गौरव, अभिमान या सनक की गोलाकार भुलभुलैया के ज़रिए पहलगाम आतंकी हमला ही नहीं, उड़ी, पुलवामा या पठानकोट
आतंकी हमले से जुड़े सवाल, ज़िम्मेदारी और जवाबदेही से सरकार बच निकली है। ज़रूरी सवालों को उठाना, चुनी हुई सरकार को
उसका दायित्व याद दिलाना, इन लोकतांत्रिक परंपराओं को आपराधिक कृत्य के रूप में प्रचारित करने वाली सरकार
अब इस परंपरा को देशद्रोह घोषित करने पर तुली है!
अगर यह सब देशद्रोह है, तो फिर मोदी, शाह समेत तमाम बीजेपी-आरएसएस के लोग, पहले यह क्यों कर चुके हैं? और आज भी जहाँ ग़ैरबीजेपी
सरकारें हैं वहाँ वे ऐसा देशद्रोह क्यों कर रहे हैं? मुंबई हमले पर मनमोहन
सरकार को घेरकर बीजेपी ने देशद्रोह क्यों किया था? दरअसल सत्ता देश की
जनता को गुमराह कर रही है। वह सिर्फ़ वोटर चाहती है, नागरिक नहीं!
आज केंद्र की बीजेपी
सरकार और उसके कार्यकर्ता उन लोगों को निशाना बना रहे हैं, जो पहलगाम हमले में
सुरक्षा-व्यवस्था पर सवाल उठा रहे हैं। यहाँ तक कि ऐसे लोगों के ख़िलाफ़ राष्ट्रद्रोह
और सामाजिक वैमनस्य फैलाने जैसे गंभीर आरोपों में एफ़आईआर दर्ज़ की जा रही हैं!
पहलगाम आतंकी हमले
में सुरक्षा में चूक को लेकर, ख़ुफ़िया संस्थाओं की नाकामी, गृह मंत्री की ज़िम्मेदारी या केंद्र सरकार की जवाबदेही को लेकर तीख़े सवाल पूछना
देशद्रोह कैसे हो गया? इस मामले में पीएम मोदी की आलोचना करना देशद्रोह कैसे हो गया?
वे ख़ुद को भले ही
नॉन बायोलॉजिकल मानते हो, लेकिन वे है नहीं। भारत के भीतर आतंकी हमला हुआ है, तो जनता मोदीजी की
ही तो आलोचना करेगी, उनसे ही सवाल पूछेगी, युगान्डा की सरकार से थोड़ी न पूछेगी? ऐसा थोड़ी न होगा कि पहलगाम आतंकी हमले के बाद देश नेहरूजी से सवाल पूछे? सवाल तो मोदीजी से
ही पूछे जाएँगे न? आलोचना उनकी ही होगी न? ज़िम्मेदार और जवाबदेह वही तो हैं।
सवाल
पूछने पर इस तरह की सज़ा, आलोचना
करने पर ऐसी कार्रवाई, क्या
मोदी सत्ता दमन के प्रदर्शन को शान समझती है?
जब बतौर गुजरात के
मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने, या विपक्ष में रहते हुए बीजेपी या आरएसएस ने, तत्कालीन सत्ता से सवाल पूछे, उसकी आलोचना की, तो किसी भी सरकार
ने उनके साथ ऐसा दमन नहीं किया था, जैसा आज वे दूसरों के साथ कर रहे हैं।
तत्कालीन सरकारों से
तीख़े सवाल पूछना, उन्हें उनकी ज़िम्मेदारी या जवाबदेही से अवगत कराना, उनकी आलोचना करना, इन कामों से पूर्व
सरकार ने बीजेपी, मोदी या आरएसएस को कभी ऐसे नहीं रोका था, जैसे आज वे दूसरों
को रोक रहे हैं।
आज केंद्र की बीजेपी
सरकार और उसके कार्यकर्ता उन लोगों को निशाना बना रहे हैं, जो पहलगाम हमले में
सुरक्षा-व्यवस्था पर सवाल उठा रहे हैं। यहाँ तक कि ऐसे लोगों के ख़िलाफ़ राष्ट्रद्रोह
और सामाजिक वैमनस्य फैलाने जैसे गंभीर आरोपों में एफ़आईआर दर्ज़ की जा रही हैं!
नेहा
सिंह राठौर के ख़िलाफ़ की गई कार्रवाई
नेहा सिंह राठौर, मशहूर भोजपुरी लोकगायिका, जो सामाजिक मुद्दों
पर अपने गीतों से जानी जाती हैं। पहलगाम हमले के बाद उन्होंने एक वीडियो में पीएम मोदी
पर निशाना साधते हुए कहा कि हमले का इस्तेमाल बिहार चुनाव में राजनीतिक लाभ के लिए
हो सकता है। बस, उनकी इस टिप्पणी से 'भावनाएँ आहत' हो गईं, और लखनऊ के हज़रतगंज़ थाने में उनके ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज़ कर दी गई। उन पर राष्ट्रद्रोह, सामाजिक वैमनस्य, और राष्ट्रीय अखंडता
को नुकसान पहुँचाने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए।
डॉ.
माद्री काटुटी (डॉ. मेडुसा) के विरुद्ध की गई कार्रवाई
डॉ. माद्री काटुटी
(डॉ. मेडुसा), जो लखनऊ विश्वविद्यालय की असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं, अपने व्यंग्यात्मक
सोशल मीडिया पोस्ट के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने पहलगाम हमले के बाद कहा, "धर्म पूछकर गोली मारना
आतंकवाद है, लेकिन धर्म पूछकर लिंच करना, नौकरी से निकालना, मकान न देना, बुलडोज़र चलाना भी आतंकवाद है।" डॉ. मेडुसा के बयान के ख़िलाफ़ बीजेपी से
जुड़े छात्र संगठन एबीवीपी ने विश्वविद्यालय में धरना दिया और हसनगंज़ थाने में उनके
ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज़ कराई गई। विश्वविद्यालय ने भी उन्हें नोटिस जारी किया।
अशोका
यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर का मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचा
अशोका यूनिवर्सिटी
के प्रोफ़ेसर अली ख़ान महमूदाबाद ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में कर्नल सोफ़िया कुरैशी
की तारीफ़ को लेकर ख़ुशी जताते हुए संभवित खोखले राष्ट्रवाद पर भी तंज़ कसा और मॉब
लिंचिंग, बुलडोज़र कार्रवाईयाँ और नफ़रत की राजनीति पर संयमित टिप्पणी की। एक दूसरे पोस्ट
में भारत की विविधता की तारीफ़ करते हुए उन्होंने एकजुटता के नज़रिए को हक़ीक़त में
बदलने की वक़ालत की और पाखंड को त्यागने की अपील की। एक फ़ेसबुक पोस्ट में उन्होंने
आम लोगों पर युद्ध के प्रभाव की बात की, जिसके आधार पर उनके ख़िलाफ़ शिकायत हुई, अति गंभीर धाराएँ लगीं और उन्हें गिरफ़्तार किया गया। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा, जहाँ उन्हें अंतरिम
ज़मानत मिल गई।
सरकार
की आलोचना करने वाली 19 वर्षीय
इंजीनियरिंग छात्रा गिरफ़्तार, कोर्ट
ने सरकार को फटकारा, रिहाई
का आदेश
पुणे के सिंहगढ़ अकादमी
ऑफ़ इंजीनियरिंग की एक छात्रा को इसलिए गिरफ़्तार कर लिया गया, क्योंकि उसने ऑपरेशन
सिंदूर के मुद्दे पर एक आलोचनात्मक पोस्ट को शेयर किया था। इतना ही नहीं, उसे उसकी कॉलेज से
निष्कासित तक कर दिया गया। छात्रा अदालत पहुँची। बॉम्बे हाईकोर्ट ने छात्रा की गिरफ़्तारी
को लेकर महाराष्ट्र सरकार की कड़ी आलोचना की और उसे फौरन रिहा करने का आदेश दिया, साथ ही कॉलेज निष्कासन
को मनमाना बताया।
द वायर
के वेबसाइट को ब्लॉक करने का मामला
द वायर, जो एक न्यूज़ वेबसाइट
है, जो पहलगाम आतंकी हमले
और उसके बाद उत्पन्न हुई स्थितियों को लेकर अपने रिपोर्ट्स में कथित रूप से सरकार की
आलोचना कर रहा था, को कुछ घंटों का आंशिक ब्लॉक झेलना पड़ा। हालाँकि यह कथित ब्लॉक आंशिक था, साथ ही महज़ कुछ घंटों
तक रहा। इसके बारे में अपने पाठकों को सूचित करते हुए द वायर ने लिखा था, "भारत सरकार ने दवायर.इन
वेबसाइट को देशभर में ब्लॉक कर दिया है। इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स का कहना है कि
यह कार्रवाई सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के तहत इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के आदेश के अनुसार की गई
है।"
यूट्यूब
न्यूज़ चैनल 4 पीएम
को ब्लॉक किया गया
इन्हीं दिनों आतंकी
हमले को लेकर आलोचनात्मक रिपोर्टींग कर रही यूट्यूब न्यूज़ चैनल 4 पीएम को ब्लॉक कर
दिया गया। इसके लिए राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला दिया गया। चैनल के मालिक और प्रधान
संपादक संजय शर्मा ने कहा कि उन्हें यूट्यूब से एक ई-मेल मिला, जिसमें सरकार के निर्देशानुसार
चैनल को बंद करने के बारे में बताया गया था। शर्मा ने कहा कि वे राष्ट्रीय सुरक्षा
को लेकर सरकार से सवाल पूछ रहे थे। मामला चैनल के कुछ वीडियो के अति तीख़े और अति आलोचनात्मक
शीर्षक का माना गया, जो पीएम मोदी और गृह मंत्री अमित शाह से संबंधित थे।
सवालों
और आलोचनाओं के दमन की कुछ दूसरी कहानियाँ, कुछ
जायज़ मामलों की आड़ में अनेक ज़रूरी सवालों को कुचलने की कोशिश?
इन दिनों अनेक ऐसे
मामले हुए, जिसमें किसी नागरिक ने पहलगाम आतंकी हमला, ऑपरेशन सिंदूर, सीज़फायर को लेकर सरकार की आलोचना की तो सरकारी विभाग ने उन नागरिकों के ख़िलाफ़
एफ़आईआर कर दी, पकड़ कर जेल भेज दिया! प्रिंट मीडिया और स्वतंत्र यूट्यूब न्यूज़
चैनल या पत्रकारों पर सरकार की आलोचना के चलते क़ानूनी सिकंजा भी कसा गया इन दिनों!
इन दिनों अनेक ऐसी
गिरफ़्तारियों या कार्रवाईयों के बारे में मीडिया रिपोर्ट प्रकाशित हुए। स्पष्ट रूप
से देखा गया कि पीएम मोदी, उनकी सरकार या उनकी पार्टी की आलोचना करने वाली सोशल मीडिया पोस्टों के लिए भाजपा
शासित कई राज्यों में पुलिस शिकायतों और गिरफ़्तारियों की एक लंबी सूची तैयार की गई, मानो सवालों और आलोचनाओं
का दमन करना का ठोस प्रयास हो।
द वायर ने रिपोर्ट
किया कि सुदूर त्रिपुरा में एक पुलिस अधिकारी ने द हिंदू को बताया कि यह (शिकायत दर्ज़
करना और गिरफ़्तार करना) केंद्र सरकार के निर्देश पर था कि उन्होंने पहलगाम घटना की
किसी भी आलोचना के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने के लिए नागरिकों के सोशल मीडिया खातों की
छानबीन शुरू कर दी है।
इस रिपोर्ट में दर्ज
था कि सरकार के इस दमन का शिकार एक सेवानिवृत्त स्कूल शिक्षक भी था, जिसे पहलगाम में हमले
के लिए ज़िम्मेदार सुरक्षा और ख़ुफ़िया एजेंसियों की चूक पर सवाल उठाने के आरोप में
गिरफ़्तार किया गया था। बाद में एक स्थानीय अदालत ने उसे ज़मानत दे दी।
पोस्ट करने पर ही नहीं बल्कि आलोचनात्मक पोस्ट का समर्थन करने पर भी दमन का डंडा
चलता दिखा! जैसे कि उपरोक्त मामले में उस सोशल मीडिया पोस्ट का समर्थन
करने के लिए गिरफ़्तार किए गए एक अन्य सेवानिवृत्त स्कूल शिक्षक को भी जेल भेज दिया
गया था!
असम में एक महिला पत्रकार
की गिरफ़्तारी हुई थी। महिला पत्रकार, दोधिसी डिम्पल ने फ़ेसबुक पोस्ट की थी, जब उन्होंने एक समाचार रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया व्यक्त की थी, जिसमें पश्चिम बंगाल
के एक पर्यटक की टिप्पणी को प्रमुखता से दिखाया गया था, जो आतंकवादी घटना
के बाद कश्मीर से लौटा था।
द वायर रिपोर्ट की
माने तो, आनंद बाज़ार पत्रिका की रिपोर्ट के अनुसार उस पर्यटक ने आरोप लगाया था कि यह एक
'सुनियोजित हमला' था, क्योंकि उसने कश्मीर
में हर 20 मीटर पर भारी सुरक्षा व्यवस्था देखी थी, लेकिन आतंकवादी हमले के स्थल बैसरन में ऐसा नहीं था। उस रिपोर्ट पर प्रकाश डालते
हुए डिंपल ने भी इसे एक 'पूर्व नियोजित हमला' कहा। हालाँकि पत्रकार ने इसे अंत में राजनीतिक और चुनावी कोण भी दिया। महिला पत्रकार
ने बाद में अपनी उस फ़ेसबुक पोस्ट को डिलीट कर दिया था। लेकिन फिर भी असम पुलिस ने
ज़ल्द ही उनके पोस्ट को 'देशद्रोही' क़रार देते हुए शिकंजा कसा और जेल भेज दिया।
कुछ राज्यों में महिला
और पुरुष पत्रकारों के ख़िलाफ़ कार्रवाई होती देखी गई, जो सत्ता की आलोचना
कर रहे थे या सत्ता के समर्थक मीडिया पर सवाल उठा रहे थे।
बीबीसी हिंदी और द
वायर समेत कई जगहों पर रिपोर्ट आए, जिसमें अनेक राज्यों में इस संबंध में सैकड़ों एफ़आईआर की गईं, गिरफ़्तारियाँ हुईं।
गुजरात, उत्तर प्रदेश, असम, जम्मू कश्मीर, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, मेघालय, कर्नाटक, समेत कईं राज्यों में लोगों के ख़िलाफ़ अलग अलग धाराएँ लगाकर मामले दर्ज़ किए
गए।
स्वाभाविक है कि इनमें
से कई कार्रवाई क़ानूनी ढंग से सही होगी। बल्कि ऐसी अनेक कार्रवाईयाँ थीं जो निसंदेह
जायज़ थी। निसंदेह कई आपत्तिजनक पोस्ट थीं, और उनके ख़िलाफ़ कदम
उठाए गए थे। लेकिन इस बीच अनेक ऐसी पोस्ट, जिनमें जायज़ सवाल थे, आलोचना थी, उन पर भी डंडा चलाया
गया। संभवत: इसलिए ताकि दूसरे हज़ारों लाखों सवालों का दमन किया
जा सके।
राष्ट्रदोह, देशद्रोह, देश की सुरक्षा के लिए ख़तरा, देश की एकता और अखंडता को हानि, सामाजिक वैमनस्य और नफ़रत फैलाने की कोशिश, के आरोप में निसंदेह अनेक ऐसी कार्रवाईयाँ की गईं, जिसमें अलग अलग अदालतों ने पीड़ितों को तत्काल रिहा करने के
आदेश देने पड़े, कहीं प्रशासन या राज्य सरकारों को फटकार लगानी पड़ी।
हर ऐसी घटना के समय
विपक्षी पार्टियाँ सत्ता की आलोचना करती है, उसके ख़िलाफ़ माहौल बनाती है, उसे सवालों में उलझाती है। दरअसल यह एक तरीक़े से लोकतंत्र की बुनियाद भी है।
अब तक बीजेपी, आरएसएस, मोदी या शाह ने बतौर विपक्ष ऐसा ही तो किया था।
कई मामलों में कोई
मीडिया, कोई चैनल, कोई पत्रकार, कोई व्यक्ति, आदि लोग किसी पूर्वाग्रह के चलते भी सत्ता या सत्ता पर बिराजमान मंत्री या प्रधानमंत्री
की आलोचना करते हैं, तीख़ी टिप्पणियाँ करते हैं। यह दशकों पुराना है और इससे तमाम सरकारें अपने अपने
ढंग से, बिना विवाद के, निपट लेती है।
सवालों, आलोचनाओं से भागना
राजनीति की ज़रूरत होती होगी। लेकिन सवालों और आलोचनाओं का निर्ममता के साथ दमन करना
किसी दूसरी विवादित शैली का प्रदर्शन है।
लेकिन
दूसरी तरफ़ अनेक लोगों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई, जैसे
कि...
ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने पहलगाम हमले पर सवाल उठाते हुए पीएम मोदी की आलोचना की। गोवर्धनमठ पुरी
के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद ने तो कुछ महीने पहले पीएम मोदी को 'आतंकवाद का पक्षधर' तक कह डाला था! बीजेपी सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी अनेक बार पीएम मोदी के बारे में गंभीर
बातें और संगीन आरोप लगाते हुए आपत्तिजनक टिप्पणियाँ कर चुके हैं।
जम्मू कश्मीर के पूर्व
राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने मीडिया साक्षात्कार में कहा था कि उन्होंने पुलवामा आतंकी
हमले के बाद पीएम मोदी को हमले की साज़िश के बारे में बताना चाहा, लेकिन उन्हें चुप
रहने के लिए कहा गया था!
ऑपरेशन सिंदूर के तुरंत
बाद भारत सरकार ने देश को सैन्य कार्रवाई की जानकारी प्रदान करने की ज़िम्मेदारी जिन्हें
दी, उनमें एक कर्नल सोफ़िया
कुरैशी थीं, जिन्होंने बेहद शानदार तरीक़े से भारतीय सेना और उसकी धर्मनिरपेक्षता को दुनिया
के सामने पेश किया और पाकिस्तान के दुष्प्रचार को नाकाम किया। इन्हें मध्य प्रदेश बीजेपी
सरकार के परिवहन और स्कूल शिक्षा मंत्री विजय शाह ने 'आतंकियों की बहन' कहा, और उन्हें प्रेस वार्ता
में भेजना मोदीजी की विजयी नीति बताया!
पहलगाम आतंकी हमले
के तुरंत बाद बीजेपी सांसद रामचंद्र जांगड़ा ने कह दिया था कि हमले में अपने
पतियों को खोने वाली महिलाओं में वीरांगना का भाव और जोश नहीं था, जिसके कारण 26 लोग आतंकियों की गोली
का शिकार बने, यदि ये महिलाएँ आतंकियों का मुक़ाबला करतीं और प्रधानमंत्री की योजना के तहत प्रशिक्षण
लेतीं, तो इतनी मौतें नहीं होतीं। सीज़फायर के क़रीब एक सप्ताह बाद मध्य प्रदेश के
डिप्टी सीएम जगदीश देवड़ा ने कहा था कि प्रधानमंत्री का शुक्रिया अदा करना चाहिए, पूरा देश, देश की वो सेना, वे सैनिक... उनके
चरणों में नतमस्तक हैं।
पहलगाम आतंकी हमले
में अपने पति (भारतीय नौसेना के लेफ़्टिनेंट) विनय नरवाल को सदा के लिए खोने वाली हिमांशी
नरवाल ने जब अपने पति को न्याय के लिए जाँच की बात की तथा शांति का समर्थन किया उन्हें
अपमानजनक तरीक़े से ट्रोल किया गया! ट्रंप द्वारा किए
गए सीज़फायर के एलान और व्यापार, टैरिफ़, सौदे का कॉकटेल, इसके बाद विदेश सचिव विक्रम मिस्री को ख़राब ढंग से ट्रोल किया गया, उनकी बेटी तक के बारे
में अपमानजनक टिप्पणियाँ की गईं!
रिपोर्टींग में सत्ता
से सवाल, सत्ता की आलोचना या फिर छोटी मोटी ग़लती को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ कर इन दिनों
कईयों पर कार्रवाईयाँ की गईँ! इनमें स्वतंत्र यूट्यूब न्यूज़ चैनल और स्वतंत्र
पत्रकार भी शामिल थे। दूसरी तरफ़ मेनस्ट्रीम मीडिया बेरोकटोक फ़ेक न्यूज़, झूठे दावे, देश के सामने प्रसारित
करता रहा! जी न्यूज़ और न्यूज़ 18 के ख़िलाफ़ ख़ुद जम्मू-कश्मीर
की एक अदालत को एफ़आईआर दर्ज़ करने का आदेश देना पड़ा था।
उपरोक्त तमाम मामलों
में हाथी के दाँत वैसे नहीं थे, जैसे सरकार से सवाल पूछने पर या उनकी आलोचना करने पर देखे गए थे। साफ़ है कि सरकार
चुनिंदा लोगों को निशाना बना रही थी। वे लोग, जो कमज़ोर हैं, जिनकी आवाज़ को आसानी से दबाया जा सकता है।
क्या
बीजेपी और मोदी की घोर चुनावजीवी शैली इन सवालों और आलोचनाओं का मुख्य कारक है?
जैसे कि हमने लिखा,
यक़ीनन इनमें से कई सवाल, कई आलोचनाएँ, किसी पूर्वाग्रह से प्रेरित हो सकती हैं। हो सकता है कि अनेक सवाल अपनी व्यक्तिगत
राजनीतिक पसंद-नापसंद के चलते भी उठे हो। आम लोग, न्यूज़ प्लेटफॉर्म या संस्थान, पत्रकार, सभी के मामलों में
ऐसा हुआ होगा इससे इनकार नहीं किया जा सकता। रही विपक्ष की बात, ऐसा होना बिलकुल स्वाभाविक
है और यह दशकों पुरानी परंपरा है, जो लोकतंत्र के लिए ज़रूरी भी है। तभी तो बीजेपी, आरएसएस, मोदी, आदि यह कर चुके हैं
या कर रहे हैं।
किंतु बीजेपी, आरएसएस और विशेष रूप
से नरेंद्र मोदी की 'घोर चुनाववीजी शैली' इस मामले में प्रमुख कारक है इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता। दरअसल, दिखाई यह दे रहा है
कि राष्ट्रीय सुरक्षा, पाकिस्तान, आतंकवाद, चीन जैसे मसलों पर बीजेपी और आरएसएस की, विशेष रूप से नरेंद्र मोदी की 'घोर चुनावजीवी शैली' के चलते ही इन्हें तीख़े सवालों और कठोर आलोचनाओं का सामना कर पड़ रहा है।
इसी बीजेपी ने मुंबई
हमले के महज़ दूसरे दिन, 29 नवंबर को, जब मुंबई में आतंकवादियों के ख़िलाफ़ भारतीय सेना और एनएसजी का ऑपरेशन जारी था, जब देश सेना और सुरक्षा
बलों के लिए प्रार्थना कर रहा था, तब अख़बारों में चुनावी विज्ञापन दिया था! कहा था कि सरकार कमज़ोर है, भाजपा को वोट दें। पुलवामा हमला, 2019 लोकसभा चुनाव प्रचार के दिन। हमले की ख़बर मिलते ही कांग्रेस समेत तमाम दलों ने
अपने चुनावी कार्यक्रम रद्द किए थे, वह देश के प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह ही थे, जिन्होंने इसके बाद
भी उसी दिन चुनावी रैली की थी!
वह द्दश्य भी ताज़ा
हैं जब गुजरात समेत अनेक राज्यों में बीजेपी नेताओं ने पुलवामा, पाकिस्तान और देश
के आक्रोश का चुनावी उपयोग करने की विवादास्पद प्रवृत्ति की थी। कैसे भुलाया जा सकता
है कि जम्मू कश्मीर के पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने एक मीडिया साक्षात्कार में कहा
था कि उन्होंने पुलवामा आतंकी हमले के बाद पीएम मोदी को हमले की साज़िश के बारे में
बताना चाहा, लेकिन उन्हें चुप रहने के लिए कहा गया था!
तत्कालीन सरकार से
सवाल पूछना या एक नागरिक के रूप में उसकी आलोचना करना, या ज्वलंत मुद्दों
पर निर्वाचित सरकार से जवाबदेही माँगना, एक 'राष्ट्र-विरोधी कृत्य' के रूप में सत्ता और उसकी मशीनरी के माध्यम से स्थापित किया जाए, तब यह विवाद बना जाता
है।
जिस प्रधानमंत्री ने चिल्ला कर यह आश्वासन दिया था कि अनुच्छेद 370 के निष्प्रभावी होने
से आतंकवाद जड़ से ख़त्म हो जाएगा और कश्मीर अब वैसा नहीं रहेगा, जिस प्रधानमंत्री
ने नोटबंदी से आतकंवाद के ख़ात्मे का बेतुका और हास्यास्पद दावा किया था, जिसने 2014 में हुँकार भरी थी
कि अब पाकिस्तान भारत की तरफ़ देखने की हिम्मत भी नहीं करेगा, उसीसे देश सवाल पूछेगा, उसीको उसकी जवाबदेही
और ज़िम्मेदारी से अवगत कराएगा।
सवालों और आलोचनाओं से तमाम सरकारें बचती हैं, तमाम प्रधानमंत्री
किनारा करते हैं। किंतु उनका ऐसा 'पलायनवाद' सार्वजनिक रूप से
नज़र नहीं आता। तमाम सरकारें अपने आलोचकों को दबाने की कोशिश करती हैं, किंतु इन कोशिश में
वे अपना 'दमन' नज़र नहीं आने देतीं। मोदी सत्ता बिना शर्म के और निष्ठुर तरीक़े से अपना यह रूप
बारबार दिखाती है। शायद उसे इसमें अपनी शान नज़र आती है!
(इनसाइड इंडिया, एम वाला)













