद में प्रॉपर्टी डीलरों ने प्लॉट
काट कर बेच दिया है, वहाँ विशालकाय अपार्टमेंट खड़े हो गए हैं!
फरीदाबाद और गुड़गाँव में अरावली के जंगल पूरी तरह ख़त्म कर दिए गए हैं!
फरीदाबाद-गुड़गाँव में कईं नेताओं के फार्म हाउस भी हैं!
यही स्थिति राजस्थान में है! यूँ कहे कि भारत के लगभग सभी राज्यों
में यही स्थिति है!
एम सी मेहता (1985) और
गोदावरम (1995)
जैसे
फ़ैसलों और सुप्रीम कोर्ट की कथित कड़ी निगरानी के बावजूद सरकारों ने पर्यावरण
डिजास्टर करना बंद नहीं किया है! 2018
में सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाई गई एक कमेटी ने पाया कि अवैध खनन की वजह से राजस्थान
स्थित 128
अरावली पहाड़ियों में से 31 गायब हो चुकी हैं और पहाड़ियों के बीच 10
से अधिक बड़े-बड़े गैप बन चुके हैं!
ख़ास बात यह है कि राजस्थान वह राज्य है
जिसने अरावली की परिभाषा के लिए यही 100 मीटर वाला मानक
स्वीकार कर रखा था! फिर यही मानक पूरे अरावली के लिए
स्वीकार कर लिया गया! सुप्रीम कोर्ट द्वारा इसको सहमति देना
अरावली की हत्या की स्वीकृति समान माना गया। विरोध की आँधी उठी तो दोबारा सोचने के
लिए फ़ैसले पर स्टे लगा दिया गया!
ऑस्ट्रेलिया की ग्रेट बैरियर रीफ का
उदाहरण देखना चाहिए। किस तरह ऑस्ट्रेलिया की सरकार ने एकजुट होकर इसे बचाने की
मुहिम चलाई। कितना भी आर्थिक नुक़सान हो, उन्होंने इस क्षेत्र में लगभग सभी कोयला
खदानों पर प्रतिबंध लगा दिया, और किसी भी नए खनन की अनुमति नहीं दी गई। गौतम अडानी की कोयला
खदान को भी बंद कर दिया गया था। रीफ में सभी को सुरक्षा प्रदान की गई, सिर्फ़
ऊँचाई वाले इलाक़ों को नहीं। ग्रेट बैरियर रीफ को एक पारिस्थिकीय तंत्र के रूप में
समझा गया जिसमें पेड़, पौधों, जानवरों, जल-निकायों आदि सभी को एक समझकर संरक्षित किया गया।
बिलकुल सीधी बात है कि पर्यावरण और
विकास के बीच किसी भी टकराव के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट को पर्यावरण का साथ देना
चाहिए। स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार जीवन का अधिकार है, जिसे
संविधान हर हालत में नागरिकों को देने के लिए बाध्य है।
अवैध खनन रोकने के नाम पर लगभग 91%
अरावली को नकार देना, उसे ऐसी सरकार के हवाले कर देना जो लोककल्याण का मतलब ही भूल
चुकी है, जिसे
पर्यावरण और नागरिकों दोनों से ऊपर सिर्फ़ आर्थिक लाभ दिखाई पड़ रहा है, एक
भयावह विचार है।
अरावली के 91-92%
हिस्से को खनन के लिए खोल देने से क्या विनियमित खनन संभव होगा? क्या
सरकार इस पर नियंत्रण रख पायेगी? इससे भी बड़ा सवाल है कि क्या वह रखना चाहेगी? यदि
सरकार नियंत्रण खो बैठी तो क्या सुप्रीम कोर्ट अरावली को फिर से रिस्टोर कर पाएगा? वो
200
करोड़ साल पुरानी अरावली है, 75 साल पहले बने
संविधान का अनुच्छेद नहीं जिसे बिगड़ जाने पर संशोधित किया जा सकेगा।
भूविज्ञान
की भाषा में अरावली प्रोटेरोज़ोइक और उससे जुड़े युगों के लंबे घटनाक्रम से बनी, जब भारतीय प्लेट और
प्राचीन क्रस्ट-खंडों ने टकराव, रिफ्टिंग, अवसादन और रूपांतरण के चक्र झेले। इस प्रक्रिया को कई स्रोत 'अरावली-डेल्ही ऑर्गेनिक
बेल्ट' के रूप में रेखांकित करते
हैं। एक ऐसा भू-खंड, जो महाद्वीपीय टुकड़ों की टक्कर और धीरे-धीरे हुए पर्वत-निर्माण के
परिणामस्वरूप उभरा।
यह
बताता है कि अरावली की चट्टानें और उनके भीतर की दरारें; एक ऐसे भू-तंत्र का
हिस्सा हैं, जिसे बनना जितना कठिन था, टूटना उतना ही आसान हो सकता है; क्योंकि टूटने के लिए
विस्फोट नहीं चाहिए- बस लगातार खनन, कटिंग, सड़कें, और कंक्रीट।
आधुनिक
विकास की अँधी ज़िद के चलते अरावली के किस हिस्से को पहाड़ी माना जाए या नहीं माना
जाए इस हद तक हम गिर चुके हैं! सनक धारण कर ली है हमने। पहाड़ की परिभाषा बदल देंगे! कुछ न हुआ तो अरावली का
नाम ही बदल देंगे। नाम बदलने का फ़ैशन तो चल ही रहा है। बुलडोज़र कल्चर को पसंद
करते करते हमें पता ही नहीं चला कि हमारी सबसे पुरानी और अति महत्वपूर्ण विरासत पर
भी बुलडोज़र जाएगा।
अरावली
की मौत हुई तो न सरकार की माफ़ी से काम चलेगा, ना कोर्ट से आई फटकार से
और न ही सबसे बड़ी संविधान पीठ के निर्माण से। आख़िरकार अरावली विवाद सिर्फ़ मीटर, नक्शे या माइनिंग लीज के
बारे में नहीं है। यह मूल रुप से इस बारे में है कि क्या भारत अपनी इकोलॉजिकल
विरासत को ईमानदारी, विनम्रता, दूरदर्शिता और संयम के साथ संभाल सकता है।
(इनसाइड इंडिया, एम
वाला)















