जिन्होंने
देश के सबसे बड़े प्रतीक तिरंगे को अस्वीकार किया था, जिसने संविधान को नकारा
था, जिनका भारत के स्वतंत्रता
संग्राम में कोई योगदान नहीं है, जिस पर अब तक तीन बार प्रतिबंध लगा है, जिन पर अंग्रेज़ों के समय
से ही सत्ता और ताक़त के आगे झुकने के आरोप लगते हैं, वे देश के राष्ट्र गीत
वंदे मातरम् पर चर्चा कर कैसे सकते हैं!
जिनकी
मातृ पितृ संस्था की शाखा में वंदे मातरम् गाया नहीं जाता, जिसने स्वतंत्रता के बाद
सालों तक तिरंगे को फहराया तक नहीं था, वे देश की लोकसभा के भीतर देश के राष्ट्र गीत पर चर्चा करते हैं! वो भी अपने झूठे और
निहायत तथ्यहीन दावों के साथ! बेशर्मी के अनंत व्याप के धनी!
जितने
घंटे वंदे मातरम् पर संसद में चर्चा हुई, आरएसएस का स्वतंत्रता संग्राम में उससे भी कम घंटे का योगदान है।
और शायद इसी वजह से वे यह भूल गए कि राष्ट्रीय प्रतीकों पर अधिकृत चर्चा में
ऐतिहासिक तथ्यों को शामिल किया जाता है, ना कि अपनी मान्यता या विचारधारा को।
जनता
महंगाई से त्राहिमाम है, बेरोजगारी का स्तर रिकॉर्ड लेवल पर है, तमाम आर्थिक और सामाजिक
सूचकांकों में हम मुँह के बल गिरते जा रहे हैं, रुपया सबसे निचले स्तर पर
है, हज़ारों लोग देश के हवाई
अड्डों पर रोते बिलखते रहते हैं, एसआईआर का मामला सुलग रहा है, और इन्हें पहले वंदे मातरम् पर चर्चा करनी है! राजनीति की मैली गंगा।
वंदे मातरम् पर बीजेपी, आरएसएस
और नरेंद्र मोदी ने जो कुछ किया, वो निहायत तथ्यहीन, झूठे और अधूरे क्रियाकलापों के ज़रिए
अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने का एक भद्दा प्रयास था, और कुछ नहीं। बंगाल के चुनाव की अभी से
तैयारी!
वो भी लोकसभा में विशेष चर्चा आयोजित करने के नाम पर!
शायद ही इतना घोर चुनावजीवी नेतृत्व देश
ने देखा होगा। हो सकता है कि आने वाले सालों में स्कूलों के क्लास मॉनिटर भी
बीजेपी के हुआ करेंगे! कोविड19 के समय भी इन्होंने
दिखा दिया था कि चुनाव में ही बसी इनकी जान है।
दिवंगत पत्रकार गौरी लंकेश आरएसएस के
स्वयंसेवक नरेंद्र मोदी के बारे में अक़्सर 'बूसी बसिया' लिखा
करती थीं, जिसका
अर्थ है वो आदमी जब भी अपना मुँह खोलता है तो बस झूठ ही निकलता है। पिछले कुल
सालों से अब निर्विवाद है कि नरेंद्र मोदी अपुष्ट, संदिग्ध, झूठे, ग़ैरज़रूरी, आदि
बातों को आधिकारिक ढंग से कहने वाले देश के प्रथम प्रधानमंत्री हैं।
जिस प्रकार की अपुष्ट और संदिग्ध बातें
पहले मोदीजी रैलियों में कहा करते थे, उसे फिर वे मन की बात में करने लगे, फिर
राष्ट्र के नाम संबोधन वाली पुरानी परंपरा की भी भद्द पीट दी, अब
संसद में विशेष चर्चा के दौरान लोकसभा के भीतर बतौर देश के प्रधानमंत्री ऐसे
अपुष्ट और संदिग्ध भाषण बारबार करने लगे हैं!
देश का मेनस्ट्रीम मीडिया उनकी मुठ्ठी
में है। और इसी वजह से वे अपने तमाम निरर्थक क्रियाकलापों के समय भी बच कर निकल
जाते हैं। विश्लेषक बताते हैं कि अगर सिर्फ़ कुछ सप्ताह के लिए देश के मीडिया को
उस मुठ्ठी से आज़ाद कर लें तो चंद दिनों में सारे मिथक टूट जाएँगे। राहत इंदोरी
साहब के शब्दों में कहे तो, ये सब धुआँ है कोई आसमान थोड़ी है?
जिसे देश की संविधान सभा ने राष्ट्र गीत
के रूप में स्वीकृत किया है उस पर प्रधानमंत्री मोदी क्या चर्चा करना चाहते हैं? क्या
इससे कोई फ़र्क़ पड़ता है? आरएसएस और बीजेपी की अपनी चुनावी राजनीति के सिवा कौन सा
फ़र्क़ पड़ता है?
वंदे मातरम् पर मोदीजी, बीजेपी
और आरएसएस, ने
संसद में चर्चा के नाम पर जितने अपुष्ट और संदिग्ध दावे किए हैं, वो
सारे दावे तथ्यों और तर्कों के सामने एकाध मिनट भी ठहर नहीं सकते इतने कमज़ोर हैं।
मीडिया मुठ्ठी में नहीं होता तो चर्चा वंदे मातरम् पर नहीं बल्कि दावा करने वालों
की अज्ञानता और बेशर्मी पर होती।
वंदे
मातरम् पर संसद में प्रधानमंत्री मोदी ने क्या कहा?
8 दिसंबर 2025 के दिन संसद में
वंदे मातरम् पर विशेष चर्चा की शुरूआत पीएम मोदी ने की। उनके लंबे भाषण में मुख्य
आरोप यह था कि कांग्रेस ने वंदे मातरम् के टुकड़े किए और जिन्ना के दबाव में झुक
गए।
हालाँकि इन्हीं दिनों पीएम मोदी का तेल
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप निकालते जा रहे थे और संघ के स्वयंसेवक मोदी एक
के बाद एक तमाम मुद्दों पर डोनाल्ड ट्रंप के आगे झुकते जा रहे थे। इससे पहले
सरेंडर मोदी वाला नामकरण भी मोदी झेल चुके थे, जब दर्जनों बार ट्रंप ने दावा किया कि
उन्होंने टैरिफ़ और व्यापार की धमकी का इस्तेमाल कर पीएम मोदी को सीज़फायर सहमति
के लिए मजबूर किया।
झुकने की ही बात है तो इनकी मातृ पितृ
संस्था आरएसएस के ऊपर दशकों से तथ्यों और प्रमाणों के साथ कहा जाता है कि ये लोग
सदैव सत्ता और ताक़त के आगे झुकते आए हैं।
ख़ैर, पीएम मोदी ने इस दिन संसद में अपने भाषण
में कहा, "कांग्रेस
ने वंदे मातरम् के टुकड़े किए। कांग्रेस ने मुस्लिम लीग के दबाव में ये बदलाव किए
थे। इसी दबाव के चलते अंततः भारत और पाकिस्तान का विभाजन हुआ।"
पीएम मोदी ने कहा कि वंदे मातरम् के साथ
कांग्रेस ने विश्वासघात किया, राष्ट्रगीत का अपमान किया।
उन्होंने कहा, "नेहरू
ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस को लिखे एक पत्र में कहा था कि वंदे मातरम् मुसलमानों
को भड़का सकता है।" पीएम ने कहा, "कांग्रेस
पार्टी ने मुस्लिम लीग के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। कांग्रेस आज भी वंदे मातरम्
का अपमान करती है।"
इससे पहले प्रधानमंत्री ने 7
नवंबर को कहा था,
"1937 में वंदे मातरम् के महत्वपूर्ण छंद, जो
इसकी मूल भावना का सार हैं, हटा दिए गए। वंदे मातरम् के दोहे तोड़ दिए गए।"
8 दिसंबर के दिन पीएम मोदी ने सवाल किया
कि, "जब
बापू (महात्मा गाँधी) को वंदे मातरम् नेशनल एंथम के रूप में दिखता था तो इसके साथ
अन्याय क्यों हुआ?" उन्होंने
कहा,
"मोहम्मद
अली जिन्ना ने वंदे मातरम् के ख़िलाफ़ सवाला उठाया था और जवाहरलाल नेहरू ने वंदे
मातरम् की जाँच शुरू की थी।"
पीएम मोदी ने कहा, "वंदे
मातरम् को लेकर मुस्लिम लीग की विरोध की राजनीति तेज़ होती जा रही थी। मोहम्मद अली
जिन्ना ने लखनऊ से 15 अक्टूबर 1937
को वंदे मातरम् के ख़िलाफ़ नारा बुलंद किया। कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष
जवाहरलाल नेहरू को अपना सिंहासन डोलता दिखा, बजाय इसके कि मुस्लिम लीग के आधारहीन
दावों को वो क़रारा जवाब देते, इसके उलट उन्होंने वंदे मातरम् की ही पड़ताल शुरू कर दी।"
पीएम ने आगे कहा, "जिन्ना
के विरोध के पाँच दिन के बाद ही 20 अक्टूबर को नेहरूजी ने नेताजी सुभाष
बाबू को चिट्ठी लिखी। उस चिट्ठी में जिन्ना की भावना से नेहरूजी अपनी सहमति जताते
हुए कहते हैं कि वंदे मातरम् की आनंद मठ वाली पृष्ठभूमि मुसलमानों को उत्तेजित कर
सकती है। मैं नेहरूजी का वक्तव्य पढ़ता हूँ। नेहरू जी कहते हैं - मैंने वंदे
मातरम् गीत का बैकग्राउंड पढ़ा है। नेहरूजी फिर लिखते हैं - मुझे लगता है कि यह जो
बैकग्राउंड है उससे मुस्लिम भड़केंगे।"
पीएम मोदी ने कहा, "इसके
बाद कांग्रेस की तरफ़ से बयान आया कि 26 अक्टूबर को कांग्रेस
कार्य समिति की एक बैठक कोलकाता में होगी जिसमें वंदे मातरम् के उपयोग की समीक्षा
की जाएगी। पूरा देश हतप्रभ था। पूरे देश में देशभक्तों ने देश के कोने-कोने में
प्रभात फेरियाँ निकालीं।"
उन्होंने कहा, "वो
कौन सी ताक़त थी जिसकी इच्छा ख़ुद पूज्य बापू (महात्मा गाँधी) की भावनाओं पर भी
भारी पड़ गई? जिसने
वंदे मातरम् जैसी पवित्र भावना को भी विवादों में घसीट दिया।"
लोकसभा में पीएम ने कहा, "लेकिन
देश का दुर्भाग्य की 26 अक्टूबर को कांग्रेस ने वंदे मातरम् पर
समझौता कर लिया। वंदे मातरम् के टुकड़े कर दिए गए। उस फ़ैसले के पीछे नकाब ये पहना
गया कि यह तो सामाजिक सद्भाव का काम है। लेकिन इतिहास इस बात का गवाह है कि
कांग्रेस ने मुस्लिम लीग के आगे घुटने टेक दिए और मुस्लिम लीग के दबाव में यह
किया।"
पीएम मोदी, गृह मंत्री अमित
शाह, सरकार
के अन्य मंत्री, आरएसएस
का समाज में प्रचार, वंदे मातरम् पर इन सबके आरोप यही रहे कि वंदे मातरम् पर संसद
बहस करेगी तो राष्ट्र गीत के बारे में जागरूकता बढ़ाने में मदद होगी। तब तो अब तक
इसे शाखाओं में गाना चाहिए था, ताकि वहाँ भी जागरूकता बढ़े।
इनका एक आरोप यह भी रहा कि जवाहरलाल
नेहरू के समय में देवी-देवताओं को समर्पित कुछ पंक्तियों को वंदे मातरम् से हटा
दिया गया था। इसमें नया क्या है? यह सबको पता है। वह पंक्तियाँ क्यों हटाई गई थीं, किन
महानायकों ने किस मंथन के बाद हटाई थीं, इसकी भी तो बात होनी चाहिए।
वंदे मातरम् पर चर्चा नामक राजनीतिक
नौटंकी का हाल देखिए, बीजेपी सांसद गिरिराज सिंह ने कहा, "कुछ लोग वंदे मातरम्
पर विश्वास नहीं रखते, लेकिन बाबरी मस्जिद में विश्वास रखते हैं।" इन्होंने ममता
बनर्जी, बंगाल, हुमायूं
और कबीर तक के किरदारों का ज्ञान दिया।
सवाल वही कि वंदे मातरम् पर विश्वास की
बात कर रहे हैं तो इतने दशकों में इसे शाखाओं में गाना चाहिए था। इतना विश्वास तो
उन्हें भी राष्ट्र गीत पर होना चाहिए न?
जो
सरकार संसद में वंदे मातरम् पर चर्चा करा रही थी उसने सप्ताह भर पहले राज्यसभा में
वंदे मातरम् और जय हिंद बोलने पर प्रतिबंध लगाया था!
देश के सारे ज़रूरी और ज्वलंत मुद्दों
को छोड़ वंदे मातरम् पर चर्चा! पेपर लीक, बेरोजगारी, महंगाई, एसआईआर, वोट
चोरी, सुलगता
मणिपुर, विफल
विदेश नीति, पड़ोसी
देशों से ख़राब रिश्ते, अमेरिका की दादागीरी, सब बाद में, पहले
वंदे मातरम्! गंदी राजनीति की मुँह दिखाई!
लेकिन इससे भी बड़ी बेशर्मी यह कि जो
मोदी सरकार वंदे मातरम् पर संसद में चर्चा करा रही थी, उसी
मोदी सरकार ने इन्हीं दिनों एक आदेश पारित कर कहा था कि राज्यसभा में वंदे मातरम्
के नारे नहीं लगा सकते। सिर्फ़ वंदे मातरम् ही नहीं बल्कि जय हिंद के नारे पर भी
बैन लगाया गया था!
सोचिए, सरकार ने कहा कि राज्यसभा में वंदे
मातरम् के नारे नहीं लगा सकते। और यही सरकार वंदे मातरम् की शक्ति, पवित्रता, उसका
महान संदेश, स्वतंत्रता
लड़ाई में उसका योगदान, आदि पर क्रियाकलाप करती है!
वही सरकार जिसने राज्यसभा में इन नारों
के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने की अधिसूचना जारी की थी, कुछ
दिनों बाद वंदे मातरम् के महत्व के नाम पर विशेष चर्चा करती है तब यह हास्यास्पद
लगता है। जागरूकता बढ़ानी ही थी, तो फिर राज्यसभा में वंदे मातरम् के नारों को प्रतिंबंधित
क्यों किया?
एक तरफ़ कईं बीजेपी शासित राज्य सरकारें
स्कूलों, कॉलेजों
और शिक्षा संस्थाओं में वंदे मातरम् को गाना अनिवार्य करने का आदेश देती है, और
केंद्र की बीजेपी सरकार आदेश देती है कि राज्यसभा में वंदे मातरम् का नारा नहीं
लगाया जा सकता!
आरएसएस और बीजेपी के कथित राष्ट्रवादी
नेता और समर्थक गाहेबगाहे फेफड़े फाड़ते हैं कि इस देश में रहना है तो वंदे मातरम्
कहना होगा। वे कहते हैं कि जो वंदे मातरम् नहीं बोलता, वो
देशविरोधी है। तो फिर राज्यसभा में वंदे मातरम् के नारे पर प्रतिबंध लगाने वाले
क्या हुए?
लगे हाथ 1998 का वह इतिहास भी पता
होना चाहिए जब यूपी में बीजेपी की कल्याण सिंह सरकार ने वंदे मातरम् को स्कूलों
में अनिवार्य किया था, और तब इस फ़ैसले के लिए बेसिक शिक्षा राज्य मंत्री रवींद्र
शुक्ल को बीजेपी यूपी की सरकार से बर्खास्त किया गया था!
और इस बर्खास्तगी में तत्कालीन प्रधानमंत्री की महत्वपूर्ण भूमिका थी और उस समय
वाजपेयीजी प्रधानमंत्री थे!
वंदे
मातरम् के नाम पर मोदी सरकार, बीजेपी
आरएसएस की तथ्यहीन और तर्कहीन राजनीति, जबकि
राष्ट्र गीत के रूप में वंदे मातरम् का घटनाक्रम जगज़ाहिर है
वंदे मातरम् के नाम पर मोदी सरकार, बीजेपी
और आरएसएस का यह तथ्यहीन और तर्कहीन प्रयास शीर्ष पदों से छिछोरी राजनीति का
स्पष्ट प्रतिबिंब है। राष्ट्र गीत के रूप में वंदे मातरम् को लेकर जो भी घटनाक्रम
था, मतभेद
थे, राय
मशवरा थे, वह
सब बातें जगज़ाहिर हैं।
स्वतंत्रता के पश्चात तमाम व्यवस्थाओं, ढाँचों, आदि
को नये सिरे से खड़ा करने का वो जो समय था, उस वक़्त इस प्रकार की चीज़ें लगभग तमाम
में हुई थीं और यह अत्यंत स्वाभाविक प्रक्रिया थी। आज भी ख़ुद मोदी सरकार कोई छोटी
मोटी चीज़ लागू करती है उसमें भी यह सब होता है।
ऐसी बातों को बिना तर्क और बिना तथ्य के
लोकसभा में कहना, उस
पर 'विशेष चर्चा' आयोजित करना, चर्चा
करते समय इतिहास को आलू मटर की तरह छील देना, यह छिछोरी राजनीति का परिचय है। साथ ही
निहायत ग़ैरज़रूरी भी। देश का समय, देश की जनता का पैसा, फिज़ूल की राजनीति पर बर्बाद करने का
कृत्य।
वंदे मातरम् की जो तीन प्रचलित रचनाएँ
हैं, उन
रचनाओं के सृजन के समय की जो स्थितियाँ थीं, उन रचनाओं को जिस प्रांत और जिस
संस्कृति के आधार पर रचा गया था, वह सारे तथ्य सार्वजनिक हैं। और फिर उसे बतौर राष्ट्र गीत के
रूप में अपनाते समय उसमें जो भी पंक्तियाँ स्वीकार और अस्वीकार हुईं, वह
बातें भी सार्वजनिक हैं। वह कोई टॉप सीक्रेट जैसी बात नहीं है।
और ना ही उन घटनाक्रमों में, बातों
में या तथ्यों में कोई ऐसी बात दिखाई देती है, जो आपत्तिजनक हो, या
पक्षपाती हो। बेशर्म शीर्ष नेतृत्व को ज्ञान होना चाहिए था कि राष्ट्र गीत के उस
स्वरूप को देश की संविधान सभा ने स्वीकार किया था।
वंदे मातरम् के जिस स्वरूप को संविधान
सभा ने स्वीकार किया था, उस पर भारत के जिन महानायकों ने बहुत लंबा मंथन किया था, जिन
महापुरुषों ने अपने महान विवेक से निर्णय लिया था, वो तमाम घटनाक्रम, वह
सारे तथ्य, इन
सबको नज़रअंदाज़ करने की धूर्तता क्यों?
जिस संस्था पर तीन बार बैन लगा, जिसने
भारत के किसी राष्ट्रीय प्रतीक को सम्मान नहीं दिया, जिसने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेना
तो दूर उसमें भाग लेने से लोगों को रोका, वह और उसके लोग इतने निर्लज्ज क्यों है
कि वे अपनी बेतुकी, तर्कहीन और तथ्यहीन बातों को भारत के महानायकों, उनके
महान विवेक और एतिहासक मंथन को ख़ुद से छोटा समझे!
तमाम निष्पक्ष विश्लेषकों और प्रमाणिक
इतिहासकारों को पता है कि वंदे मातरम् के अपनाए गए स्वरूप में कुछ भी विजानजकारी
नहीं था, बल्कि
जो विभाजनकारी हो सकता था उसे लंबे मथन के बाद अस्वीकार किया गया था।
दरअसल, मोदीजी बीजेपी और आरएसएस के इस प्रयास
से ही विभाजनकारी नीति, नफ़रत की संस्कृति और घोर चुनावी राजनीति की बू आती है।
राष्ट्रीय
प्रतीकों पर अधिकृत चर्चा, इसमें
राजनीतिक कथानकों और ख़ास विचारधारा या मान्यताओं को लादने की जगह ऐतिहासिक तथ्यों
पर बात होनी चाहिए
जैसा कि हमने ऊपर चिन्हित किया, वंदे
मातरम् के जिस स्वरूप को बतौर राष्ट्र गीत संविधान सभा ने स्वीकृत किया, वह
घटनाक्रम सार्वजनिक है।
उसमें जिन पंक्तियों को स्वीकृत या
अस्वीकृत किया गया था, उसके पीछे जो वजहें थीं, संविधान सभा में शामिल उन महानायकों का
जो मंथन था, वह
सब सार्वजनिक है। सबको पता है कि विभाजनकारी हो सकने वाली चीज़ों को किनारे कर
उसके वर्तमान स्वरूप को स्वीकार किया गया था।
साथ ही यह भी सबको पता है कि आज जो लोग, यानी
आरएसएस और बीजेपी, वंदे
मातरम् पर चर्चा करा रहे हैं, उनका स्वतंत्रता संग्राम में तनिक भी योगदान नहीं था। देश के
सर्वोच्च राष्ट्रीय प्रतीक और देश के संविधान को सबसे पहले अस्वीकार करने वाले लोग
आरएसएस और जनसंघ से थे।
उन्हें कहाँ से ज्ञान होगा कि देश की
संविधान सभा द्वारा जिन राष्ट्रीय प्रतीकों को स्वीकृत किया गया है उस पर चर्चा
करने के लिए प्रमाणित और ठोस इतिहास के साथ बात करनी चाहिए। उन्हें कहाँ से पता
होगा कि ऐसी चर्चा में उनकी अपनी मान्यता या विचारधारा को जगह नहीं मिलेगी, बल्कि
ऐतिहासिक तथ्यों और तर्कों को स्थान होगा।
स्वतंत्रता से पहले, स्वतंत्रता
प्राप्ति के दौरान और उसके बाद, वंदे मातरम् से जुड़ा इतिहास देखा जाए तो मालूम यही पड़ता है
कि वंदे मातरम् को लेकर जो भी विभाजन है, वह कट्टरपंथी ताक़तों ने पैदा किया था।
इसमें आरएसएस और मुस्लिम लीग, दोनों बराबर के हिस्सेदार थे।
मुस्लिम लीग की वो जाने, हमारा
संप्रदाय हिंदू है इसलिए हम आरएसएस और दूसरे हिंदू संगठनों की बात करते हैं।
नागपुर में 27
सितंबर 1925
को आरएसएस की स्थापना हुई। 1930 में बंकिम चंद्र के
वंदे मातरम् की चर्चा देश भर में होने लगी थी। आरएसएस ने 1940
में दैनिक प्रार्थना के रूप में 'नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे' गीत
को अपनाया। यह 1940
में रचित संस्कृत भजन है, जो मातृभूमि को नमन करता है और राष्ट्र-भक्ति पर ज़ोर देता है।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के विवाद ही
आरएसएस को उजागर करने हैं तो फिर क्यों न जमकर उजागर किए जाए?
फिर तो बात आरएसएस से जुड़े उन ऐतिहासिक विवादों की भी आएगी, जिसका
ज़िक्र हज़ारों बार हो चुका है, जिसे आप यहाँ संक्षेप में पढ़ सकते हैं।
आरएसएस और भाजपा आज जिस राष्ट्रवाद की
बात करते हैं, उन्हें
ठोस जवाब देना चाहिए कि जब लाखों लोग अंग्रेज़ों से लड़ रहे थे, तब
उनके राजनीतिक पूर्वज कहाँ थे?
मोहन भागवत, नरेंद्र
मोदी, इन
सबको एक सवाल का ठोस जवाब देना चाहिए कि जब देश की आज़ादी की लड़ाई लाखों करोड़ों
लोग लड़ रहे थे, जब
अंग्रेज़ों भारत छोड़ो नारे के साथ सब निकल रहे थे, तब आरएसएस और उसके संगठन भारतीय लोगों
को अंग्रेज़ों की फ़ौज में भर्ती होने के लिए क्यों कह रहे थे?
उस समय अंग्रेज़ों के साथ खड़े होने के
लिए क्या मोदीजी लोकसभा में माफ़ी माँगेंगे? क्या मोहन भागवत अपने पूर्वजों के इन
कृत्यों के लिए पूरे देश से माफ़ी माँगेंगे? क्या वे उन स्वतंत्रता सेनानियों पर
हमला करने के लिए माफ़ी माँगेगे, जो अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ सड़क पर उतरे थे? (हमले का संदर्भ - 1 मई 1937 के दिन मई दिवस का
जुलूस लेकर जा रहे क्रांतिकारियों पर आरएसएस के स्वयंसेवकों और सावरकरवादियों ने
हमला किया था, जिसका ज़िक्र उस जुलूस में शामिल रहे
मधु लिमये ने लिखित रूप से किया था, जैसे कि 1979 में 'रविवार' साप्ताहिक में छपा हुआ लेख)
पता होना चाहिए कि 1940
के दशक में बंगाल में एक भारतीय नेता ने लाहौर में मार्च 1940
में पाकिस्तान प्रस्ताव पेश करने वाले व्यक्ति के साथ गठबंधन किया था। और वह
भारतीय नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी थे। अविभाजित बंगाल में जिन्ना ने अपनी मुस्लिम
लीग का श्यामा प्रसाद मुखर्जी की पार्टी से समझौता कर सरकार चलाई थी!
इसी तरह हिंदू महासभा ने जिन्ना के दो राष्ट्र सिद्धांत का समर्थन किया था।
जून 2005 में कराची में एक बीजेपी
नेता ने जिन्ना की तारीफ़ की थी, उनकी मज़ार पर सिर टेका था। वह हिंदू ह्दय सम्राट
कहे जाने वाले लालकृष्ण आडवाणी थे! 2009
में एक बीजेपी नेता ने अपनी किताब में जिन्ना की प्रशंसा की और वह जसवंत सिंह थे!
2022
में गुजरात में आरएसएस की एक प्रदर्शनी में गुजरात के 200 प्रतिष्ठित
व्यक्तियों की सूची में जिन्ना को शामिल किया गया था!
दूसरों पर सवाल करने से पहले आरएसएस को
इस सवाल का जवाब देना चाहिए कि वंदे मातरम् जब इतना बड़ा राष्ट्रभक्ति गीत है तो
संघ की शाखा में वंदे मातरम् क्यों नहीं गाया जाता है? जन
गण मन भी क्यों नहीं गाया जाता वहाँ? क्यों तिरंगे को फहराया नहीं जाता था शाखाओं में?
ये लोग अपनी शिविरों, शाखाओं
या अपनी कथित चर्चाओं में जो भी कहे, स्पष्ट बात है कि इस देश में तिरंगा सबसे बड़ा ध्वज है, ना
कि भगवा या केसरिया। इस देश में जन गण मन सबसे बड़ा गान है, ना
कि नमस्ते सदा वत्सले। ये लोग वर्तमान संविधान को जब तक बदल नहीं देते, तब
तक तो यही तथ्य है।
वंदे
मातरम् के नाम पर की जा रही राजनीति को प्रियंका गांधी ने सीधे सामने लाकर खड़ा
किया, एक भी बात को तर्क और तथ्य के साथ काट नहीं पाई
सरकार
लोकसभा में वंदे मातरम् पर मोदी सरकार
द्वारा की जा रही निहायत ग़ैरज़रूरी नौटंकी के सामने कांग्रेस सांसद प्रियंका
गांधी वाड्रा ने बीजेपी-आरएसएस और उनकी सरकार के मूल इरादे को उजागर करने का सटीक
और अत्यंत सीधा प्रयास किया।
हम ज़्यादातर किसी राजनेता के बयानों को
अपने लेखों में जगह नहीं देते। यहाँ प्रियंका गांधी के संसद में दिए गए भाषण को
शामिल करने की दो वजहें हैं। पहली - विपक्ष को जो जगह मीडिया को देनी चाहिए थी, वह
उसने नहीं दी। दूसरी - इनके भाषण में जो मूल तर्क और तथ्य शामिल थे, उसे
जगह मिलनी चाहिए।
प्रियंका गांधी का सीधा सवाल - कांग्रेस
के हर अधिवेशन में वंदे मातरम् गाया जाता है, बीजेपी-आरएसएस में
गाया जाता है या नहीं?
प्रियंका गांधी ने पूछा, "कांग्रेस
के हर एक अधिवेशन में सामूहिक तौर पर वंदे मातरम् गाया जाता है, लेकिन
सवाल है कि बीजेपी-आरएसएस के अधिवेशनों में वंदे मातरम् गाया जाता है या नहीं?"
लाज़मी है कि दरअसल यह कोई सवाल नहीं
था। क्योंकि सबको पता है कि बीजेपी-आरएसएस के अधिवेशनों में राष्ट्र गीत या राष्ट्र
गान नहीं गाया जाता। इक्का दुक्का मौक़े पर गाया गया होगा तो इसे बतौर सबूत पेश
करने की बेशर्मी ज़रूर होगी।
प्रियंका गांधी ने वंदे मातरम् को 'देश
की आत्मा के महामंत्र' के तौर पर परिभाषित किया। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार उस
महामंत्र की पवित्रता को विवादों में धकेलनी कोशिश कर रही है।
वंदे मातरम् का गान पहली बार किस बरस
हुआ था वह बताने लगे मोदी, लेकिन वह कहाँ हुआ था और किसने गाया था यह बताने की हिम्मत
नहीं जुटा पाए, प्रियंका गांधी ने
कसा तंज़
पीएम मोदी ने वंदे मातरम् पर जैसे कि
कोई नया दावा कर रहे हो उस अंदाज़ में कहा कि 1896 में पहली बार उसे
गाया गया था। इसमें क्या नया है? यह तो सबको पता है। लेकिन अंदाज़ ऐसा, जैसे
कि इतिहास से कुछ नया खोज़ कर ले आए हो!
ख़ैर, मोदीजी ने ज्ञान तो दिया, लेकिन
वे यह बताने की हिम्मत नहीं जुटा पाए कि वो गान कहाँ हुआ था और किस संमेलन में
गाया गया था?
इसी बात को लेकर प्रियंका गांधी ने कहा, "वंदे
मातरम् की सालगिरह पर आयोजित कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी ने भाषण
दिया। मोदीजी ने अपने भाषण में कहा कि 1896 में गुरूदेव
रवींद्रनाथ टैगोरजी ने पहली बार वंदे मातरम् गीत को 'एक
अधिवेशन' में
गाया। लेकिन प्रधानमंत्रीजी ये नहीं बता पाए कि वो अधिवेशन किसका था। वो कांग्रेस
का अधिवेशन था। आख़िर नरेंद्र मोदी किस बात से कतरा रहे थे?"
पीएम मोदी ने नेहरू-बोस पत्र के केवल
चुनिंदा हिस्से का ज़िक्र किया, पत्र का पूरा संदर्भ
प्रियंका गांधी ने लोकसभा में पेश किया
लोकसभा जैसी जगह पर देश के पीएम नरेंद्र
मोदी ने नेहरू-बोस के पत्र के एक चुनिंदे हिस्से को बताकर इतिहास को तोड़ा और
मरोड़ा! सरकार
से कोई दूसरा मंत्री यह करता तो ठीक मान लेते, लेकिन देश के प्रधानमंत्री जैसे
संवैधानिक पद ने संसद के भीतर व्हाट्सएप विश्वविद्यालय के विद्यार्थी जैसा
प्रदर्शन दिखाया!
प्रियंका गांधी ने सदन में 1937
में पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा नेताजी सुभाष चंद्र बोस को लिखे गए पत्र की मूल
प्रति का हवाला देते हुए कहा, "प्रधानमंत्रीजी
ने कहा कि नेहरूजी ने नेताजी को लिखा था कि वंदे मातरम् के शेष छंद मुसलमानों को
उकसा सकते हैं। यह आधा-अधूरा सच है। उसी पत्र में नेहरूजी स्पष्ट रूप से लिखते हैं
- 'वंदे
मातरम् के शेष छंदों के ख़िलाफ़ जो तथाकथित आपत्ति है, वह
सांप्रदायिक ताक़तों द्वारा गढ़ी गई है।’ यह हिस्सा
प्रधानमंत्री जी ने पढ़ा ही नहीं।"
स्वाभाविक है कि इस पत्र में जिन
सांप्रदायिक ताक़तो का ज़िक्र है उसमें बात आरएसएस, हिंदू महासभा, मुस्लिम
लीग, आदि
समुदायों की थी और है।
उन्होंने पूछा, "इसे
छिपाकर आधा सच क्यों बोला गया?"
प्रियंका गांधी ने तंज़ कसा, "1937
में भी सांप्रदायिक ताक़तें वही थीं, जो आज भी हैं। नेहरूजी ने उन्हें पहचान लिया था, लेकिन
आज उनके नाम लेकर वही काम किया जा रहा है।"
उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री ने
सदन में नेहरूजी के पत्र को तोड़-मरोड़कर पेश किया, ताकि कांग्रेस और नेहरूजी की छवि ख़राब
की जा सके तथा वंदे मातरम् जैसे पवित्र राष्ट्रीय प्रतीक को राजनीतिक हथियार बनाया
जा सके।
प्रियंका गांधी का तर्कसंगत और
तथ्यात्मक वार, कहा - वंदे मातरम् के
वर्तमान स्वरूप को संविधान सभा ने विभाजनकारी विचार को किनारे कर स्वीकार किया था
जैसा कि हमने ऊपर देखा, वंदे
मातरम् का जो वर्तमान स्वरूप है, उस पर भारत के उन महानायकों और महापुरूषों ने लंबा और गहन
विचार विमर्श किया था और उसके बाद उसे स्वीकृत किया था।
कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी ने संसद
में अपने भाषण के दौरान इसी बात को लेकर कहा कि वंदे मातरम् के इस स्वरूप को
संविधान सभा ने स्वीकार किया, महापुरुषों ने अपने महान विवेक से निर्णय लिया। उन्होंने आगे
कहा कि जो भी विभाजनकारी हो सकता था उसे किनारे करके संविधान सभा द्वारा वर्तमान
स्वरूप को स्वीकार किया गया।
प्रियंका गांधी ने कहा कि देश की
संविधान सभा ने जिसे स्वीकृत किया उस पर विवादित बातें करना संविधान विरोधी मंशा
को उजागर करता है। उन्होंने कहना चाहा कि जिन लोगों ने अपना पूरा जीवन देश की
आज़ादी की लड़ाई में झोंक दिया था उनके विवेक के ऊपर सवाल उठाने के लिए पर्याप्त
तर्क चाहिए, जो
आज किसी भी नेता या पार्टी के पास नहीं है।
प्रियंका गांधी का पीएम मोदी पर तंज़, कहा - मैं कोई कलाकार
नहीं हूँ, जनता की प्रतिनिधि
हूँ
संसद में अपने भाषण के दौरान कांग्रेस
सांसद प्रियंका गांधी ने पीएम मोदी के संदिग्ध और अपुष्ट भाषणों पर सीधा सवाल
उठाया और एक तंज़ भी कस दिया।
प्रियंका ने कहा, "प्रधानमंत्री
नरेंद्र मोदी भाषण तो अच्छा देते हैं, लेकिन तथ्यों के मामले में कमज़ोर पड़ जाते हैं।"
उन्होंने आगे तंज़ कसते हुए कहा, "मोदीजी
जिस तरह तथ्यों को जनता के सामने रखते हैं, ये उनकी कला है। लेकिन मैं तो जनता की
प्रतिनिधि हूँ, कोई
'कलाकार' नहीं
हूँ।"
प्रियंका गांधी ने थोड़े आक्रमक अंदाज़
में कहा, "नरेंद्र
मोदीजी जितने साल से देश के प्रधानमंत्री हैं, जवाहरलाल नेहरूजी उतने साल देश के लिए
जेल में रहे हैं।"
चलिए, दिनों
तक एक बहस करें जिसमें ये सरकार सबको जी भर गालियाँ दें, सबकी
ग़लतियाँ निकाले, फिर हम संसद का क़ीमती समय उन समस्याओं पर लगाए
जिसके लिए हम यहा हैं - प्रियंका गांधी की दो टूक
प्रियंका गांधी ने संसद में पीएम मोदी
को दो टूक चुनौती देते हुए कहा, "चलिए, नेहरूजी
की ग़लतियाँ गिनाने की बजाए एक बार में ही सब पर बहस कर हमेशा के लिए इसको ख़त्म
करें।"
उन्होंने कहा, "नेहरूजी
से जितनी भी शिकायतें हैं, जितनी भी ग़लतियाँ उन्होंने की हैं आपके ज़ेहन में, जितनी
भी गालियाँ देनी हैं, जितना भी अपमान करना है, उसकी भी एक सूची बना लीजिए। 999
अपमान, 9999
अपमान- सूची बना दीजिए। और फिर हम एक समय निर्धारित करते हैं... 10
घंटे, 20
घंटे, 40
घंटे- हम बहस कर लेंगे।"
प्रियंका गांधी ने कहा, "सब
ख़त्म हो जाए, उसके
बाद चर्चा बेरोजगारी पर होनी चाहिए, दूसरे ज्वलंत मुद्दों पर होनी चाहिए। संसद का क़ीमती समय जनता
की असली समस्याओं पर लगाएँ, जिनके लिए हमें चुना गया है।"
उन्होंने आगे कहा, "जैसे
अंग्रेज़ी में कहते हैं न... वन्स फॉर ऑल,
लेट्स क्लोज द चैप्टर। क्लोज कर लीजिए। देश सुन लेगा। क्या क्या शिकायते हैं। क्या
किया इंदिराजीने, क्या
किया राजीवजी ने, परिवारवाद
क्या होता है, नेहरूजी
ने कौन सी ग़लतियाँ कीं। सुना लीजिए। फिर ख़त्म।"
उन्होंने आगे कहा,
"उसके
बाद बेरोजगारी, महंगाई, महिलाओं
की समस्याएँ, पीएमओ
के अंदर बेटिंग ऐप, एप्स्टीन फ़ाइल्स में मंत्रियों के नाम, इस
पर चर्चा होनी चाहिए।"
प्रियंका गांधी ने कहा कि चर्चा बेरोजगारी, महंगाई, पेपर
लीक, आरक्षण
के साथ खिलवाड़, पर
होनी चाहिए, रुपये
के गिरते मूल्य पर बात होनी चाहिए।
प्रियंका गांधी ने कहा कि बंगाल का
चुनाव और ज़रूरी मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए सरकार वंदे मातरम् पर संसद में
चर्चा करा रही है।
चुनाव
और सत्ता के लिए आरएसएस और उसके स्वयंसेवक मोदी और कितने मुखौटे पहनेंगे?
भारत के सबसे घोर चुनावजीवी
प्रधानमंत्री और उनकी मातृ पितृ संस्था आरएसएस, ये अब चुनाव और सत्ता के मक़सद हेतु और
कितने मुखौटे लगाएँगे? सबको पता है कि वंदे मातरम् बहाना है, मक़सद
सत्ता और चुनाव तक जाना है।
राष्ट्र गीत वंदे मातरम् का इतिहास
जगज़ाहिर है। सबको पता है कि अक्टूबर 1937 और फिर 1947
के बाद इसे राष्ट्र गीत के चुने हुए स्वरूप में तय करने के मंथन में नेहरू, सरदार
पटेल, राजेंद्र
प्रसाद, आचार्य
जे बी कृपलानी, राजगोपालाचारी, जमनालाल
बजाज, मौलाना
अबुल कलाम आज़ाद, शरत
चंद्र बोस, जयप्रकाश
नारायण, ख़ान
अब्दुल गफ़ार ख़ान, सुचेता कृपलानी, आदि के साथ रवींद्र नाथ टैगोर और श्यामा
प्रसाद मुखर्जी जैसे नायक भी शामिल थे।
26 अक्टूबर 1937
को रवींद्र नाथ टैगोर ने कांग्रेस अध्यक्ष को जो पत्र लिखा था, उसका
एक अंश है,
"इसके (गीत के) पहले हिस्से में व्यक्त
कोमल भाव और भक्तिपूर्ण भावनाएँ, तथा मातृभूमि के
सुंदर-शिवम् पक्ष पर इसका ज़ोर मेरे लिए विशेष महत्व रखते हैं। यह महत्व इतना गहरा
है कि इस हिस्से को कविता के शेष हिस्से तथा पुस्तक के उन अंशों से अलग करने में
मुझे कोई कठिनाई नहीं होती जिसका यह अंग है। मेरा पालन-पोषण पिता के एकेश्वरवादी
विचारों के बीच हुआ है और इन अंशों में व्यक्त भावों से मेरी सहानुभूति नहीं हो
सकती।"
क्या आरएसएस, बीजेपी
और मोदी, ये
लोग इन महानायकों से भी ज़्यादा बड़े चिंतनकर्ता और देशभक्त हैं? क्या
वे उन नायकों से ज़्यादा समझदार, प्रतिबद्ध और जागरूक हैं? बिलकुल नहीं।
दरअसल, बिहार चुनाव ख़त्म होते
ही मोदीजी और गोदी मीडिया पर बंगाल का बुख़ार छाया हुआ है। वंदे मातरम् राष्ट्र
गीत है, उस पर संसद में क्या बहस
हो सकती है? उसे संविधान सभा ने स्वीकृत किया था। उसे स्वीकृत करते समय जो भी
मंथन, विचार विमर्श, सहमती असहमति, स्वीकृति अस्वीकृति, सब हुआ वह सार्वजनिक है, कोई टॉप सीक्रेट नहीं है।
सरकार
ने वंदे मातरम् पर चर्चा के नाम पर संसद में जो कुछ किया, साफ़ दिखा कि मंशा वंदे
मातरम् पर चर्चा की नहीं बल्कि नेहरू पर कीचड़ उछालने की थी। आरएसएस, मोदीजी और बीजेपी, शायद घोर अज्ञानी हैं। वे
भूल गए कि राष्ट्र गीत के मुद्दे पर जब वे नेहरू पर हमला बोलते हैं, उन्हें अपराधी ठहराते हैं, तब वे दरअसल पूरी संविधान
सभा को, वर्किंग कमेटी को, उनमें शामिल महानुभावों
को, रवींद्र नाथ टैगोर, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, सभी को अपराधी कहते हैं।
(इनसाइड इंडिया, एम
वाला)











